आज़ादी के 10 चर्चित नारे, जिन्होंने जगाई थी देशभक्ति की अलख

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 11-08-2026
10 famous freedom slogans that awakened patriotism
10 famous freedom slogans that awakened patriotism

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस सिर्फ तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने का दिन नहीं है। यह उन लाखों भारतीयों के संघर्ष, त्याग और बलिदान को याद करने का दिन है, जिन्होंने देश को अंग्रेजी हुकूमत से आज़ाद कराने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।

भारत की आज़ादी की लड़ाई लंबी थी। इस संघर्ष में कहीं सत्याग्रह हुआ, कहीं आंदोलन, कहीं क्रांतिकारियों ने हथियार उठाए और कहीं आम लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की। इस पूरे आंदोलन में नारों और गीतों ने भी बड़ी भूमिका निभाई। छोटे-छोटे वाक्यों में कही गई ये बातें लोगों के बीच तेजी से पहुंचती थीं और उनमें जोश भरती थीं।
 
आइए, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर याद करते हैं ऐसे ही 10 चर्चित नारों और उनके पीछे की कहानी को।

1. “करो या मरो”  महात्मा गांधी

8 अगस्त 1942 को मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने देशवासियों से अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का आह्वान किया। इसी आंदोलन के साथ उनका प्रसिद्ध संदेश “करो या मरो” देशभर में गूंज उठा।
 

गांधीजी का संदेश साफ था अब अंग्रेजी शासन को भारत से जाना होगा। अगले ही दिन कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन आंदोलन रुकने के बजाय देश के अलग-अलग हिस्सों में और फैल गया। इस नारे ने आम भारतीयों को यह एहसास कराया कि आज़ादी की लड़ाई अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है।
 
2. “इंकलाब ज़िंदाबाद” क्रांतिकारी आंदोलन की आवाज

“इंकलाब ज़िंदाबाद” स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे लोकप्रिय नारों में से एक बन गया। इसे मूल रूप से हसरत मोहानी से जोड़ा जाता है, जबकि भगत सिंह और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने इसे व्यापक लोकप्रियता दी।
 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 1929 में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद भी इस नारे का इस्तेमाल किया। उनके लिए इंकलाब का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि शोषण और अन्याय से मुक्त समाज की स्थापना भी था। आज भी यह नारा स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी तेवर और युवाओं के जोश की याद दिलाता है।
 

3. “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज के माध्यम से अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। सैनिकों और देशवासियों में जोश भरने के लिए उनका प्रसिद्ध आह्वान था “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।” इस संदेश में नेताजी ने देश की स्वतंत्रता के लिए व्यक्तिगत त्याग और बलिदान की भावना को सामने रखा।
 

आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों के लिए यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि संघर्ष का संकल्प था। नेताजी के नेतृत्व में हजारों भारतीयों ने देश की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी।
 
4. “जय हिंद” एक अभिवादन से राष्ट्रीय भावना तक

“जय हिंद” आज भारत का सबसे लोकप्रिय देशभक्ति अभिवादन है। इसे आज़ाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस के आंदोलन से विशेष लोकप्रियता मिली। आज़ाद हिंद फौज में यह एकता और देशभक्ति का प्रतीक बना। इसका संदेश सरल था देश सबसे ऊपर।
 

आज स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और सेना से जुड़े कार्यक्रमों में “जय हिंद” सुनाई देता है। यह उस दौर की याद दिलाता है जब देश को एकजुट करने के लिए ऐसे छोटे लेकिन प्रभावशाली शब्द बेहद महत्वपूर्ण थे।
 
5. “वंदे मातरम्”  मातृभूमि को नमन

“वंदे मातरम्” बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना आनंदमठ से निकला और आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण गीत बन गया। 19वीं और 20वीं सदी में यह गीत अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन करने वाले लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ।
 

सार्वजनिक सभाओं और आंदोलनों में लोग इसे एक साथ गाते थे। “वंदे मातरम्” ने भारत को मां के रूप में देखने और मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया।
 
6. “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक ने भारतीयों के सामने स्वराज यानी अपना शासन स्थापित करने की मांग को मजबूती से रखा। उनका प्रसिद्ध कथन “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।” भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा लेकर आया।
 

उस समय अंग्रेजी शासन के सामने इस तरह खुलकर स्वराज की मांग करना अपने आप में बड़ी बात थी। तिलक के इस विचार ने लोगों को राजनीतिक अधिकारों और आत्मशासन के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
 
