मालेगांव महानगरपालिका पर ‘सेक्युलर फ्रंट’ का कब्जा, दो मुस्लिम ममहिलाओं के हाथ में शहर की कमान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 12-02-2026
The 'Secular Front' has taken over the Malegaon Municipal Corporation, with two Muslim women taking charge of the city.
The 'Secular Front' has taken over the Malegaon Municipal Corporation, with two Muslim women taking charge of the city.

 

आवाज द वाॅयस /मालेगांव ( महाराष्ट्र ) 

महाराष्ट्र के नाशिक जिले के मालेगांव महानगरपालिका की महापौर और उपमहापौर चुनाव में इस बार महिला नेतृत्व का दबदबा देखने को मिला। खास बात यह रही कि मुस्लिम बहुल मालेगांव में महापौर और उपमहापौर जैसे दोनों अहम पदों पर मुस्लिम महिलाओं का चुनाव हुआ है। इस्लाम पार्टी की उम्मीदवार शेख नसरीन खालिद मालेगांव की नई महापौर चुनी गई हैं, जबकि उपमहापौर पद पर समाजवादी पार्टी की नगरसेविका शान-ए-हिंद निहाल अहमद ने जीत दर्ज की है। इस नतीजे ने शहर की राजनीति में एक नया संदेश दिया है और स्थानीय स्तर पर बने राजनीतिक समीकरणों को भी स्पष्ट कर दिया है।

84 सदस्यीय मालेगांव महानगरपालिका में बहुमत के लिए 43 मतों की आवश्यकता थी। इस्लाम पार्टी और समाजवादी पार्टी ने मिलकर ‘मालेगांव सेक्युलर फ्रंट’ का गठन किया था। इस गठबंधन को कांग्रेस का समर्थन भी मिला, जिससे सत्ता तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान हो गया। महापौर पद के चुनाव में शेख नसरीन खालिद को कुल 43 मत प्राप्त हुए। इनमें इस्लाम पार्टी के 35, समाजवादी पार्टी के 5 और कांग्रेस के 3 नगरसेवकों के मत शामिल थे। इस तरह गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत के साथ जीत दर्ज की।

इस चुनाव में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना (शिंदे गुट) को बड़ा झटका लगा। केंद्र और राज्य में सत्ता की साझेदार भारतीय जनता पार्टी ने इस मतदान से दूरी बनाए रखी और तटस्थ रहने का निर्णय लिया। सेक्युलर फ्रंट के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरी शिंदे गुट की उम्मीदवार लता घोडके को केवल 18 मत ही मिल सके। वहीं एआईएमआईएम के 21 और भाजपा के 2 नगरसेवकों ने मतदान का बहिष्कार किया। अन्य संभावित उम्मीदवारों द्वारा नामांकन वापस ले लेने के कारण मुकाबला सीधा हो गया था, जिससे परिणाम और भी स्पष्ट रूप से सामने आया।

उपमहापौर पद के चुनाव में भी सेक्युलर फ्रंट ने अपनी एकजुटता दिखाते हुए जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी की शान-ए-हिंद निहाल अहमद ने शिवसेना (शिंदे गुट) के उम्मीदवार एडवोकेट निलेश काकडे को हराया। निहाल अहमद को 43 मत मिले, जबकि निलेश काकडे को 18 मतों से संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में भी एआईएमआईएम और भाजपा ने मतदान से दूरी बनाए रखी। दोनों प्रमुख पदों पर मिली जीत से गठबंधन की मजबूती और रणनीतिक एकता स्पष्ट हुई है।

मालेगांव महानगरपालिका के चुनाव 15 जनवरी को संपन्न हुए थे। इन चुनावों में इस्लाम पार्टी ने 35 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर सबको चौंका दिया था। पूर्व विधायक शेख आसिफ शेख रशीद ने पिछले वर्ष विधानसभा चुनावों के दौरान शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से अलग होकर ‘इस्लाम’ नाम से एक नए राजनीतिक दल की स्थापना की थी। उस समय इस फैसले की विभिन्न स्तरों पर आलोचना भी हुई थी और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे जोखिम भरा कदम बताया था। हालांकि, पार्टी गठन के कुछ ही महीनों के भीतर महानगरपालिका में सत्ता स्थापित कर शेख आसिफ ने अपनी राजनीतिक पकड़ साबित कर दी है।

नवनिर्वाचित महापौर शेख नसरीन खालिद एक राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आती हैं। वह पूर्व विधायक शेख आसिफ के भाई शेख खालिद की पत्नी हैं। मालेगांव की राजनीति में शेख रशीद परिवार का लंबे समय से प्रभाव रहा है और नसरीन की जीत ने इस प्रभाव को एक बार फिर रेखांकित किया है। हाल ही में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुंबई को ‘बुर्केवाली महापौर’ मिलने की बात कही थी, लेकिन मालेगांव में इस्लाम पार्टी ने मुस्लिम महिला नेतृत्व को आगे कर एक अलग राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

मालेगांव के राजनीतिक इतिहास में शेख रशीद परिवार का दबदबा दशकों से कायम रहा है। शेख नसरीन इस परिवार की तीसरी सदस्य हैं जो महापौर पद तक पहुंची हैं। इससे पहले शेख रशीद और उनकी पत्नी ताहिरा रशीद भी मालेगांव के महापौर रह चुके हैं। वर्ष 2022 में शेख रशीद ने अपने परिवार के साथ कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में प्रवेश किया था, जिससे मालेगांव में कांग्रेस की स्थिति काफी कमजोर हो गई थी। बाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद आसिफ शेख ने अलग राह चुनते हुए इस्लाम पार्टी की स्थापना की और पहली ही कोशिश में महानगरपालिका पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

 

 

मालेगांव में हुए इस सत्ता परिवर्तन को केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे राज्य की व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी समझा जा रहा है। भाजपा की तटस्थ भूमिका और एआईएमआईएम का मतदान से दूर रहना, दोनों ने परिणाम को निर्णायक बनाने में अहम भूमिका निभाई। फिलहाल, सेक्युलर फ्रंट के नेतृत्व में बनी नई सत्ता से शहर में विकास कार्यों और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। महिला नेतृत्व की इस ऐतिहासिक जीत ने मालेगांव की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।