असम की मुस्लिम महिला उद्यमी ने पारंपरिक परिधान को दिलाई नई पहचान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-11-2026
A Muslim woman entrepreneur from Assam has given a new identity to traditional attire.
A Muslim woman entrepreneur from Assam has given a new identity to traditional attire.

 

मुन्नी बेगम / गुवाहाटी

नगांव की अलमारा बरभुइया इस बात की एक अनूठी मिसाल हैं कि कपड़ों के प्रति एक साधारण सा लगाव किस तरह आगे चलकर आजीविका का जरिया बन सकता है। साल 2008 में उन्होंने महज 5,000 रुपये का सामान खरीदकर मेखेला-चादर (महिलाओं का पारंपरिक असमिया पहनावा) का एक छोटा सा कारोबार शुरू किया था। आज उनका यह बिजनेस उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां वे हर महीने लगभग 1 लाख रुपये कमाती हैं और आठ अन्य महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं। अपने ब्रांड‘AB Assamese Ethnic’ के जरिए यह महिला उद्यमी असमिया पारंपरिक पहनावे को देश-विदेश के ग्राहकों तक पहुंचाने का काम कर रही हैं।

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दो बेटियों की मां अलमारा ने जब अपना कारोबार शुरू किया था, तब उनके पास कोई ठोस योजना नहीं थी। कपड़े खरीदने का शौक और मेखेला-चादर में उनकी खास रुचि ही उन्हें इस व्यापार की ओर खींच लाई। जिसकी शुरुआत खुद के लिए कपड़े खरीदने से हुई थी, वह धीरे-धीरे दोस्तों के साथ इस रुचि को साझा करते-करते एक बिजनेस में बदल गई। जब उनके तैयार किए कपड़े सहेलियों के बीच लोकप्रिय होने लगे, तो उन्होंने इसके विस्तार के बारे में सोचना शुरू किया।

‘आवाज़ - द वॉयस’से बात करते हुए अलमारा बरभुइया ने बताया: “शुरुआत में मैंने दोस्तों और रिश्तेदारों को मिलाकर एक छोटा सा ग्राहक आधार बनाया और उनसे मिलने वाले पैसों को वापस अपने बिजनेस में ही लगा दिया। मेरी पहली खरीदारी करीब 5,000 रुपये के सामान की थी।

हालांकि, चूंकि मुझे बाजार और उत्पादों की कीमतों का कोई अनुभव नहीं था, इसलिए शुरुआत में मैंने कई सामानों के लिए जरूरत से ज्यादा पैसे दे दिए। वक्त के साथ मुझे बिजनेस का अनुभव हुआ और उत्पादों की गुणवत्ता व बाजार की समझ हासिल हुई।”

आगे चलकर अलमारा की रुचि ऑनलाइन बिक्री में जागी और उन्होंने 'मीशो', 'फ्लिपकार्ट' और 'अमेजन' के जरिए अपने उत्पाद बेचना शुरू किया। उन्होंने मीशो के जरिए लगभग 21 लाख रुपये की कमाई की। हालांकि, कुछ कड़वे अनुभवों के बाद उन्होंने मीशो और फ्लिपकार्ट से व्यापार बंद कर दिया और अब वे केवल अमेजन के जरिए ही ऑनलाइन बिक्री करती हैं।

अपने नाम के अक्षरों 'AB' को पारंपरिक असमिया पहनावे से जोड़कर अलमारा ने अपना ब्रांड‘AB Assamese Ethnic’ बनाया। अमेजन पर जब उनका ब्रांड लोकप्रिय होने लगा, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट के लिए भी पूछताछ मिलने लगी।

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उन्होंने बताया, “जब मैंने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ब्रिटेन (UK) के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अपना नाम, तस्वीर और कपड़ों की लिस्टिंग देखी, तो मैं हैरान रह गई। बाद में मुझे पता चला कि मेरे उत्पाद अन्य देशों के ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर भी लिस्टेड हैं। इसके बाद मैंने अपने ब्रांड को सुरक्षित करने के लिए ट्रेडमार्क का आवेदन किया और जीएसटी पंजीकरण तथा अन्य जरूरी औपचारिकताएं पूरी कीं। फिलहाल मेरे पास इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट लाइसेंस भी है।”

