फरूखनगर के मोहम्मद अमीर बख्श के परिवार का दशहरा से है पुराना रिश्ता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 21-10-2023
अंग्रेजी हकुमत से पहले से दशहरा मना रहा फरूखनगर के मोहम्मद अमीर बख्श का परिवार
अंग्रेजी हकुमत से पहले से दशहरा मना रहा फरूखनगर के मोहम्मद अमीर बख्श का परिवार

 

दयाराम वशिष्ठ / नई दिल्ली 

इस वर्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में दशहरा कुछ खास रहेगा. जहां फरूखनगर के 58 वर्षीय कारीगर मोहम्मद आजम अली के बनाए हुए रावण, मेघनाद व कुंभकरण के पुतले लगेंगें. आजम अली रामायण को बारीकी से पढकर व देखकर ही इन पुतलों को रूप व आकृति देने में जुटे हैं. नवरात्रों के शुभारंभ के साथ ही भूमि पूजन के बाद शहरों में रामलीला मंचन शुरू हो चुका है. धूमधाम से दशहरा मनाने की तैयारी हो रही है. रावण दहन को लेकर कारीगर पुतला बनाने में जुटे हैं. 
 

अंग्रेजी हुकूमत के पहले से पुतला बना रहा है मोहम्मद आजम अली का खानदान

फरूखनगर (गाजियाबाद) के रहने वाले मोहम्मद आजम अली ने बताया कि पहले राजा महाराजा व राजस्थान से जुडे बडे लोग पगडी के स्थान पर बांस व रंगीन पैपर से तैयार होने वाली पगडी नुका मोड को सिर पर पहनते थे. उनके पर दादा मोहम्मद अमीर बख्श मोड बनाने का काम करते थे.

इसलिए उनका मुगल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह व उर्दू के जाने माने शायर बहादुर शाह जफर के समय से दिल्ली आना जाना रहता था. उनका दावा है कि दिल्ली के किनारी बाजार वाले सेठ लोगों के कहने पर पहली बार उनके पुरखों ने पहली बार 30 फुट का रावण रामलीला मैदान में बनाया था. इससे पहले घास फूंस जलाकर रावण दहन किया जाता था.

इसके चलते उनका यह काम उनके पुरखे मोहम्मद इस्माइल, मोहम्मद इसाक याकूब व पिता मोहम्मद इलियास करते रहे. वर्ष 1988 से उन्होंने इस पुश्तैनी काम को आगे बढाते हुए पहली बार लव-कुश रामलीला कमेटी के पुतलों को बनाने की परंपरा  कायम रखी. तब से आज तक वे लगातार रावण, मेघनाद व कुंभकरण के पुतलों को बनाने का काम करते आ रहे हैं. 

रामायण पढकर व आकृति देख हर हर बार कुछ नया करने का रहता है जज्बा 

यूपी में रहने वाला मोहम्मद आजम अली का यह परिवार हिन्दू परंपरा से जुड़ा हुआ है. फरूखनगर गांव में सभी धर्मों के लोग रहते हैं. जहां पूरी तरह सभी के बीच भाई चारा कायम रहता है. मोहम्मद आजम अली गांव के प्रधान भी रह चुके हैं. वह नियमित कुरान पढते हैं, लेकिन रामायण के सभी पात्र उनके मन में बसे हैं. दरअसल, वह रामायण के आधार पर अपनी कलाकारी को बखूबी निखार रहे हैं.

उनका कहना है कि वह रामायण पढकर व आकृति देखकर हर बार कुछ नया करते आ रहे हैं. रावण दहन आकर्षण का केंद्र होता है. इनमे सभी की नजरें विशालकाय रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले व उनके दहन कार्यक्रमों पर टिकी रहती हैं. इसलिए वह हर बार खास करने का प्रयास करते हैं. 

राम का तीर लगते ही 80 फुट दशानन की नाभी से बहेगा खून, आंख से निकलेंगे आंसू

इस बार दिल्ली के रामलीला मैदान में दशहरा पर बनाए जा रहे रावण के पुतले की खासियत यह रहेगी कि राम का तीर लगत ही उनकी नाभी से खून बहेगा और आंख से आंसू निकलेंगे. यहीं नहीं, उनका मुंह तीर लगने से पहले व बाद तक हरकत करता हुआ दिखाई देगा. मोहम्मद आजम अली ने बताया कि इस बार रावण 80 फुट, कुंभकरण 75 फुट व मेघनाथ 70 फुट का तैयार किया गया है. आकृति को रंग व रूप भी रामायण में देखकर दिया गया है.

