मलिक असगर हाशमी | नई दिल्ली
हरियाणा के पानीपत जिले का छोटा सा गांव राणा माजरा इन दिनों एक ऐसी मिसाल के लिए चर्चा में है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। यहां 31 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026 तक आयोजित तीन दिवसीय तब्लीगी जमात का इज्तिमा केवल एक बड़ा धार्मिक आयोजन नहीं था। यह आपसी भाईचारे, सामाजिक सद्भाव और इंसानियत की ऐसी तस्वीर भी बनकर उभरा, जिसमें हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए। इज्तिमा में लाखों मुसलमानों की मौजूदगी थी, लेकिन इसकी तैयारियों से लेकर मेहमानों की सेवा तक गांव के हिंदू परिवारों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। आयोजन की सफलता में उनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण रही कि इसकी चर्चा अब गांव की सीमाओं से निकलकर पूरे हरियाणा में हो रही है।
इस आयोजन की तैयारी करीब एक महीने पहले शुरू हो गई थी। गांव के अरविंद प्रजापति उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने दिन रात मेहनत करके इज्तिमा के इंतजामों को अंतिम रूप दिया। वह बताते हैं, "आयोजन की तैयारी में वह खुद एक महीने लगे हुए थे।
यहां तक कि इज्तिमा के इंतजाम में लगे तकरीबन सौ लोग उनके घर में रहे।" अरविंद का यह अनुभव बताता है कि धार्मिक आयोजन को सफल बनाने के लिए जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति उसी धर्म से जुड़ा हो, जिसके अनुयायी वहां जुट रहे हों। सेवा और सहयोग के लिए इंसानियत का रिश्ता ही काफी है।
राणा माजरा हरियाणा के पानीपत जिले की बापोली तहसील में स्थित है। यह गांव समालखा और पानीपत से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर है। यमुना नदी के करीब बसे इस गांव का भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 1,703 हेक्टेयर है।
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी 12,355 थी। इनमें 6,585 पुरुष और 5,770 महिलाएं शामिल थीं। राजनीतिक रूप से यह समालखा विधानसभा और करनाल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। लेकिन तीन दिनों तक इस गांव की पहचान राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और मेहमाननवाजी के केंद्र के रूप में सामने आई।

इज्तिमा को लेकर गांव के हिंदू परिवारों में भी खास उत्सुकता थी। काशिफ गुज्जर बताते हैं कि उनके कई हिंदू परिचित लगातार फोन करके पूछ रहे थे कि क्या वे भी इस आयोजन में शामिल हो सकते हैं। काशिफ के अनुसार, "इस तीन दिवसीय इज्तिमा में आने या दुकान लगाने को लेकर किसी को कोई मनाही नहीं थी।" यही खुलेपन का माहौल इस आयोजन की खास पहचान बना। यहां किसी की जाति या धर्म देखकर उसकी भागीदारी तय नहीं की गई। जो व्यक्ति सेवा करना चाहता था, वह अपनी इच्छा से आगे आया। जो कारोबार करना चाहता था, उसके लिए भी रास्ते खुले थे।
इस आयोजन की एक और खास तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आई। स्वीटी त्यागी ने अपने एक व्लॉग में राणा माजरा इज्तिमा के अनुभव साझा करते हुए वहां के माहौल की चर्चा की। उन्होंने कहा, "राणा माजरा गांव के इज्तिमा में लाखों की भीड़ होने के बावजूद न कोई दंगा हुआ, न किसी ने किसी का हाथ पकड़ा, न किसी को आने जाने से जाति धर्म के आधार पर रोकने की कोशिश की।"
उनके मुताबिक, इज्तिमा स्थल पर हिंदू समुदाय के लोगों ने भी खाने पीने की दुकानें लगाईं। किसी ने चाय का खोखा खोला, तो किसी ने आइसक्रीम की रेहड़ी लगाई। लोगों ने इन दुकानों से सामान खरीदा और दुकानदारों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि दुकान चलाने वाला किस धर्म से है।
आज जब देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक पहचान को लेकर तनाव की खबरें सामने आती रहती हैं, तब राणा माजरा की यह तस्वीर खास महत्व रखती है। यहां धार्मिक आयोजन में शामिल होने आए लोगों और स्थानीय कारोबारियों के बीच सहज संबंध देखने को मिला।
इज्तिमा में आने वाले लोगों के लिए गांव के हिंदू और मुस्लिम परिवारों ने मिलकर सुविधाएं उपलब्ध कराईं। किसी ने पीने के पानी का इंतजाम किया, किसी ने पार्किंग की जिम्मेदारी संभाली, तो किसी ने अपने घरों में नमाज पढ़ने की व्यवस्था कराई। गांव के लोगों ने मेहमानों को बाहरी समझने के बजाय अपने परिवार का हिस्सा माना।
