राणा प्रताप बैरागी की हत्या पर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम समुदाय का तीखा विरोध

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 09-01-2026
The Muslim community in West Bengal strongly protested against the murder of Rana Pratap Bairagi.
The Muslim community in West Bengal strongly protested against the murder of Rana Pratap Bairagi.

 

देबकिशोर चक्रवर्ती 

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय के विभिन्न वर्गों ने बांग्लादेश के जेस्सोर जिले के केशबपुर क्षेत्र में पत्रकार और व्यवसायी राणा प्रताप बैरागी की नृशंस हत्या पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया है। समुदाय के लोगों का कहना है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता की सुरक्षा, मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।

दिवंगत राणा प्रताप बैरागी नरेल से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘बी.डी. खबर’ के कार्यकारी संपादक थे। इसके साथ ही वे एक छोटे उद्योगपति के रूप में भी सक्रिय थे। उनकी हत्या की खबर सामने आते ही न केवल बांग्लादेश बल्कि भारत के पश्चिम बंगाल में भी सामाजिक, धार्मिक और पत्रकारिता जगत में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

haपश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हलीमा खातून ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा, “एक मुस्लिम नागरिक होने के नाते मैं इस बर्बर हत्या की घोर निंदा करती हूं। पत्रकार समाज की अंतरात्मा होते हैं। उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश लोकतंत्र के मूल्यों पर सीधा हमला है। इस्लाम शांति, न्याय और पीड़ितों की रक्षा का संदेश देता है। किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के पत्रकार की इस तरह हत्या होना इन मूल्यों का खुला उल्लंघन है। सभी धर्मों और समुदायों के लोगों को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए।”

dकोलकाता के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित खेल पत्रकार जफर अली खान ने भी इस घटना को अत्यंत चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा, “पत्रकार की हत्या को किसी एक देश का आंतरिक मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है। बांग्लादेश में इस तरह की घटनाएं पूरे दक्षिण एशिया के लिए चिंता का विषय हैं। धर्म, जाति या पहचान से ऊपर उठकर इस अपराध के खिलाफ आवाज उठाना समय की जरूरत है।”

पश्चिम बंगाल में एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चलाने वाले निडर पत्रकार शफीकुल इस्लाम ने कहा कि राणा प्रताप बैरागी की हत्या ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों को और भी मजबूत कर दिया है। उन्होंने कहा, “यदि इस मामले में त्वरित, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं हुई और दोषियों को सख्त सजा नहीं दी गई, तो हालात और भी भयावह हो सकते हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदायों के भीतर असुरक्षा की भावना और गहरी होगी।”

fपश्चिम बंगाल क्रिकेट के सफल और चर्चित कोच अब्दुल मुनायम ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि राज्य का जागरूक मुस्लिम समुदाय बांग्लादेश में घट रही घटनाओं पर करीबी नजर बनाए हुए है। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश में हिंदू नागरिकों पर हो रहे लगातार हमले किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं हैं। हिंसा और डर का माहौल सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाता है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।”

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेश में हाल के वर्षों में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में वृद्धि ने गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। कई संगठनों का आरोप है कि लक्षित हत्याएं, धमकियां और भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा लोगों के बीच भय का वातावरण बना रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ऐसी घटनाएं न केवल देश की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं का प्रभाव भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ रहा है। राजनयिक सूत्रों के अनुसार, भारतीय सरकार ने विभिन्न मंचों पर बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है और वहां की सरकार से आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया है।

2022 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदू आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 7.95 प्रतिशत है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस बड़ी आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करना बांग्लादेश सरकार का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों की सुरक्षा, चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय से हों, राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है।

 

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए बयानों से यह स्पष्ट होता है कि वे राणा प्रताप बैरागी की हत्या को किसी सांप्रदायिक चश्मे से नहीं, बल्कि मानवता, न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के सवाल के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय जांच तथा दोषियों को कड़ी सजा देकर ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है और लोगों का विश्वास बहाल किया जा सकता है।