घर बंद था, मुस्लिम पड़ोसन रोज सींचती रही तुलसी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 21-07-2026
The house was locked, yet the Muslim neighbor kept watering the Tulsi plant every day.
The house was locked, yet the Muslim neighbor kept watering the Tulsi plant every day.

 

भक्ति चालक

आजकल पूरा महाराष्ट्र भगवान विट्ठल की भक्ति में डूबा हुआ है। मंजीरों की खनक और 'ज्ञानोबा-तुकाराम' की गूंज के साथ पंढरपुर की मुकद्दस पैदल यात्रा, जिसे 'वारी' कहा जाता है, आगे बढ़ रही है। महाराष्ट्र की यह संत परंपरा, भक्ति और तहज़ीब की सबसे बड़ी ज़िंदा मिसाल मानी जाती है।

हर साल लाखों 'वारकरी' (तीर्थयात्री) मीलों लंबा पैदल सफर तय करते हैं। इस सफर में वारकरियों के सिर पर या उनके काफिले (दिंडी) में सबसे आगे जो चीज़ सबसे पवित्र मानी जाती है, वह है तुलसी का पौधा (तुलसी वृंदावन)। वारकरी परंपरा में तुलसी की बहुत अहमियत है। वारी के इस भक्ति भरे माहौल के बीच पुणे ज़िले के बारामती से आपसी भाईचारे की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई है।

आषाढ़ी वारी किसी एक मज़हब का नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र का त्योहार बन चुका है। वाणेवाड़ी गांव के रहने वाले विट्ठल शिंदे और उनकी पत्नी शाकूबाई शिंदे हर साल पाबंदी से संत सोपानकाका की पालकी के साथ वारी पर जाते हैं। इस साल भी वे विट्ठल भगवान के दर्शन की चाह में अपने घर को ताला लगाकर पंढरपुर के रास्ते पर निकल पड़े। घर तो बंद हो गया, लेकिन उनके आंगन में रखे तुलसी के पौधे का खयाल कौन रखेगा? यह एक बड़ा सवाल था।

हिंदू धर्म में तुलसी को आस्था और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। रोज़ उसकी पूजा करना और उसे पानी देना हर वारकरी परिवार का सबसे ज़रूरी काम होता है। विट्ठल शिंदे जब वारी के लिए निकले, तो उन्होंने बिना किसी फिक्र के अपने घर की चाबी सीधे पड़ोस में रहने वाले शफीक मुलानी के घर दे दी। और फिर वे बेफिक्र होकर वारी पर चले गए।

शिंदे परिवार के वारी पर जाने के बाद शफीक की पत्नी अंजुम मुलानी ने उनके घर की पूरी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। उन्होंने सिर्फ घर की रखवाली ही नहीं की, बल्कि रोज़ सुबह उठकर शिंदे परिवार के आंगन में जाकर उस मुकद्दस तुलसी को बिना भूले पानी देना शुरू कर दिया। उनके दिल में बस यही भावना है कि जब तक यह परिवार वारी से वापस लौटे, तब तक यह तुलसी हरी-भरी और ताज़ा रहनी चाहिए।

अंजुम मुलानी हिंदू धर्म का पूरा एहतेराम करते हुए रोज़ सुबह तुलसी को पानी दे रही थीं। यह बात उनके एक और पड़ोसी शशिकांत जेधे ने देख ली। अंजुम को बिना बताए, शशिकांत ने अपने मोबाइल से इस खूबसूरत पल की तस्वीर खींच ली। उन्होंने यह फोटो सोशल मीडिया पर डाल दी, और देखते ही देखते यह तस्वीर इंटरनेट पर ज़बरदस्त वायरल हो गई।