हालांकि, इस आयोजन के सामने मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों की चुनौती भी थी। इज्तिमा स्थल की जमीन रेतीली और मिट्टी वाली थी। आयोजन से कुछ दिन पहले हुई तेज बारिश ने पूरे मैदान को कीचड़ में बदल दिया था। ऐसी स्थिति में इतने बड़े धार्मिक कार्यक्रम को व्यवस्थित करना आसान नहीं था।
लेकिन यहां भी गांव के कारसेवकों ने मिसाल पेश की। जाति और धर्म की परवाह किए बिना बड़ी संख्या में लोग मैदान को तैयार करने में जुट गए। बताया गया कि कार्यकर्ताओं ने लगातार एक सप्ताह मेहनत की और कीचड़ से भरी जमीन को आयोजन के योग्य बनाया। यह मेहनत केवल मैदान तैयार करने तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे लाखों मेहमानों की सुविधा और आयोजन को सफल बनाने का साझा संकल्प था।
धन्नू गुर्जर भी इस सामूहिक प्रयास को भाईचारे की बड़ी मिसाल मानते हैं। उन्होंने बताया कि इज्तिमा के दौरान गांव के लोगों ने बाहर से आए मेहमानों की भरपूर सेवा की। कई परिवारों ने अपने घरों में नमाज पढ़ने की व्यवस्था कराई।
पार्किंग और पीने के पानी का इंतजाम किया गया। स्थानीय लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारियां संभालीं। धन्नू गुर्जर के अनुसार, इज्तिमा के दौरान जो आपसी प्रेम और सहयोग देखने को मिला, वह गांव के सामाजिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है। गांव के लोगों का कहना है, "इस इज्तिमा को भाईचारे के रूप में हरियाणा के लोग हमेशा याद रखेंगे।"
तीन दिवसीय तब्लीगी इज्तिमा के अंतिम दिन सबसे अधिक उत्सुकता मौलाना साद की दुआ को लेकर थी। इसमें हरियाणा के विभिन्न जिलों के अलावा यमुना पार उत्तर प्रदेश के कई इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। मौलाना साद ने इस दौरान लोगों से यमुना नदी में उतरने से परहेज करने की अपील की थी।
इसकी वजह नदी का लगातार बदलता जलस्तर था। दरअसल, आयोजन के दौरान यमुना में पानी का स्तर रह रहकर बढ़ रहा था। ऐसे में लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नदी में जाने से मना किया गया। इसके बावजूद दूर दराज से आने वाले श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। यमुना के आसपास प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी इज्तिमा में शामिल होने के लिए लोगों का पहुंचना चर्चा का विषय बना रहा।
राणा माजरा का यह आयोजन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। तब्लीगी जमात का इज्तिमा मूल रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम होता है। इसमें नमाज, दीन की बातें, आपसी सुधार और दुआ को विशेष महत्व दिया जाता है। लेकिन राणा माजरा में इसके साथ एक व्यापक सामाजिक संदेश भी दिखाई दिया।
गांव के हिंदू परिवारों ने यह साबित किया कि किसी दूसरे धर्म के धार्मिक कार्यक्रम में सहयोग करना अपनी धार्मिक पहचान से समझौता करना नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी निभाना है। इसी तरह इज्तिमा में आए लोगों ने भी स्थानीय दुकानदारों और सेवाकार्यों में लगे लोगों के प्रति सम्मान दिखाया।
राणा माजरा की कहानी केवल एक इज्तिमा की सफलता की कहानी नहीं है। यह उन छोटे छोटे प्रयासों की कहानी है, जिनसे समाज में भरोसा कायम होता है। अरविंद प्रजापति के घर में ठहरे करीब सौ कार्यकर्ताओं से लेकर मैदान को तैयार करने वाले कारसेवकों तक, चाय और आइसक्रीम की दुकान लगाने वाले कारोबारियों से लेकर पानी और पार्किंग का इंतजाम करने वाले ग्रामीणों तक, हर किसी ने अपनी भूमिका निभाई। किसी ने मंच से भाषण नहीं दिया, किसी ने एकता का बड़ा दावा नहीं किया। लोगों ने अपने काम से भाईचारे का अर्थ समझाया।
पानीपत का राणा माजरा आज इसलिए चर्चा में है कि यहां लाखों लोगों की मौजूदगी के बीच सामाजिक सौहार्द कायम रहा। तीन दिनों तक धर्म अलग हो सकते थे, लेकिन इंसानियत के काम में कोई दूरी नहीं थी। यही इस तब्लीगी इज्तिमा की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।
हरियाणा के इस गांव ने दिखाया कि आपसी सम्मान, सहयोग और मेहमाननवाजी के लिए किसी बड़े मंच या नारे की जरूरत नहीं होती। कभी कभी एक गांव के लोग मिलकर भी पूरे समाज को भाईचारे का रास्ता दिखा सकते हैं।