शटलर सैयद मोदी : 14 साल में चैंपियन, 28 में दुनिया से विदा

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 03-09-2026
Syed Modi: The shuttler who gave Indian badminton a new identity, but whose story remained incomplete.
Syed Modi: The shuttler who gave Indian badminton a new identity, but whose story remained incomplete.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
एक ऐसा खिलाड़ी, जिसने 14 साल की उम्र में राष्ट्रीय जूनियर चैंपियन बनने से लेकर लगातार आठ बार सीनियर नेशनल चैंपियन बनने तक का सफर तय किया। जिसने 1982 में राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय बैडमिंटन को दुनिया के सामने नई पहचान दी। और जिसने अपने छोटे से करियर में वह मुकाम हासिल किया, जिसे पाने में कई खिलाड़ियों को पूरी जिंदगी लग जाती है।
 
यह कहानी है सैयद मोदी की। लेकिन सैयद मोदी की कहानी सिर्फ जीत, पदक और रिकॉर्ड की कहानी नहीं है। यह उस खिलाड़ी की कहानी है, जिसने सीमित संसाधनों के दौर में मेहनत, अनुशासन और लगातार अभ्यास के दम पर भारतीय बैडमिंटन की मजबूत नींव तैयार की। उनका जीवन जितनी तेजी से ऊंचाइयों पर पहुंचा, उतनी ही दुखद परिस्थितियों में अचानक थम गया।
 
Past Masters of Indian Badminton: Syed Modi, the artistic Suresh Goel clone

खिलाड़ी का परिचय

सैयद मोदी का जन्म 31 दिसंबर 1962 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनका पूरा नाम सैयद मेहदी हसन जैदी था और परिवार तथा करीबी लोग उन्हें प्यार से ‘बबुआ’ कहते थे। वह पुरुष एकल बैडमिंटन के खिलाड़ी थे। कम उम्र में ही उनकी प्रतिभा सामने आने लगी थी।
 
महज 14 साल की उम्र में 1976 में वह जूनियर राष्ट्रीय चैंपियन बने। इसी साल उन्होंने पटियाला के एनआईएस के प्रमुख बैडमिंटन कोच पी.के. भंडारी के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण शुरू किया। 1982 तक भंडारी उनके कोच रहे, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय टीम के कोच दीपू घोष से प्रशिक्षण लिया। सैयद मोदी का सबसे बड़ा रिकॉर्ड रहा 1980 से 1987 तक लगातार आठ बार राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियन बनना।
 
शुरुआती जीवन और संघर्ष

सैयद मोदी पांच भाइयों और दो बहनों वाले परिवार में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई सैयद हुसैन हैदर, जिन्हें ‘प्यारे’ के नाम से जाना जाता था, ने उन्हें बैडमिंटन की शुरुआती बारीकियां सिखाईं। उनके एक और भाई सैयद आबिद हैदर भी राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी थे।
 
यानी घर का माहौल ही खेल और बैडमिंटन से जुड़ा हुआ था। लेकिन प्रतिभा होना और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना दो अलग बातें हैं। मोदी ने बेहद कम उम्र से ही कठिन प्रशिक्षण और अनुशासन को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया। 1976 में जूनियर राष्ट्रीय खिताब जीतने के बाद उन्होंने लगातार अपने खेल को निखारा।
 
सिर्फ चार साल बाद, 1980 में 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीत ली। यही उनके बड़े करियर की शुरुआत थी। उनकी प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार के खेल विभाग की सिफारिश पर 1980 में उन्हें भारतीय रेलवे में वेलफेयर ऑफिसर की नौकरी भी मिली। शुरुआत में उनकी पोस्टिंग गोरखपुर में हुई, ताकि वह अपने परिवार के करीब रह सकें। बाद में बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं के लिए उन्हें लखनऊ स्थानांतरित किया गया।
 
Past Masters of Indian Badminton: Syed Modi, the artistic Suresh Goel clone
 
खेल करियर: राष्ट्रीय चैंपियन से अंतरराष्ट्रीय सितारे तक

सैयद मोदी का करियर बहुत तेजी से आगे बढ़ा। 1980 में पहली बार सीनियर राष्ट्रीय खिताब जीतने के बाद उन्होंने अगले सात वर्षों तक भी यह खिताब अपने नाम रखा। यानी 1980, 1981, 1982, 1983, 1984, 1985 और 1986 तथा 1987 लगातार आठ राष्ट्रीय खिताब। यह उपलब्धि उन्हें अपने दौर के सबसे प्रभावशाली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों में शामिल करती है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दबदबे के बाद मोदी की असली पहचान अंतरराष्ट्रीय मंच पर बनी। उनके करियर का निर्णायक मोड़ आया 1982 राष्ट्रमंडल खेलों में।
 
ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में उन्होंने पुरुष एकल के फाइनल में इंग्लैंड के निक येट्स को 7-15, 15-6, 15-5 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। यह जीत भारतीय बैडमिंटन के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। उस समय भारत अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन में आज की तरह बड़ी ताकत नहीं था। ऐसे में मोदी का राष्ट्रमंडल स्वर्ण भारतीय खिलाड़ियों के लिए विश्वास बढ़ाने वाली उपलब्धि बना। इसके बाद उन्होंने 1983 और 1984 में ऑस्ट्रेलियन इंटरनेशनल तथा 1985 में यूएसएसआर इंटरनेशनल खिताब भी जीता।
 
देश के लिए उपलब्धियां

सैयद मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में 1982 दिल्ली एशियन गेम्स का कांस्य पदक शामिल है। पुरुष एकल में उन्होंने कांस्य पदक जीता और यह उपलब्धि भारतीय बैडमिंटन के लिए ऐतिहासिक थी। भारतीय ओलंपिक संघ के रिकॉर्ड के अनुसार, मोदी पुरुष एकल में कांस्य पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों में शामिल थे।
 
हाल की खेल-स्मृतियों में भी उनके इस प्रदर्शन को खास महत्व दिया गया है। 2026 की एक रिपोर्ट में 1982 एशियन गेम्स में उनके कांस्य पदक को भारत का पहला व्यक्तिगत एशियन गेम्स बैडमिंटन पदक बताया गया। इसी 1982 में उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर अपने करियर का सबसे चमकदार साल पूरा किया।
 
उनकी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां थीं:

1982 राष्ट्रमंडल खेल — पुरुष एकल स्वर्ण
1982 एशियन गेम्स — पुरुष एकल कांस्य
1983 ऑस्ट्रेलियन इंटरनेशनल — विजेता
1984 ऑस्ट्रेलियन इंटरनेशनल — विजेता
1985 यूएसएसआर इंटरनेशनल — विजेता
1980-1987 — लगातार आठ राष्ट्रीय खिताब
 
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर

सैयद मोदी के लिए 1981 का साल खास रहा। एक तरफ वह भारतीय बैडमिंटन में लगातार अपनी पहचान मजबूत कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर सरकार ने उनके प्रदर्शन को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिया। 1981 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
 
उस समय उनकी उम्र बेहद कम थी। लेकिन जूनियर स्तर से सीनियर राष्ट्रीय चैंपियन बनने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में तेजी से आगे बढ़ने की उनकी यात्रा ने साबित कर दिया था कि भारत को बैडमिंटन में एक नया सितारा मिल चुका है।
 
दिलचस्प बात यह है कि अर्जुन अवॉर्ड मिलने के बाद भी मोदी रुके नहीं। अगले कई वर्षों तक उन्होंने राष्ट्रीय चैंपियनशिप पर अपना दबदबा बनाए रखा और 1982 में राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण तथा एशियन गेम्स का कांस्य जीतकर अपनी प्रतिष्ठा को और मजबूत किया।
 
प्रेरक कहानी: 14 साल की उम्र में राष्ट्रीय चैंपियन

सैयद मोदी की सबसे प्रेरक बात शायद उनकी उम्र नहीं, उनकी निरंतरता थी। आज जब किसी खिलाड़ी के करियर को सफलता के लिए वर्षों की तैयारी से जोड़ा जाता है, मोदी ने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी।
 
सिर्फ 14 साल की उम्र में जूनियर राष्ट्रीय चैंपियन बनने के बाद उन्होंने खुद को लगातार बेहतर किया। चार साल बाद उन्होंने सीनियर राष्ट्रीय खिताब जीत लिया। इसके बाद उन्होंने इसे सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि आठ साल तक लगातार दोहराया। यही निरंतरता उन्हें खास बनाती है। उनकी कहानी यह बताती है कि किसी एक बड़ी जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण है हर साल खुद को साबित करते रहना।
 