अंजुम मुलानी ने 'आवाज़-द-वॉयस' से बात करते हुए कहा, "हमारी बस्ती में हम सब लोग बहुत प्यार और खुशी से रहते हैं। जात-पात की हमारे यहां कोई जगह नहीं है। हमारे पड़ोसियों के साथ हमारे रिश्ते बिल्कुल घर वालों जैसे हैं। वे लोग कहीं भी जाते हैं तो हमें बताकर जाते हैं, यहां तक कि जाने से पहले अपने घर की चाबी भी हमारे पास ही रख जाते हैं।"

वह आगे कहती हैं, "इस बार भी ऐसा ही हुआ। घर से बाहर जाते वक्त उन्होंने हमें अपने घर की चाबी दी और बेफिक्र होकर चले गए। जब मैं हमेशा की तरह तुलसी को पानी दे रही थी, तो हमारे दूसरे पड़ोसी शशिकांत भाऊ ने मेरी फोटो खींच ली। मुझे इस बात का पता भी नहीं था। जब उस भाई ने फोटो के साथ कुछ लिखकर अपने स्टेटस पर लगाया, तब जाकर मुझे पता चला।"

वारी के लिए निकले विट्ठल शिंदे कहते हैं, "घर को ताला लगाकर हम बिल्कुल बेफिक्र होकर वारी पर निकले हैं। हमारे जाने के बाद हमारे घर और आंगन की तुलसी का खयाल हमारे पड़ोसी शफीक भाई और उनकी पत्नी अंजुम रख रहे हैं। यह मुस्लिम बहन रोज़ बिना भूले हमारी तुलसी को पानी देती है। वारी पूरी होने तक इस तुलसी को रोज़ पानी देकर उसे हरा-भरा रखने की ज़िम्मेदारी उसने ली है। वह यह काम बहुत ही अकीदत से करती है।"

वह आगे कहते हैं, "बाहर कितनी भी नफरत फैलाने वाली बातें क्यों न हों, हमारे वाणेवाड़ी गांव में इंसानियत का मज़हब आज भी ज़िंदा है। जात-पात को पकड़ कर बैठने से बेहतर है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करें। संत शेख मोहम्मद ने भी यही कहा है कि 'हिंदू तुर्क दोनों एक', ईश्वर-अल्लाह एक ही है। दिखावे में फंसे रहने से बेहतर है कि मज़हबी और सामाजिक एकता का यह जश्न मनाया जाए, इसी में असली खुशी है।"

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खुले विचारों वाला मुलानी परिवार

मुलानी परिवार का यह काबिले तारीफ कदम और उनकी सोच का यह खुलापन अचानक नहीं आया है। इसके पीछे एक बड़े नेतृत्व की परवरिश है। अंजुम मुलानी का मायका इंदापुर तालुका के भवानीनगर में है। शादी के बाद वह वाणेवाड़ी आ गईं। इस परिवार में दो बच्चे हैं। बेटा अमन एम.कॉम कर चुका है और पुणे में नौकरी करता है, जबकि बेटी सादिया आईटी इंजीनियर है और विमाननगर की एक कंपनी में काम करती है।

मुलानी परिवार हिंदू और मुस्लिम दोनों मज़हबों की बहुत इज़्ज़त करता है। अंजुम मुलानी मुस्लिम होने के बावजूद पूरी आस्था के साथ बाकायदा संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखती हैं। उनके दोनों बच्चों को भी यही परवरिश मिली है। भाईचारे के माहौल में पले-बढ़े होने की वजह से उनके परिवार में दोनों तहज़ीबों का खूबसूरत संगम देखने को मिलता है।

इस बारे में शफीक बताते हैं, "हमारा पूरा घर सीनियर लीडर आनंद दादा भोसले की रहनुमाई में बड़ा हुआ है। वे हमारे गांव के मुखिया थे। वे सभी मज़हबों के लोगों को साथ लेकर चलते थे। उन्होंने हम सबको यही तालीम दी है। हमें उनकी रहनुमाई और अच्छी परवरिश मिली है।"

