किशोर सिंह सोलंकी/ अजमेर
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के पाकिस्तान संबंधी बयान पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अजमेर दरगाह से जुड़े नसीरुद्दीन चिश्ती ने अब्दुल्ला की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। वहीं, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी पाकिस्तान को कश्मीर का रक्षक बताए जाने के विचार से असहमति जताई है।
दोनों की प्रतिक्रिया का मुख्य आधार पाकिस्तान की भूमिका को लेकर असहमति है। चिश्ती ने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद, हिंसा और भारतीय जवानों की शहादत का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। दूसरी ओर, गुलाम नबी आजाद ने कहा कि पाकिस्तान को कश्मीर का मददगार बताना सही नहीं है। उनके मुताबिक, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लोगों की स्थिति को भी इस बहस में ध्यान में रखना चाहिए।
फारूक अब्दुल्ला की टिप्पणी के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है कि कश्मीर के राजनीतिक भविष्य, आतंकवाद और भारत पाकिस्तान संबंधों को किस नजरिये से देखा जाना चाहिए।
नसीरुद्दीन चिश्ती ने पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए सवाल
अजमेर दरगाह से जुड़े नसीरुद्दीन चिश्ती ने फारूक अब्दुल्ला की टिप्पणी पर असहमति जताते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा के कारण बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की जान गई है। उन्होंने भारतीय जवानों की शहादत का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान को कश्मीर के लोगों का मददगार बताना उचित नहीं है।
चिश्ती के मुताबिक, जम्मू कश्मीर के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को सार्वजनिक बयान देते समय जिम्मेदारी बरतनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से प्रभावित परिवारों के दुख और बलिदान को ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की भूमिका को लेकर किसी भी चर्चा में कश्मीर में हुई हिंसा और उसके सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
I respect Farooq Sahab, but his statement is completely incorrect. If anyone is an enemy of India and the people of J&K, it is Pakistan. Look at the situation in PoK, where people are protesting for their rights. Since 1947, successive Central governments, from Nehru to Modi, have contributed to J&K’s development, irrespective of political affiliations.
— Ghulam Nabi Azad (@ghulamnazad) October 25, 2026
गुलाम नबी आजाद बोले, पाकिस्तान रक्षक नहीं
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी के अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद ने भी फारूक अब्दुल्ला के बयान पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि अब्दुल्ला लंबे समय तक भारतीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं और कई बार मुख्यमंत्री के साथ केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में उन्हें इस तरह की टिप्पणी की उम्मीद नहीं थी।
आजाद ने कहा, "मैं इस दावे से पूरी तरह असहमत हूं कि पाकिस्तान हमारा रक्षक है। पाकिस्तान हमारा विनाश करने वाला है, रक्षक नहीं।"
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाना और वहां के लोगों के लिए रोजगार तथा कारोबार के अवसर पैदा करना दो अलग बातें हैं। उनके मुताबिक, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लोगों की स्थिति पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
आजाद ने दावा किया कि वहां के लोग पाकिस्तान से मुक्ति चाहते हैं और भारत के साथ जुड़ने की इच्छा रखते हैं। यह उनका राजनीतिक आकलन है। इस दावे को सभी स्थानीय लोगों की राय नहीं माना जा सकता।
विकास और आतंकवाद पर भी छिड़ी बहस
गुलाम नबी आजाद ने जम्मू कश्मीर में हुए विकास का श्रेय केंद्र की विभिन्न सरकारों को दिया। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग अलग सरकारों ने क्षेत्र के विकास में योगदान दिया है।
उन्होंने सड़कों, सुरंगों, राजमार्गों और रेल संपर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं का जिक्र किया। साथ ही, उन्होंने जम्मू कश्मीर में दशकों से चली आ रही हिंसा और आतंकवाद के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया।
इस तरह फारूक अब्दुल्ला के बयान पर उठे सवाल अब केवल पाकिस्तान की भूमिका तक सीमित नहीं हैं। इनके केंद्र में जम्मू कश्मीर का विकास, आतंकवाद से प्रभावित परिवारों का दर्द और क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग अलग दृष्टिकोण भी हैं।
कश्मीर की राजनीति में बयान का क्या महत्व है?
फारूक अब्दुल्ला की टिप्पणी पर आई प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका एक संवेदनशील राजनीतिक विषय बनी हुई है। एक तरफ राज्य का दर्जा, निर्वाचित सरकार के अधिकार और केंद्र के साथ संबंधों को लेकर बहस जारी है। दूसरी तरफ आतंकवाद और हिंसा का इतिहास राजनीतिक बयानों को लेकर लोगों की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है।
नसीरुद्दीन चिश्ती और गुलाम नबी आजाद ने अपने अपने नजरिये से फारूक अब्दुल्ला के बयान का विरोध किया है। हालांकि, दोनों की राजनीतिक और सामाजिक भूमिकाएं अलग हैं। उनकी टिप्पणियों को उसी संदर्भ में समझना चाहिए।
फिलहाल इस विवाद पर फारूक अब्दुल्ला की टिप्पणी और उस पर उठे सवाल चर्चा में हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस इस आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या अब्दुल्ला अपने बयान के संदर्भ में कोई और स्पष्टीकरण देते हैं।