ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
इन दिनों सोशल मीडिया पर भारत की सुपर बॉक्सर निखत ज़रीन का एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह कड़ी बॉक्सिंग प्रैक्टिस करती नज़र आ रही हैं। पसीने से भीगा शरीर, आंखों में फोकस और हर पंच में आत्मविश्वास,यह वीडियो सिर्फ़ उनकी फिटनेस या ट्रेनिंग का नहीं, बल्कि उस जुनून का आईना है, जिसके सहारे निखत आने वाले ओलंपिक और कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए खुद को पूरी शिद्दत से तैयार कर रही हैं। यह दृश्य एक और बड़ा संकेत देता है-भारतीय मुक्केबाज़ी में मुस्लिम खिलाड़ियों की मज़बूत और निर्णायक मौजूदगी।

मुक्केबाज़ी महज़ एक खेल नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मसंयम, साहस और धैर्य की परीक्षा है। यह उन जुझारू खिलाड़ियों की कहानी भी कहती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों, सामाजिक दबावों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद हार मानने से इनकार किया। भारतीय खेल परिदृश्य में मुक्केबाज़ी ने जिस तरह अपनी अलग पहचान बनाई है, उसमें मुस्लिम मुक्केबाज़ों का योगदान न केवल गौरवपूर्ण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्तंभ भी है।
आज भारत खेल अवसंरचना, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। बड़े स्टेडियम, विदेशी कोच और आधुनिक सुविधाएं अब तस्वीर का हिस्सा हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि कई खिलाड़ियों का सफर अब भी संघर्षों से होकर गुजरता है। इस संघर्ष की सबसे सशक्त और चमकदार मिसाल महिला मुक्केबाज़ी में देखने को मिलती है,जहां निखत ज़रीन भारतीय महिला मुक्केबाज़ी की पहचान बन चुकी हैं।
तेलंगाना के निज़ामाबाद जिले से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचना निखत के लिए आसान नहीं था। एक साधारण मुस्लिम परिवार में जन्मी निखत को बचपन से ही खेल का शौक था, लेकिन महिला मुक्केबाज़ी को लेकर समाज की सोच, संसाधनों की कमी और चयन प्रक्रिया में बार-बार उठने वाले विवाद उनके रास्ते की बड़ी बाधाएं बने। कई मौकों पर शानदार प्रदर्शन के बावजूद उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया, लेकिन निखत ने कभी हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
विश्व महिला मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में दो बार स्वर्ण पदक जीतना, कॉमनवेल्थ गेम्स में शीर्ष प्रदर्शन और एशियाई स्तर पर लगातार सफलता,ये उपलब्धियां सिर्फ़ पदकों की सूची नहीं हैं, बल्कि उस मानसिक मजबूती का प्रमाण हैं, जिसने निखत को मौजूदा दौर की रोल मॉडल बना दिया है। आज वह उन हज़ारों लड़कियों की उम्मीद बन चुकी हैं, जो सामाजिक दबावों के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देती हैं।
निखत की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने धर्म, पहचान और खेल के बीच संतुलन साधने का उदाहरण पेश किया। मुक्केबाज़ी जैसे खेल में ड्रेस कोड और व्यक्तिगत आस्था को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन निखत ने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि खेल अनुशासन और धार्मिक विश्वास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथ-साथ चल सकते हैं। मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में, जब महिला एथलीट्स को बराबरी और सम्मान की लड़ाई लड़नी पड़ रही है, निखत ज़रीन भारतीय खेल व्यवस्था की एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरी हैं।
पुरुष मुक्केबाज़ी की बात करें तो तेलंगाना के नलगोंडा जिले से आने वाले मोहम्मद हुसामुद्दीन आज भी भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद नामों में शुमार हैं। रेलवे और सर्विसेज़ टीम से खेलते हुए उन्होंने अपनी तकनीक, फिटनेस और रणनीति को लगातार निखारा। अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज़ी अब बेहद तेज़ और तकनीकी हो चुकी है, लेकिन हुसामुद्दीन की पहचान एक शांत, संतुलित और रणनीतिक बॉक्सर के रूप में बनी हुई है।
एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजत पदक, कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य और कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भारत के लिए पदक जीतना इस बात का प्रमाण है कि अनुशासन और निरंतर प्रयास आज भी भारतीय मुक्केबाज़ी की रीढ़ हैं। हुसामुद्दीन की कहानी यह संदेश देती है कि अत्याधुनिक सुविधाओं की कमी भी किसी खिलाड़ी के रास्ते की दीवार नहीं बन सकती, बशर्ते लक्ष्य स्पष्ट और मेहनत ईमानदार हो।

अगर भारतीय मुस्लिम मुक्केबाज़ों की विरासत की बात की जाए, तो मणिपुर से आने वाले मोहम्मद अली क़मर का नाम इतिहास में मील का पत्थर है। उन्होंने भारत को विश्व एमेच्योर मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में पहला पदक दिलाकर देश को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया। गरीबी, सीमित संसाधन और कठिन हालात—इन सबके बीच क़मर का सफर आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी पहचान या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती।
एशियन गेम्स, एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप और विश्व स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले क़मर आज भी कोचिंग और मार्गदर्शन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। मौजूदा समय में, जब भारतीय महिला मुक्केबाज़ी वैश्विक स्तर पर सफलता की नई इबारत लिख रही है, उसके पीछे क़मर जैसे खिलाड़ियों और कोचों की विरासत भी छिपी है।
निखत ज़रीन, मोहम्मद हुसामुद्दीन और मोहम्मद अली क़मर की कहानियां सिर्फ़ व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं हैं। ये कहानियां उस सामूहिक संघर्ष को दर्शाती हैं, जिसमें आर्थिक तंगी, सामाजिक पूर्वाग्रह, अवसरों की असमानता और पहचान की चुनौती शामिल रही है। हर मुकाबला, हर पंच और हर हार-जीत ने इन खिलाड़ियों को सिर्फ़ बेहतर एथलीट ही नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरक प्रतीक भी बनाया है।

आज, जब भारत ओलंपिक और विश्व खेल मंच पर नई ऊंचाइयों का सपना देख रहा है, तब ये मुक्केबाज़ यह भरोसा दिलाते हैं कि मेहनत, आत्मविश्वास और समर्पण से हर बाधा को पार किया जा सकता है। निखत ज़रीन महिला मुक्केबाज़ी की नई पहचान हैं, हुसामुद्दीन पुरुष मुक्केबाज़ी में स्थिरता और तकनीक की मिसाल हैं, और मोहम्मद अली क़मर की विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए मशाल बनी हुई है।

बॉक्सिंग डे 2026 के मौक़े पर यह कहना बिल्कुल उचित होगा कि भारतीय मुस्लिम मुक्केबाज़ों ने न सिर्फ़ देश को गौरव दिलाया है, बल्कि यह भी साबित किया है कि खेल सबसे बड़ा समानता का मैदान है। संसाधन कम हों, सामाजिक दबाव हों या पहचान की चुनौती अगर इरादे मज़बूत हों, तो हर मुक्का सिर्फ़ विरोधी पर नहीं, बल्कि हालात पर भी भारी पड़ता है। यही भारतीय मुक्केबाज़ी की असली जीत है।