एक पुराना किस्सा याद करते हुए शफीक बताते हैं, "1996 में हमारे गांव के इलाके में मुस्लिम भाइयों के लिए पहली इफ्तार पार्टी आनंद दादा ने ही शुरू की थी। उनके इंतकाल के बाद उनके बच्चे आज तक उस रवायत को निभा रहे हैं। हर साल वे 27वें रोज़े पर सभी मुसलमानों को इफ्तार पार्टी देते हैं। हमारे यहां सभी जातियों और मज़हबों के लोग रहते हैं। बाहर नफरत फैलाने वाली जो बातें चलती हैं, ऐसी कोई चीज़ हमारे ज़हन को कभी छू भी नहीं पाती।"

वारी के अपने तजुर्बे के बारे में शफीक कहते हैं, "बचपन में हमने सबसे पहले सोमेश्वर में वारी देखी थी। हर सावन के सोमवार को करंज्या के सोमेश्वर मंदिर के पास एक बड़ा मेला लगता है। हम आज भी वहां जाते हैं। स्वर्गीय आनंद दादा खुद वारी किया करते थे। उन्हें देखकर ही हमने यह सब सीखा है।"

पड़ोसियों ने की जमकर तारीफ

मुलानी परिवार के बिल्कुल नज़दीकी पड़ोसी बापूराव जेधे ने अपना रिएक्शन देते हुए कहा, "शफीक भाई की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। हम पिछले 50-60 सालों से एक-दूसरे के पड़ोसी हैं। लेकिन हमारे बीच भाईचारे की भावना कभी कम नहीं हुई। मुलानी परिवार और हम बहुत प्यार से रहते हैं। इस काम के बाद तो अब अंजुम भाभी ने चार चांद लगा दिए हैं। इसी को प्यार और पड़ोसी धर्म कहते हैं।"

वह आगे कहते हैं, "हम सब ऐसे ही खुशी से रहेंगे और पड़ोसी धर्म निभाएंगे। हमारे दादा मुझसे हमेशा कहते हैं कि जिसका भाई सुखी, वह इंसान सुखी, और जिसका पड़ोसी सुखी, वह इंसान सुखी। आनंद दादा ने हमारे गांव में प्यार का जो बीज बोया था, वह आज एक बरगद का पेड़ बन चुका है।"

सासवड के रिटायर्ड मेडिकल अफसर मुबारक शेख ने अपना रिएक्शन देते हुए कहा, "अंजुम और शाकूबाई की इस दोस्ती में गंगा-जमुनी तहज़ीब साफ दिखाई देती है, और यही हमारे भारत की असली पहचान है। एकता और सहिष्णुता हमारे मुल्क की निशानी हैं। इस काम से पता चलता है कि सभी मज़हबों का सम्मान करने की बात हमारे देश में कितनी गहराई तक रची-बसी है। मोहम्मद भाई मिस्त्री की दी हुई तालीम और शफीक भाई का आगे बढ़ाया गया यह सफर आज अंजुम के ज़रिए देखने को मिल रहा है। अंजुम और शाकूबाई की दोस्ती को मेरा सलाम।"

आज के इस कड़वाहट भरे माहौल में शफीक मुलानी समाज को एक पैगाम देना चाहते हैं, जो आज के दौर में बहुत ज़रूरी है। वह कहते हैं, "हमारे कुरान ने भी मिल-जुलकर ही रहने के लिए कहा है। हमारे मज़हब में भेदभाव की कोई जगह नहीं है। और मुझे लगता है कि ईश्वर-अल्लाह एक ही हैं। इसलिए सबको मिल-जुलकर रहना चाहिए। अपने देश के साथ ईमानदार रहें, तरक्की करें और एक सेहतमंद ज़िंदगी जिएं।"

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

वाणेवाड़ी के अंजुम और शफीक मुलानी ने अपने इस काम से समाज में एक बहुत अच्छी मिसाल पेश की है। वारी के इस मुकद्दस मौके पर यह कहानी समाज में फैली नफरत को खत्म करने में एक बड़ा हथियार साबित होगी, इसमें कोई शक नहीं है।