The Significance of the Yellow Dastarkhan in Ramadan: Tradition, Symbolism, and Understanding
अर्सला खान/नई दिल्ली
रमज़ान का महीना इबादत, सब्र करने का माना जाता है। इस महीने में इफ्तार और सहरी के दौरान जो चादर या कपड़ा बिछाया जाता है, उसे आम तौर पर “दस्तरख़ान” कहा जाता है। कई जगहों पर खास तौर पर पीले रंग का दस्तरख़ान बिछाने की परंपरा देखने को मिलती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस रंग का कोई खास धार्मिक महत्व है? क्या मुस्लिम ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है? इस विषय को समझने के लिए कुरआन और हदीस की रोशनी में बात करना ज़रूरी है। 
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इस्लाम में खाने के लिए साफ और पाक जगह का होना अहम माना गया है। हदीसों में सादगी, सफाई और साझा करने की शिक्षा दी गई है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सादगी से खाना पसंद करते थे और जमीन पर बिछी चादर या चटाई पर बैठकर भोजन करते थे। हालांकि किसी खास रंग के दस्तरख़ान का सीधा उल्लेख कुरआन या हदीस में नहीं मिलता। यानी पीले रंग को अनिवार्य या धार्मिक रूप से विशेष नहीं बताया गया है।
फिर भी रंगों का इस्लामी परंपरा में एक प्रतीकात्मक महत्व जरूर है। कुरआन में रंगों का जिक्र कई जगह आता है। सूरह अल-बक़रह (2:69) में पीले रंग का उल्लेख एक गाय के संदर्भ में मिलता है, जहां कहा गया कि उसका रंग चमकीला पीला था, जो देखने वालों को खुशी देता है। इस आयत से यह संकेत मिलता है कि पीला रंग खुशी, रोशनी और ताजगी का प्रतीक हो सकता है। हालांकि यह सीधे दस्तरख़ान से जुड़ा आदेश नहीं है, लेकिन रंग के सकारात्मक अर्थ को दर्शाता है।
इस्लामी विद्वानों के अनुसार, पीला रंग अक्सर सादगी और रौनक का प्रतीक माना जाता है। कई मुस्लिम समाजों में रमज़ान के दौरान घरों को हल्के और उजले रंगों से सजाने की परंपरा रही है। पीला रंग रोशनी और उम्मीद का अहसास देता है, जो रमज़ान के आध्यात्मिक माहौल से मेल खाता है। इसलिए कुछ क्षेत्रों में पीले दस्तरख़ान का इस्तेमाल एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में विकसित हुआ।
भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में, पीला रंग बरकत और खुशी का प्रतीक माना जाता है। यहां रमज़ान में खास तौर पर साफ और चमकीले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। पीला दस्तरख़ान मेहमाननवाज़ी और अपनत्व का भी प्रतीक बन गया है। हालांकि यह धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा है, जो समय के साथ प्रचलित हुई।

इसके अलावा कपड़े पर चारों तरफ उर्दू/अरबी में कुछ धार्मिक शब्द या दुआएँ लिखी हुई दिखाई देती हैं। लिखावट सजावटी अंदाज़ में है, इसलिए पूरी तरह साफ़ पढ़ना मुश्किल है, लेकिन आमतौर पर ऐसे दस्तरख़ानों पर ये शब्द लिखे होते हैं:
या अल्लाह
या मोहम्मद
बिस्मिल्लाह
अन्य इस्लामी दुआएँ और कलिमे
बीच में गोल डिजाइन है, जिसमें फूलों और ज्यामितीय पैटर्न के साथ चाँद और सितारे बने हुए हैं, जो इस्लामी प्रतीक माने जाते हैं। इस्लाम में मूल बात नीयत और सादगी की है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने खाने के दौरान तकल्लुफ से बचने और फिजूलखर्ची न करने की शिक्षा दी। इसलिए दस्तरख़ान का रंग चाहे कोई भी हो, अहम यह है कि वह साफ हो, पाक हो और उस पर बैठकर लोग मिलजुलकर खाना खाएं। रमज़ान का असली मकसद दिखावा नहीं, बल्कि आत्मसंयम और साझा भावना है।
कुछ सूफी परंपराओं में पीला रंग आध्यात्मिक जागरूकता और सादगी का प्रतीक भी माना गया है। हालांकि यह विचार सांस्कृतिक और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ा है, न कि किसी अनिवार्य धार्मिक नियम से। इसलिए यह कहना सही होगा कि पीले दस्तरख़ान का महत्व धार्मिक से ज्यादा सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक है।
आज के समय में सोशल मीडिया और बाजार की वजह से भी कई रंगों के दस्तरख़ान ट्रेंड में आते रहते हैं। लेकिन इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, रंग से ज्यादा अहम बात यह है कि इफ्तार में बैठने वाले लोग शुक्रगुज़ार हों और जरूरतमंदों का ख्याल रखें। रमज़ान का असली सौंदर्य सादगी, समानता और भाईचारे में है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि रमज़ान में पीले रंग का दस्तरख़ान कोई धार्मिक अनिवार्यता नहीं है। मुस्लिम ग्रंथों में इसका सीधा आदेश नहीं मिलता। हां, रंगों के सकारात्मक अर्थ और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण कुछ जगहों पर इसे खास माना जाता है। असली महत्व उस भावना का है, जिसके साथ दस्तरख़ान बिछाया जाता है साझा करना, शुक्र अदा करना और सादगी से जीवन जीना।