भक्ति चालक
उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर हुसैनाबाद से आई एक मुस्लिम लड़की। उसने सिर्फ बारहवीं तक तालीम हासिल की और कम उम्र में ही उसकी शादी भी हो गई। आज वह मुंबई में महिलाओं को सेहत और फिटनेस की तालीम दे रही है। ज़िंदगी में ज़िम्मेदारियों का पहाड़, तीन बच्चों की परवरिश और बीमारियों की चुनौतियों का सामना करते हुए उसने खुद को साबित किया है। यह कहानी है मुंब्रा की योग ट्रेनर और हेल्थ कोच रुख्सार खान की।
रुख्सार का बचपन उत्तर प्रदेश में गुज़रा। उनके वालिद जूते-चप्पल की दुकान में सेल्समैन की नौकरी करते थे। एक भाई और चार बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। उनकी वालिदा एक हाउसवाइफ हैं, लेकिन उन्होंने खुद के ख्वाबों को किनारे रखकर बच्चों की तालीम के लिए हर मुमकिन कोशिश की। रुख्सार भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं, इसलिए अठारह साल की उम्र पूरी होते ही उनकी शादी हो गई और वह महाराष्ट्र आ गईं।

जहां चाह, वहां राह
अक्सर महिलाएं शादी या बच्चे होने के बाद अपने ख्वाबों को पीछे छोड़ देती हैं। उम्र बढ़ने पर सोचती हैं कि 'अब हमारी ज़िंदगी में क्या बचा है।' लेकिन रुख्सार खान ने इस सोच को गलत साबित कर दिया। मुश्किल हालात को मात देते हुए उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। 'आवाज़-द वॉयस' से बात करते हुए उन्होंने अपने इस संघर्ष से भरे और बेहद प्रेरणादायक सफर के बारे में बताया।
घर की इकलौती बहू होने की वजह से परिवार की सारी ज़िम्मेदारियां उन पर आ गईं। इस भागदौड़ में तालीम का सिलसिला टूट गया और बारहवीं के बाद की पढ़ाई अधूरी रह गई। दोनों चीज़ों के बीच तालमेल न बिठा पाने की वजह से उन्होंने पढ़ाई पर कुछ वक्त के लिए रोक लगा दी। लेकिन दिल में कुछ सीखने और कुछ करने की ज़िद हमेशा कायम रही।
रुख्सार कहती हैं, “मुझे ज़िंदगी में एक बात बिल्कुल साफ पता थी; जो भी करना है वह पूरी ताक़त और 100 फीसद देकर करना है, वरना करना ही नहीं है। वक्त बर्बाद करना मुझे पसंद नहीं है।”
बेटे की पढ़ाई से हुई ट्यूशन की शुरुआत
घर के कामों में उलझी रुख्सार की ज़िंदगी में पहला मोड़ तब आया जब उनका बड़ा बेटा स्कूल जाने लगा। रुख्सार उसे खुद घर पर पढ़ाती थीं। मां से पढ़ते-पढ़ते बच्चे की पढ़ाई में काफी सुधार दिखने लगा। बेटे का अच्छा रिज़ल्ट देखकर पड़ोसियों ने रुख्सार से ट्यूशन के बारे में पूछा।
इस तरह पड़ोसियों ने अपने बच्चों को रुख्सार के पास पढ़ने के लिए भेजना शुरू कर दिया। यहीं से उनके होम ट्यूशन का सफर शुरू हुआ। कुर्ला में रहते हुए उन्होंने लगातार 9 साल तक छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया।
योगा के मैदान में पहला कदम
कुछ सालों बाद रुख्सार का परिवार कुर्ला से मुंब्रा शिफ्ट हो गया। वहां आने पर पानी और मौसम के बदलाव की वजह से उन्हें सेहत से जुड़ी परेशानियां होने लगीं। बार-बार बीमार पड़ने से वह काफी तंग आ चुकी थीं। फिटनेस का शौक पहले से ही था, इसलिए अपनी सेहत सुधारने के लिए उन्होंने एक मुकामी योगा स्टूडियो जाने का फैसला किया।
लेकिन वहां जाने पर उन्हें नज़ारा बिल्कुल अलग दिखा। लोग सिर्फ आ-जा रहे थे, योगासन गलत तरीके से किए जा रहे थे और किसी को भी इसके बारे में सही जानकारी नहीं थी। यह देखकर रुख्सार के अंदर का सीखने वाला जज़्बा फिर से जाग उठा।
इस बारे में रुख्सार बताती हैं, “हम अपना एक घंटा दे रहे हैं, लेकिन सेहत को कोई फायदा नहीं हो रहा है, यह देखकर मुझे बहुत अजीब लगा। वहीं मैंने तय किया कि मुझे इसकी सही तालीम हासिल करनी है और एक परफेक्ट हेल्थ कोच बनना है।”
डोंबिवली में ली योगा की तालीम
खुद को साबित करने के मक़सद से रुख्सार सीधे मुंब्रा से डोंबिवली गईं और वहां योगा की शास्त्रीय तालीम लेनी शुरू की। उन्होंने शरीर की बनावट (Anatomy), अलग-अलग बीमारियों और योगा के सही फॉर्म्स का गहराई से मुताला किया।
