करीब बीस वर्ष पहले की बात है। बस्तावाड़ा गांव में रहने वाले शिवानंद कादय्या पुजेरी और उनकी पत्नी की एक सड़क दुर्घटना में असमय मृत्यु हो गई। पीछे रह गए दो मासूम बच्चे—चार साल का सोमशेखर और दो साल का वसंत। न कोई नजदीकी रिश्तेदार, न सहारा देने वाला कोई अपना।

घर का चूल्हा ठंडा पड़ चुका था और आंगन में खेलते बच्चों की किलकारियां अचानक सिसकियों में बदल गई थीं। ऐसे कठिन समय में आगे आए महबूब नाइकवाड़ी, जो शिवानंद के घनिष्ठ मित्र थे। उन्होंने और उनकी पत्नी नूरजहाँ ने न केवल इन बच्चों की स्थिति पर संवेदना जताई, बल्कि एक ऐसा निर्णय लिया जिसने इन अनाथ बच्चों की किस्मत बदल दी।
शुरुआत में मृतक दंपति के मित्रों ने दूर-दराज के रिश्तेदारों की तलाश की, ताकि बच्चों की परवरिश उनके ही समुदाय में हो सके। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद कोई आगे नहीं आया। तब नाइकवाड़ी दंपति ने बिना किसी संकोच के इन दोनों बच्चों को अपने घर लाने का निर्णय किया। यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि उनके अपने पाँच बच्चे पहले से थे। फिर भी उन्होंने यह नहीं सोचा कि जिम्मेदारियां बढ़ेंगी या समाज क्या कहेगा। उन्होंने केवल इतना देखा कि दो मासूमों को परिवार और सुरक्षा की जरूरत है।
महबूब और नूरजहाँ ने बच्चों को गोद लेने के बाद एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया,उन्होंने उन्हें उनके मूल धर्म और परंपराओं के अनुसार ही पाला-पोसा। उन्होंने कभी यह कोशिश नहीं की कि बच्चे अपनी पहचान बदलें। घर में ईद भी मनती रही और दीपावली भी। रमजान के रोज़ों के साथ-साथ महाशिवरात्रि की पूजा भी उतनी ही श्रद्धा से होती रही। बच्चों को मंदिर ले जाया जाता, उनके संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न किए जाते और साथ ही उन्हें यह भी सिखाया जाता कि सभी धर्म समान हैं।
समय बीतता गया। सोमशेखर और वसंत ने स्कूल की पढ़ाई पूरी की, कॉलेज गए और अपनी मेहनत से आगे बढ़ते रहे। सोमशेखर ने बीएससी की डिग्री हासिल की और बेलगावी की एक विमानन कंपनी में नौकरी प्राप्त की। यह केवल एक नौकरी नहीं थी, बल्कि उन संघर्षों की जीत थी, जिनसे गुजरकर वह यहां तक पहुंचा था। महबूब और नूरजहाँ के चेहरे पर उस दिन जो गर्व था, वह किसी भी माता-पिता के गर्व से कम नहीं था।
जब सोमशेखर विवाह योग्य हुआ, तो नाइकवाड़ी दंपति ने उसी जिम्मेदारी और उत्साह से उसके लिए रिश्ता तलाशना शुरू किया, जैसे कोई भी माता-पिता करते हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि विवाह उसी समुदाय में हो, जिससे सोमशेखर का जन्म हुआ था। परिचितों के माध्यम से वे महाराष्ट्र के गढ़िंगलाज तालुका के तनवाड़ गांव पहुंचे, जहां वीरशैव लिंगायत परिवार की बेटी पूनम से मुलाकात हुई। परिवारों की सहमति से रिश्ता तय हुआ और विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।Union of harmony: Muslim couple from Belagavi hold adopted son’s wedding according to Veerashaiva Lingayat rituals. Mehboob Hasan Naikwadi, a retired KSRTC driver, and his wife Noor Jahan, organised the marriage of their adopted son Somashekar Pujeri with Poonam.… pic.twitter.com/lN8yI5QgBN
— LINGAYATH OFFICIAL (@AkhandLINGAYATH) February 11, 2026
8 फरवरी का दिन हुक्केरी के लिए विशेष बन गया। विवाह मंडप में पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार मंत्रोच्चार हो रहे थे। सोमशेखर और पूनम ने अग्नि के समक्ष सात फेरे लिए। महबूब और नूरजहाँ ने पूरे हर्षोल्लास से मेहमानों का स्वागत किया। उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे यह उस यात्रा का उत्सव था, जो बीस साल पहले दो अनाथ बच्चों को गले लगाने से शुरू हुई थी। वहां उपस्थित लोगों के लिए यह दृश्य केवल एक शादी नहीं, बल्कि सांप्रदायिक एकता का प्रेरक उदाहरण था।
70 वर्ष से अधिक आयु के महबूब नाइकवाड़ी ने पत्रकारों से विनम्रता से कहा कि उन्होंने कोई असाधारण काम नहीं किया। उनके शब्दों में गहरी सरलता थी—“मुझे नहीं लगता कि मैंने और मेरी पत्नी ने कुछ खास किया है। इस देश के सभी लोग भाई-बहन हैं। मुझे खुशी है कि ये बच्चे मेरे घर में पले-बढ़े, पढ़े-लिखे और अपने पैरों पर खड़े हुए। अब मैं संतोष के साथ कह सकता हूं कि मैंने अपना कर्तव्य निभा दिया।” उनके इन शब्दों में वह दर्शन छिपा है, जो आज के समय में सबसे अधिक जरूरी है,मानवता का धर्म।
महबूब अब अपने दूसरे दत्तक पुत्र वसंत की शादी का भी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए यह केवल सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता का प्रतीक है। उन्होंने जिस स्नेह और समानता के साथ दोनों बच्चों का पालन-पोषण किया, वह आज समाज के लिए प्रेरणा बन चुका है।
यह कहानी बताती है कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल से बनते हैं। जब समाज में विभाजन की बातें होती हैं, तब हुक्केरी की यह शादी हमें याद दिलाती है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। महबूब और नूरजहाँ ने अपने आचरण से साबित किया कि प्रेम और करुणा की कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने न केवल दो बच्चों को नया जीवन दिया, बल्कि यह भी दिखाया कि विविधता में एकता केवल नारा नहीं, बल्कि जीने का तरीका है।
आज जब सोमशेखर अपने नए जीवन की शुरुआत कर चुका है, तब उसके पीछे खड़े उसके माता-पिता महबूब और नूरजहाँ,सिर्फ एक मुस्लिम दंपति नहीं, बल्कि मानवता के प्रतीक बन चुके हैं। उनकी यह पहल आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएगी कि अगर दिल में सच्चाई और नीयत में नेकी हो, तो समाज की दीवारें खुद-ब-खुद गिर जाती हैं। हुक्केरी की यह शादी इतिहास के पन्नों में भले न दर्ज हो, लेकिन लोगों के दिलों में जरूर अंकित रहेगी,एक ऐसी मिसाल के रूप में, जहां प्यार ने हर भेदभाव को मात दे दी।




