भारत के बर्डमैन को नमन: डॉ. सालिम अली, जिन्होंने पक्षियों को दी आवाज

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 06-01-2026
A tribute to India's Birdman: Dr. Salim Ali, who gave a voice to birds.
A tribute to India's Birdman: Dr. Salim Ali, who gave a voice to birds.

 

आवाज़ द वॉयस | नई दिल्ली

आज का दिन भारतीय विज्ञान और प्रकृति प्रेम के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। आज महान पक्षी वैज्ञानिक डॉ. सालिम अली की जयंती है और साथ ही राष्ट्रीय पक्षी दिवस भी। ऐसे में उस शख्सियत को याद करने का यह सबसे उपयुक्त अवसर है, जिन्हें पूरी दुनिया “भारत के बर्डमैन” के नाम से जानती है। डॉ. सालिम अली न केवल भारत के सबसे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी थे, बल्कि वे ऐसे वैज्ञानिक थे जिनके शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली और जिन्होंने भारत में पक्षी विज्ञान (ऑर्निथोलॉजी) को एक नई दिशा दी।

ffडॉ. सालिम अली का पूरा नाम सालिम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली था। उनका जन्म 12 नवंबर 1896 को हुआ था। वे नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। दुर्भाग्य से, उनके जीवन की शुरुआत संघर्षों से भरी रही। जब वे मात्र एक वर्ष के थे, तभी उनके पिता मोइज़ुद्दीन का निधन हो गया और तीन साल की उम्र में उनकी मां ज़ीनत-उन-निस्सा भी इस दुनिया से चली गईं। माता-पिता के साये से वंचित सालिम अली का पालन-पोषण उनकी मौसी हामिदा बेगम और मामा आमिरुद्दीन तैयबजी ने मुंबई में किया।

उनका पक्षियों के प्रति लगाव बचपन में ही दिखाई देने लगा था। एक दिन, जब वे लगभग दस वर्ष के थे, उन्होंने एक चिड़िया को उड़ते हुए देखा और उत्सुकतावश उसे नीचे गिरा लिया। जब उन्होंने उसे पास से देखा तो वह गौरैया जैसी थी, लेकिन उसके गले पर हल्का पीला रंग था। जिज्ञासु बालक सालिम ने अपने मामा से उस पक्षी के बारे में पूछा, लेकिन वे भी जवाब नहीं दे सके। इसके बाद वे उन्हें बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के मानद सचिव डब्ल्यू.एस. मिलार्ड के पास ले गए। मिलार्ड इस बालक की गहरी रुचि से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सालिम को संग्रहालय में रखे विभिन्न पक्षी दिखाए। यहीं से सालिम अली के जीवन की दिशा तय हो गई और वे नियमित रूप से वहां जाने लगे।

सालिम अली ने कॉलेज की पढ़ाई तो की, लेकिन शुरुआत में उन्हें कोई विश्वविद्यालय डिग्री नहीं मिल सकी। अपने भाई के साथ टंगस्टन खनन और लकड़ी के व्यवसाय में हाथ बंटाने के लिए वे बर्मा (वर्तमान म्यांमार) गए, लेकिन वहां भी उनका अधिकांश समय पक्षियों को देखने और समझने में ही बीतता था। अंततः वे मुंबई लौट आए। बाद में उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से प्राणीशास्त्र (जूलॉजी) में अध्ययन पूरा किया।

fffदिसंबर 1918 में उनका विवाह तहमीना बेगम से हुआ। वर्ष 1926 में उन्हें बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के संग्रहालय में गाइड की नौकरी मिली, जहां वे आगंतुकों को संरक्षित पक्षियों के बारे में जानकारी देते थे। इसी दौरान पक्षियों के जीवन और व्यवहार को लेकर उनकी रुचि और गहरी होती चली गई। अपने ज्ञान को और समृद्ध करने के लिए वे जर्मनी गए, जहां उन्होंने प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी डॉ. इरविन स्ट्रेसमैन से अध्ययन किया। हालांकि 1930 में भारत लौटने पर आर्थिक कारणों से संग्रहालय में उनका पद समाप्त कर दिया गया।

जीवनयापन के लिए उन्होंने उसी संग्रहालय में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी स्वीकार की, जिससे वे अपने शोध को जारी रख सके।

उनकी पत्नी के गांव किहिम (मुंबई के पास) का शांत वातावरण उनके शोध के लिए आदर्श स्थान था। वहीं उन्होंने बया पक्षी (वीवर बर्ड) के व्यवहार और जीवन पर गहन अध्ययन किया। वर्ष 1930 में प्रकाशित उनका शोध पत्र बेहद चर्चित हुआ और इसी के साथ वे पक्षी विज्ञान की दुनिया में स्थापित हो गए।

1939 में एक मामूली ऑपरेशन के बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया, जो उनके जीवन का एक बड़ा आघात था। इसके बावजूद उन्होंने अपने काम को नहीं छोड़ा। 1941 में उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “द बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स” प्रकाशित हुई, जिसने वर्षों तक पाठकों के बीच लोकप्रियता बनाए रखी। बाद में उन्होंने प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी एस. डिलन रिप्ले के साथ मिलकर “हैंडबुक ऑफ द बर्ड्स ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान” नामक दस खंडों का विशाल ग्रंथ तैयार किया, जो 1964 से 1974 के बीच प्रकाशित हुआ और आज भी पक्षी विज्ञान की दुनिया में एक मानक संदर्भ माना जाता है।
f

इसके अलावा उन्होंने “कॉमन बर्ड्स” जैसी फील्ड गाइड्स और अपनी आत्मकथा “द फॉल ऑफ ए स्पैरो” भी लिखी, जो 1985 में प्रकाशित हुई। सालिम अली केवल शोधकर्ता ही नहीं थे, बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रबल समर्थक भी थे। उन्हें मिले अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार की पूरी राशि उन्होंने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी को दान कर दी।

भारत सरकार

ने उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1958 में पद्म भूषण और 1976 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 20 जून 1987 को 90 वर्ष की आयु में प्रोस्टेट कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद उनका निधन हो गया। डॉ. सालिम अली का जीवन आज भी यह प्रेरणा देता है कि समर्पण, जिज्ञासा और प्रकृति के प्रति प्रेम से कोई भी व्यक्ति इतिहास में अमिट छाप छोड़ सकता है।