विदेशी ग्राहकों के साथ-साथ अब अलमारा के खरीदार भारत के कई राज्यों में हैं, जिनमें महाराष्ट्र (विशेषकर मुंबई), पश्चिम बंगाल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा शामिल हैं। अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों में असमिया मेखेला-चादर के प्रति बढ़ते क्रेज ने उनके बिजनेस को फैलाने में काफी मदद की है। हिंदू ग्राहक भी त्योहारों और अन्य समारोहों में पहनने के लिए उनसे असमिया पहनावे खरीदते हैं। एक ग्राहक ने तो अलमारा को समर्पित करके एक कविता भी लिखी और उन्हें उपहार में दी।

हालांकि अलमारा खुद कपड़े की बुनाई नहीं करती हैं, लेकिन वे डिजाइनों, रंगों, थीमों और पारंपरिक असमिया मोटिफ्स (आकृतियों) को नए अंदाज में पेश करने पर विशेष ध्यान देती हैं। उनके पास सात करघे (लूम) हैं। उनके कलेक्शन में सिल्क, मूगा, टसर (टॉस) सिल्क, मलबरी सिल्क, मर्सराइज्ड फैब्रिक और कॉटन शामिल हैं।

टसर पहनावे की कीमत 5,000 से 12,000 रुपये के बीच है, जबकि सिल्क के पहनावे 7,000 से 30,000 रुपये तक के हैं। मर्सराइज्ड कपड़ों की रेंज 2,000 से 2,500 रुपये और कॉटन के कपड़ों की कीमत 1,500 से 2,500 रुपये के बीच है।

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अपने डिजाइनों के बारे में विस्तार से बताते हुए अलमारा ने कहा किगछ-बुटाऔरकिंगखापमोटिफ्स उनके ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। हालांकि, जोनबीरीमोटिफ उनके सबसे चर्चित डिजाइनों में से एक है। उन्होंने जोनबीरी मोटिफ को धारियों (स्ट्राइप्स) के साथ मिलाकर सोने और चांदी के रंगों में एक खास डिजाइन तैयार किया, जिसने बड़ी संख्या में एडवांस ऑर्डर आकर्षित किए। एक ग्राहक ने तो अपनी बेटी की शादी के लिए उस फैब्रिक से लहंगा तक बनवाया।

अलमारा फिलहाल टसर फैब्रिक पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं और साथ ही सिल्क तथा बेडशीट के पैटर्न से प्रेरित नए डिजाइन भी विकसित कर रही हैं। पूजा के त्योहारों के लिए उन्होंने जोनबीरी और छोटे बुटा मोटिफ्स वाले फैब्रिक पेश किए। ग्राहकों की क्रय शक्ति को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इन्हीं डिजाइनों वाले कपड़े अपेक्षाकृत कम कीमतों पर भी उपलब्ध कराए।अलमारा उत्पाद की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करतीं।

वे कहती हैं, “ग्राहकों को असली टसर फैब्रिक मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए मैं केवल वही उत्पाद सप्लाई करती हूं जिनके साथ लैब टेस्ट सर्टिफिकेट होता है। अगर कोई उत्पाद नकली साबित होता है, तो मैं ग्राहकों को 100 प्रतिशत रिफंड की गारंटी भी देती हूं। मैं गुवाहाटी और सुआलकुची से ऑनलाइन उच्च गुणवत्ता वाला सामान खरीदती हूं। फिलहाल मुझे इस बिजनेस से हर महीने लगभग 1 लाख रुपये की कमाई हो जाती है।”

अलमारा के इस बिजनेस से फिलहाल करीब आठ महिलाएं जुड़ी हुई हैं। वे अमेजन के ऑर्डर्स की पैकिंग, गारमेंट वर्क, सिलाई, दुकान संभालने, मैनेजमेंट और मॉडलिंग जैसे कामों में शामिल हैं। एक कर्मचारी तो उनके साथ लगभग सात सालों से काम कर रही है। ज्यादातर ऑर्डर ऑनलाइन आते हैं, और यह टीम ग्राहकों की मांग के अनुसार कस्टमाइज्ड कपड़े भी तैयार करती है।