हुबहु दिखाई देगी सोने की लंगा

दिल्ली के रामलीला मैदान में इस बार लंका चार मंजिला होगी. जो हुबहु रामायण में दिखने वाली सोने की लंका की तरह दिखाई देगी. रामायण को देखकर लंका को न केवल सोने का रूप देकर बनाया गया है, अपितु 40 गुना 40 फुट के आकार की लंका के प्रवेश पर चौकीदार व लंकनी का पुतला भी दहन होता दिखाई देगा. डिजाइन के साथ साथ ड्रेस भी पहले से अलग होगी.

पुस्तैनी काम में हाथ बंटा रहे हैं बेटा व भतीजे

दशहरा पर इन पुतलों के दहन की परंपरा है. इस काम में उनका बेटा व भतीजा भी हाथ बंटाता है. अब तक वह 1 हजार से अधिक पुतला बना चुके हैं. इस समय दिल्ली में 40 से अधिक कारीगर उनकी देखरेख में पुतलों का निर्माण करने में जुटे हैं. दिल्ली व भारतवर्ष में उनके उनके 150 से 200 कारीगर है, जो काम सीखकर अपना काम कर रहे हैं.

इस कार्य से उनका परिवार न केवल आपसी भाईचारे और सौहार्द की तस्वीर पेश कर रहे हैं बल्कि गंगा जमुना तहजीब की भी मिसाल कायम कर रहे हैं. रामलीला के समय में ही वह इन पुतलों को बनाने का काकम करते हैं. बाकी दिनों में मोहम्मद आजम अली व उसका परिवार शादी-ब्याह की सजावट करने का काम करता है.

दशहरा पर्व में रह भरने का काम कर रहे हैं मुस्लिम परिवार

मुस्लिम परिवार हिंदुओं के इस पवित्र पर्व दशहरा में रंग भरने का काम कर रहा है. जो हिंदू-मुस्लिम की एकता और आपसी सौहार्द का संदेश दे रहे हैं. मोहम्मद आजम अली कहते हैं कि मुस्लिम दशहरा को हिन्दुओं का ही नहीं, अपना भी त्योहार मानते हैं. लम्बे आरसे से उनके पुरखे इस त्योहार से जुड़े रहे हैं.

रावण के पुतले बनाकर उनके घरों में रोटी का इंतज़ाम होता रहा है. ऐसे में वे खुद रामायण से जुड़े हुए हैं. ऐसे में दशहरा उनका भी उतना ही त्योहार है जितना कि हिन्दुओं का. अरसे से रावण बनाकर मुसलिम कारीगरों की रोजी-रोटी चलती आइ है. लिहाजा दशहरा से कई दिन पहले से  ये लोग, रावण और मेघनाद के पुतले बनाना शुरू कर देते हैं. 

आसाम से मंगाए गए हैं पुतले बनाने के लिए बांस

रामलीला मैदान दिल्ली  में जो पुतले बनाए गए हैं, उनमें बांस आसाम से लाए गए हैं. हालांकि सोमवार को हुई बारिश से उन्हें काफी हद तक नुकसान हुआ है. दिल्ली में जो टेंट लगाया, वह पुतलों की लंबाई के अनुरूप छोटा था, इस कारण उनके पुतलों पर लगा पेपर बारिश से खराब हो गया. इससे उन्हें एक लाख रुपये तक का नुकसान हुआ है.

रावण की चाची ताडका का हो चुका है वध

रावण की चाची ताडका का पुतला भी बनाया गया, जिसके एक दिन पहले वध किया जा चुका है. जबकि लंका की लंकनी व चौकीदार का पुतला बनाया जा रहा है.

पटाखा न लगाकर जलेगी बुलंदशहर की घास

पर्यावरण की दृष्टि से इस बार रामलीला मैदान में पुतलों का शोर सुनाइ नहीं देखा. इस बार पटाखा न लगाकर पुतलों में घास लगाई गई है. यह घास उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से मंगाई गई है.