7. “सरफ़रोशी की तमन्ना...” बलिदान की भावना

“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे लोकप्रिय क्रांतिकारी गीतों में से एक बन गया। यह कविता बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखी थी और बाद में राम प्रसाद बिस्मिल तथा अन्य क्रांतिकारियों के माध्यम से इसे व्यापक लोकप्रियता मिली।
 

इसकी पंक्तियां युवाओं में देश के लिए बलिदान देने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का जोश पैदा करती थीं। आज भी यह गीत सुनते ही स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों और उनके बलिदान की याद आती है।
 
8. “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो” आज़ादी की सीधी मांग

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक था। “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो” का संदेश बिल्कुल स्पष्ट था भारत अब अंग्रेजी शासन को स्वीकार नहीं करेगा।
 

आंदोलन के दौरान नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद छात्रों, किसानों, महिलाओं और आम लोगों ने इसे आगे बढ़ाया। कई जगह लोगों ने ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किए और भूमिगत आंदोलन चलाए। यह नारा उस समय की जनता के गुस्से और आज़ादी की मजबूत इच्छा की आवाज बन गया।
 
9. “पूर्ण स्वराज” आधी नहीं, पूरी आज़ादी

1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया गया। इसके बाद 26 जनवरी 1930 को देश के कई हिस्सों में पहली बार “स्वतंत्रता दिवस” मनाया गया और लोगों ने पूर्ण स्वतंत्रता का संकल्प लिया।
 

यह दौर भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। अब मांग सिर्फ सुधारों या सीमित अधिकारों की नहीं, बल्कि पूरी आज़ादी की थी। इसी ऐतिहासिक संकल्प की याद में आगे चलकर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
 
10. “दिल्ली चलो” आज़ाद हिंद फौज का आह्वान

सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फौज के संघर्ष से जुड़ा “दिल्ली चलो” नारा सैनिकों में जोश भरने वाला आह्वान था। इसका उद्देश्य था कि आज़ाद हिंद फौज भारत की ओर आगे बढ़े और ब्रिटिश शासन के केंद्र दिल्ली तक पहुंचे।
 

नेताजी के नेतृत्व में यह नारा सैनिकों के लिए एक लक्ष्य बन गया। आज़ाद हिंद फौज का सैन्य अभियान अंततः सफल नहीं हुआ, लेकिन उसके संघर्ष ने भारतीयों के मन में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक नई भावना पैदा की।
 
नारों ने कैसे बदली आंदोलन की तस्वीर?

आज के दौर में नारे हमें कुछ शब्दों की तरह लग सकते हैं, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के समय इनकी ताकत बहुत बड़ी थी। उस समय रेडियो और सोशल मीडिया जैसे माध्यम आम लोगों तक आसानी से उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में नारे, गीत, कविताएं और पर्चे विचारों को लोगों तक पहुंचाने के महत्वपूर्ण माध्यम थे।
 
 
एक छोटा सा नारा हजारों लोगों की जुबान पर आ जाता था। जुलूसों में लोग एक साथ इसे बोलते थे और इससे आंदोलनकारियों में एकता और उत्साह पैदा होता था। “करो या मरो” ने संघर्ष का संकल्प दिया, “इंकलाब ज़िंदाबाद” ने क्रांतिकारी जोश जगाया, “वंदे मातरम्” ने मातृभूमि के प्रति भावना मजबूत की और “जय हिंद” ने राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया।
 
 
आज़ादी के 79 साल बाद भी क्यों याद हैं ये नारे?

भारत को 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिली, लेकिन इन नारों की गूंज आज भी सुनाई देती है। वजह सिर्फ यह नहीं कि ये स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हैं, बल्कि इसलिए भी कि इनके पीछे साहस, एकता, त्याग और देश के लिए कुछ करने का जज़्बा छिपा है। आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तो इन नारों को याद करना उस पीढ़ी को याद करना है जिसने आज़ाद भारत का सपना देखा और उसके लिए संघर्ष किया।
 
 
तिरंगे के नीचे जब आज “जय हिंद” कहा जाता है, तो उसमें उन लाखों भारतीयों की आवाज़ भी शामिल होती है, जिन्होंने कभी “भारत छोड़ो”, “इंकलाब ज़िंदाबाद” और “करो या मरो” जैसे नारों के साथ आज़ादी की लड़ाई को आगे बढ़ाया था। इस स्वतंत्रता दिवस, आइए सिर्फ आज़ादी का जश्न न मनाएं, बल्कि उन नारों और उन लोगों को भी याद करें, जिन्होंने हमें आज़ाद भारत में सांस लेने का अधिकार दिलाया।