हालांकि, सफलता की यह राह आसान नहीं रही। एक महिला होने के नाते खुद का बिजनेस चलाने पर अलमारा को अक्सर आसपास के लोगों के तानों का सामना करना पड़ा। लोग पूछते थे, 'तुम्हारे पति तो अच्छा कमाते हैं, फिर तुम्हें काम करने की क्या जरूरत है?' सोशल मीडिया पर भी एक मुस्लिम महिला होकर असमिया पहनावा बेचने के लिए उन्हें कड़वी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

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इन बातों का जवाब देते हुए अलमारा कहती हैं: “मेरा जन्म असम में हुआ है और मेरी पढ़ाई असमिया-माध्यम के स्कूलों में हुई है। मेरा रहन-सहन, खान-पान और संस्कृति असमिया है। क्या इस्लाम धर्म को मानने का मतलब यह है कि मैं असमिया नहीं हो सकती? मुझे अपनी पहचान पर गर्व है।”

इस पूरे सफर में उनके पति का सहयोग उनके लिए ताकत का सबसे बड़ा जरिया रहा। खुद एक बिजनेसमैन होने के नाते, उन्होंने हर मुश्किल दौर में अलमारा का हौसला बढ़ाया। जब भी सोशल मीडिया की नकारात्मक टिप्पणियां या लोगों की बातें उन्हें परेशान करती थीं, तो उनके पति कहते: “दूसरे क्या कहते हैं उस पर ध्यान मत दो। मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम अपना काम करती रहो।”

मेखेला-चादर के बिजनेस के अलावा अलमारा को खाना बनाने और हस्तशिल्प में भी काफी रुचि है। उन्हें पिज्जा, तरह-तरह की ब्रेड, केक और नई डिशेज बनाने व बेचने का भी अनुभव है। उनकी खासियतों में चॉकलेट-वैनिला केक, चिकन ब्रेड, वेजीटेबल ब्रेड और स्टफ्ड ब्रेड शामिल थे। एक बार तो दुकान में रखे जाने के महज दो घंटे के भीतर ही उनके बनाए सारे पिज्जा बिक गए थे।

सिलाई की कोई औपचारिक ट्रेनिंग न होने के बावजूद, उन्होंने यूट्यूब वीडियो देखकर कटिंग और स्टिचिंग सीखी। एम्ब्रॉयडरी (कढ़ाई) न जानने के बावजूद उन्होंने बेडशीट पर कई तरह के सजावटी डिजाइन तैयार किए हैं।

अपने अनुभवों को साझा करते हुए वे कहती हैं: “जिन लोगों के पास हुनर है, वे कभी गरीब नहीं हो सकते। महिलाओं को अपनी प्रतिभा पहचानने और उसे आय का जरिया बनाने पर ध्यान देना चाहिए। आज के डिजिटल दौर में किसी के काम और हुनर को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने के लिए एक मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ही काफी है।”

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अलमारा की योजना अपने खुद के डिजाइनों का एक फैशन शो आयोजित करने की है। उनका तात्कालिक लक्ष्य अपने ब्रांड को पूरे भारत में अधिक मशहूर बनाना है, और साथ ही असमिया पारंपरिक पहनावे को एक बड़े बाजार तक ले जाने के अपने सपने को पूरा करना है। इतनी उपलब्धियों के बावजूद, वे खुद को अब भी एक “शुरुआती” मानती हैं।

वे कहती हैं, “मैं अभी भी अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं, क्योंकि अभी बहुत कुछ करना बाकी है।”

महज ₹5,000 से शुरू हुआ यह बिजनेस आज हर महीने ₹1 लाख की कमाई दे रहा है और आठ महिलाओं को रोजगार प्रदान कर रहा है। अपनी प्रतिभा, कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर अलमारा बरभुइया ने पारंपरिक असमिया कपड़ों के कारोबार में एक अलग पहचान बनाई है और दूसरी महिलाओं के लिए स्वावलंबन की एक बेहतरीन मिसाल पेश की है।