आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली
गुजरात के जाने-माने उद्योगपति और सामाजिक कार्यकर्ता ज़फर सरेशवाला ने हाल ही में एक ऐसा खुलासा किया, जिसने देश में संवाद, सहिष्णुता और धार्मिक समरसता पर नए आयाम प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि अपने कार्यालय में उन्होंने एक विशेष “प्रेयर रूम” तैयार किया है, जहां मुसलमान नमाज़ अदा कर सकते हैं, हिंदू पूजा-अर्चना कर सकते हैं और अन्य धर्मों के अनुयायी भी अपने अनुसार प्रार्थना कर सकते हैं। ज़फर सरेशवाला कहते हैं कि अगर वे चाहते तो कार्यालय केवल मुसलमान कर्मचारियों के लिए ही नमाज़ की सुविधा दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके कार्यालय में मुसलमानों की तुलना में हिंदू कर्मचारियों की संख्या अधिक है और उन्होंने धर्म का समान सम्मान करना जरूरी समझा।

सरेशवाला ने यह भी साझा किया कि यह संवाद और सहयोग केवल उनके कार्यालय तक सीमित नहीं है। वर्ष 2017में उन्हें नागपुर स्थित आरएसएस के मुख्यालय हेडगेवार भवन में आमंत्रित किया गया था। जब उन्होंने वहाँ नमाज़ पढ़ने की इच्छा जताई, तो आरएसएस के लोगों ने पूरी व्यवस्था कर दी। उन्होंने बताया कि वहाँ उन्हें कपड़े, क़िबला की दिशा और नमाज़ के लिए शांत जगह उपलब्ध कराई गई। इस अनुभव ने उनके विचार को और मजबूत किया कि देश के मुसलमानों के लिए संवाद से बेहतर कोई रास्ता नहीं है और आरएसएस जैसे संगठन से बेहतर कोई पहलकर्ता नहीं हो सकता।
सरेशवाला बताते हैं कि उन्होंने यह समझा कि आज देश में भले ही सरकार बीजेपी की है, लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर अधिकांश मंत्री आरएसएस से जुड़े रहे हैं। इसलिए यदि मुसलमानों के मुद्दों को प्रभावी रूप से उठाना है तो सीधे संवाद की आवश्यकता है। उन्होंने याद किया कि आरएसएस के मुख्यालय में उनकी मुलाकात मोहन भागवत और उनके भाई के साथ हुई थी, जहाँ उन्होंने लगभग 45मिनट तक खुलकर देश में मुसलमानों की समस्याओं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और समावेशी विकास पर चर्चा की।
उन्होंने यह भी कहा कि संवाद केवल औपचारिकता नहीं है। यह वह प्रक्रिया है जो निर्णय लेने वालों तक सीधे पहुँच बनाती है। मुलाकात के दौरान उन्हें सम्मानजनक व्यवहार मिला, उनकी नमाज़ का ध्यान रखा गया और उनकी बातों को गंभीरता से सुना गया। सरेशवाला के अनुसार मोहन भागवत ने साफ कहा कि वे मुसलमानों की समस्याओं से अनजान नहीं हैं और यह भी माना कि यदि भारत का मुसलमान तरक्की नहीं करेगा तो देश भी आगे नहीं बढ़ सकता।

ज़फर सरेशवाला का मानना है कि संवाद की प्रक्रिया में शामिल होना बेहद आवश्यक है। उनका कहना है कि देश के मुसलमान उद्योगपति, व्यापारी और शिक्षाविद़ देश के प्रभावशाली हिंदू व्यक्तियों से नियमित संपर्क और बातचीत करें। इस प्रक्रिया से न केवल विश्वास और समझ विकसित होती है, बल्कि सामाजिक नफरत और अविश्वास भी धीरे-धीरे समाप्त होते हैं।
सरेशवाला ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह विचार उनके मित्र मरहूम मुनव्वर राणा से भी प्रभावित था। राणा ने बताया करते थे कि रमजान के दिनों में उन्होंने तरूण विजय, पांचजन्य पत्रिका के पूर्व संपादक, के घर पर ठहराव के दौरान रोज़ा खोलने और नमाज़ की पूरी व्यवस्था की थी। यह दिखाता है कि संवाद और सहिष्णुता केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत पहल, दोस्ती और सामाजिक संबंधों के माध्यम से भी विकसित हो सकती है।
सरेशवाला ने अपने कार्यालय में बनाई प्रेयर रूम की व्यवस्था को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इस कमरे में प्रत्येक धर्म के लोगों के लिए उचित सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मुसलमानों के लिए नमाज़ की जगह, हिंदू धर्मावलंबियों के लिए पूजा स्थल, और अन्य धर्मों के अनुयायियों के लिए प्रार्थना के विकल्प। उनका मानना है कि यदि कार्यस्थलों और सार्वजनिक जगहों पर इस तरह की पहल अपनाई जाए, तो धार्मिक सौहार्द और सहिष्णुता को मजबूत किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवाद और सहिष्णुता केवल धर्म या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, सामाजिक स्थिरता और सामूहिक विकास के लिए आवश्यक है। सरेशवाला कहते हैं कि नफरत और विरोध के बजाय संपर्क, वार्ता और समझ ही राष्ट्र को मजबूत बनाती है। उनका यह मानना है कि जब विभिन्न धर्मों के लोग खुलकर एक-दूसरे से संवाद करेंगे और समझ बढ़ाएँगे, तभी देश में वास्तविक समरसता और सामाजिक विकास संभव है।
सरेशवाला के अनुसार, आरएसएस के साथ उनके संवाद का अनुभव यह दर्शाता है कि संगठन और समुदाय दोनों के बीच भरोसा और समझ विकसित की जा सकती है। इस मुलाकात ने उनके दृष्टिकोण को और स्पष्ट किया कि समस्या केवल संवादहीनता की है, और इसे केवल बातचीत, साझेदारी और पारस्परिक सम्मान से हल किया जा सकता है।
उन्होंने टीवी शो में यह भी कहा कि देश के मुसलमानों को यह समझना होगा कि प्रभावशाली और निर्णय लेने वाले लोग किसके पास हैं। राजनीतिक या सामाजिक नेतृत्व केवल सत्ता तक सीमित नहीं है; यह उन लोगों तक भी पहुँचता है, जिनके पास समाज और समुदाय पर प्रभाव होता है। इसीलिए संवाद की प्रक्रिया से ही समस्याओं का स्थायी और कारगर समाधान निकाला जा सकता है।

ज़फर सरेशवाला का जीवन और उनके कार्य इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि धार्मिक सहिष्णुता, पारस्परिक सम्मान और खुला संवाद केवल आदर्श नहीं हैं, बल्कि इसे व्यावहारिक रूप में लागू भी किया जा सकता है। चाहे वह उनके कार्यालय में प्रेयर रूम की व्यवस्था हो या नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में अनुभव, हर पहल यह दर्शाती है कि संवाद और समझ ही राष्ट्र निर्माण की असली कुंजी हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश में बहुसंख्यक हिंदू होने के बावजूद, मुसलमानों के अधिकारों और उनकी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि प्रत्येक समुदाय एक-दूसरे के साथ खुलकर संवाद और सहयोग करेगा, तो सामाजिक संतुलन, आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा।
अंततः सरेशवाला का संदेश यह है कि नफरत, डर और दूरी के बजाय संपर्क, एकता और संवाद राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। उनके अनुसार यह सिर्फ व्यक्तिगत या धार्मिक दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि देश के सामूहिक हित और सामाजिक न्याय के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।