रुख्सार ने योगा में ट्रेनिंग पूरी करके ऑफिशियल सर्टिफिकेट भी हासिल कर लिया। प्रैक्टिकल और डेमो क्लासेज़ में उनका परफॉरमेंस इतना शानदार रहा कि जिस स्टूडियो में उन्होंने ट्रेनिंग ली थी, उसी संस्था ने उन्हें वहीं ट्रेनर के तौर पर नौकरी दे दी। लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने 'फिटनेस योगशाला' के नाम से अपना खुद का योगा स्टूडियो शुरू कर दिया और महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया।
इस पूरे सफर में रुख्सार के शौहर इमरान खान उनकी ढाल बनकर खड़े रहे। इमरान पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और अपना खुद का बिज़नेस चलाते हैं। इसलिए वह भी चाहते थे कि रुख्सार अपने पैरों पर खड़ी हों। चाहे रात में पढ़ाई करनी हो या क्लास आने-जाने की सहूलियत हो, उनके शौहर ने हर कदम पर उनका पूरा साथ दिया।
समाज की गलतफहमियों को किया दूर
योगा के मैदान में काम करते वक्त रुख्सार के सामने एक बड़ी समाजी रुकावट थी। मुस्लिम समाज में योगा को लेकर कई गलतफहमियां थीं। बहुत से लोगों को लगता था कि योगा एक खास मज़हब से जुड़ा हुआ व्यायाम है। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए रुख्सार ने पहल की।
उन्होंने अपने काम से साबित कर दिया कि व्यायाम या सेहत का किसी भी मज़हब से सीधा कोई ताल्लुक नहीं होता। गैर-मुस्लिम महिलाओं के लिए क्लास लेते वक्त वह रिवायती तरीके से श्लोक और ॐकार का जाप करवाती थीं। वहीं मुस्लिम महिलाओं के लिए उन्होंने उनके आस्था से जोड़कर मेडिटेशन का एक नया और असरदार तरीका शुरू किया। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के लिए आयतें पढ़नी शुरू कीं। इससे महिलाओं का योगा को देखने का नज़रिया पूरी तरह बदल गया।
योगा किसी मज़हब का नहीं होता, यह समझाते हुए रुख्सार कहती हैं, “मैंने महिलाओं को सिर्फ एक ही बात समझाई कि जब तक हम दिल में ऐसा खयाल नहीं लाते, तब तक व्यायाम का कोई मज़हब नहीं होता। योगा से हमारी रूहानी ताक़त बढ़ती है। योगा जिस्म को तरोताज़ा रखता है और हम फिट रहते हैं।”
ऐसे हुई रील्स की शुरुआत
शुरुआत में रुख्सार सोशल मीडिया पर ज़्यादा एक्टिव नहीं थीं। लेकिन डिजिटल मार्केटिंग से जुड़े उनके एक क्लाइंट ने उनका हुनर देखकर उनका इंस्टाग्राम अकाउंट बना दिया। धीरे-धीरे रुख्सार ने सेहत से जुड़ी और बीमारियों को दूर करने वाले योगासनों के वीडियो डालने शुरू किए। आज सोशल मीडिया पर उनके हज़ारों फॉलोवर्स हैं।
लोगों को उनके सिखाने का थेरेपी वाला तरीका इतना पसंद आया कि उन्हें दुनिया भर से लोग संपर्क करने लगे। आज वह सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि कनाडा, यूके, दुबई जैसे कई देशों के क्लाइंट्स की ऑनलाइन क्लासेज़ लेती हैं। बीमारियों पर काबू पाने के साथ-साथ कुदरती तरीके से वज़न कम करने में उन्हें 100 फीसद कामयाबी मिली है।
इस बारे में रुख्सार कहती हैं, “लोगों की परेशानियां दूर करना मेरी पहली तरजीह है। रोज़ सुबह 8:30 से रात 10 बजे तक मेरे ऑनलाइन और ऑफलाइन बैच चलते हैं। कमाई से ज़्यादा लोगों का मुझ पर भरोसा मेरे लिए बहुत मायने रखता है।”

वक्त का सही इंतज़ाम
आज रुख्सार का रोज़ाना का शेड्यूल बहुत बिज़ी होता है। उनका बड़ा बेटा 12वीं में है, बेटी 8वीं में और सबसे छोटा बेटा अभी पहली क्लास में है। घर में कोई नौकरानी रखे बिना पूरे घर का काम, तीनों बच्चों की पढ़ाई, परिवार की ज़िम्मेदारी और अपने योगा बैच...इन सभी चीज़ों को वह अकेले ही बेहद आसानी से संभालती हैं।
रुख्सार की ज़िंदगी में योगा क्लासेज़ के दौरान कई बार धोखाधड़ी हुई, लोगों के ताने सुनने पड़े, कपड़ों और नकाब को लेकर कमेंट्स भी आए। लेकिन उन्होंने इन सब को नज़रअंदाज़ करते हुए सिर्फ अपने काम पर ध्यान दिया। आज वह एक कामयाब हेल्थ कोच के तौर पर अपने पैरों पर खड़ी हैं।
महिलाओं को हौसला देते हुए रुख्सार कहती हैं, “कई महिलाएं कहती हैं कि अब हमारी उम्र निकल गई है। लेकिन उम्र की कोई पाबंदी नहीं होती। आप बुढ़ापे में भी उतनी ही खूबसूरत दिख सकती हैं। सबसे पहले खुद को अहमियत दें। आप हैं तो सब कुछ है। अपनी इज़्ज़त करें, दुनिया खुद-ब-खुद आपकी इज़्ज़त करेगी।”
अगर सीखने की लगन हो और मेहनत करने का जज़्बा हो, तो एक हाउसवाइफ होना आपकी कमज़ोरी नहीं बल्कि आपकी ताक़त बन सकता है, यह बात रुख्सार खान की कहानी से साफ ज़ाहिर होती है।