Remembering badminton player Syed Modi who left us this day in 1988, aged 26
 
1982: जब सैयद मोदी ने भारतीय बैडमिंटन को बदल दिया

सैयद मोदी के करियर में 1982 एक ऐसा साल था जिसने उन्हें राष्ट्रीय खिलाड़ी से अंतरराष्ट्रीय स्टार बना दिया। पहले उन्होंने दिल्ली एशियन गेम्स में पुरुष एकल का कांस्य पदक जीता। इसके बाद ब्रिस्बेन राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया।
 
बाद में उनके करियर पर लिखी गई पुस्तक Net Flicks से जुड़े एक लेख में 1982 को उनके करियर का निर्णायक मोड़ बताया गया—राष्ट्रमंडल स्वर्ण ने उन्हें वह अंतरराष्ट्रीय पहचान दी, जिसकी उन्हें जरूरत थी। यही वह दौर था जब भारतीय खेलों में एक नई पीढ़ी उभर रही थी। प्रकाश पादुकोण की उपलब्धियों के बाद सैयद मोदी भी भारतीय बैडमिंटन के बड़े नाम के रूप में सामने आए।
 

 
एक अधूरी कहानी

सैयद मोदी की कहानी जितनी शानदार थी, उसका अंत उतना ही दुखद और असामयिक रहा। 1988 में वह अभी सिर्फ 28 वर्ष के थे और अपने खेल करियर के महत्वपूर्ण दौर में थे। 28 जुलाई 1988 को लखनऊ में के.डी. सिंह बाबू स्टेडियम में अभ्यास खत्म करने के बाद वह घर लौट रहे थे। लेकिन वह अपने घर नहीं पहुंच सके। स्टेडियम से निकलने के बाद उन पर गोली चलाई गई और उनकी हत्या कर दी गई।
 
उस समय तक वह लगातार आठ वर्षों से राष्ट्रीय चैंपियन थे। उनकी मौत ने पूरे भारतीय खेल जगत को झकझोर दिया। उनकी जिंदगी का यह अध्याय आज भी भारतीय खेल इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में गिना जाता है।
 
आज वे क्या कर रहे हैं?

सैयद मोदी अब हमारे बीच नहीं हैं। 28 जुलाई 1988 को लखनऊ में उनकी हत्या कर दी गई थी। उस समय उनकी उम्र केवल 28 वर्ष थी। लेकिन उनकी विरासत खत्म नहीं हुई। आज भी लखनऊ में आयोजित होने वाला Syed Modi International Badminton Championships उनके नाम को अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन से जोड़ता है।
 
2025 में भी इस प्रतियोगिता में दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। उनका परिवार भी उनकी खेल विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। 2018 में एक रिपोर्ट में उनके भतीजे के बेटे को बैडमिंटन में आगे बढ़ाने की कोशिश का उल्लेख किया गया था परिवार के लिए मोदी की उपलब्धियां आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।
 
Past Masters of Indian Badminton: Syed Modi, the artistic Suresh Goel clone
 
सैयद मोदी: एक सितारा जो बहुत जल्दी चला गया

सैयद मोदी का करियर सिर्फ 12 साल के आसपास चला, लेकिन इस छोटी सी अवधि में उन्होंने भारतीय बैडमिंटन के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी। 14 साल की उम्र में जूनियर राष्ट्रीय चैंपियन, 18 साल की उम्र में सीनियर राष्ट्रीय चैंपियन, लगातार आठ राष्ट्रीय खिताब, 1982 राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण, एशियन गेम्स का कांस्य और अर्जुन अवॉर्ड—उनकी उपलब्धियों की सूची बताती है कि वह किस स्तर के खिलाड़ी थे।
 
अगर उनकी जिंदगी को एक वाक्य में समेटना हो तो शायद यही कहा जा सकता है सैयद मोदी ने भारतीय बैडमिंटन को वह भरोसा दिया कि भारत का खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर चैंपियन बन सकता है। वह बहुत जल्दी चले गए, लेकिन उनके नाम पर खेली जाने वाली प्रतियोगिताएं और भारतीय बैडमिंटन की नई पीढ़ी में उनकी कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि महान खिलाड़ी की उम्र नहीं, उसकी विरासत लंबी होती है।