यूनुस अलवी, मेवात/नूंह/ हरियाणा
हरियाणा का मेवात इलाका अब एक नए और बड़े सामाजिक बदलाव का गवाह बन रहा है. दिल्ली से करीब सौ किलोमीटर दूर बसा यह मुस्लिम बहुल इलाका सालों से कई तरह की सामाजिक समस्याओं और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता था. साइबर ठगी और अपराध जैसी खबरों के लिए चर्चित इस क्षेत्र की पहचान अब तेजी से बदल रही है. मेवात का युवा अब अपना कल संवारने के लिए नए रास्ते तलाश रहा है. सबसे खास बात यह है कि अब यहां के युवा उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं.
हालात यह हैं कि इलाके से औसतन हर दस दिन में कोई न कोई युवा पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले में विदेश रवाना हो रहा है. यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे सोच और प्राथमिकताओं का एक लंबा सफर शामिल है.
एक जमाना था जब मेवात के किसी गांव से कोई लड़का विदेश जाता था, तो पूरे इलाके में यही चर्चा होती थी कि वह किसी खाड़ी देश में मजदूरी या कोई छोटा-मोटा काम करने गया है. उस दौर में विदेश जाने का मकसद बहुत सीमित था. परिवार की आर्थिक हालत सुधारना, पक्का मकान बनाना, थोड़ी जमीन खरीदना और घर के रोजमर्रा के खर्च चलाना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता होती थी.
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, बहरीन, कतर और कुवैत जैसे देशों में मेवात के अनगिनत लोग पहुंचे. वहां किसी ने राजमिस्त्री का काम संभाला तो किसी ने प्लंबिंग, ड्राइविंग, वेल्डिंग, इलेक्ट्रिशियन या कारपेंटरी की. इन खाड़ी देशों से आने वाली कमाई ने मेवात के हजारों परिवारों को भुखमरी से निकाला और एक मजबूत आर्थिक सहारा दिया.
समय बदला और अब विदेश जाने की यह पूरी तस्वीर ही बदल चुकी है. अब विदेश जाने का मतलब केवल मेहनत-मजदूरी करके पैसे कमाना नहीं रह गया है. मेवात के परिवार अब अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, मैनेजर और आईटी प्रोफेशनल बनाने का सपना देख रहे हैं. इसके लिए वे बच्चों को पढ़ाई के लिए दूसरे देशों में भेज रहे हैं.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस मुहिम में सिर्फ बड़े या अमीर घराने ही शामिल नहीं हैं. साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार भी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए अपनी जमीन बेच रहे हैं, खेत गिरवी रख रहे हैं या बैंक से कर्ज ले रहे हैं.
मेवात में लंबे समय से बेहतर शिक्षा सुविधाओं की भारी कमी रही है. जब यहां के बच्चे मेडिकल के क्षेत्र में जाने का सपना देखते हैं, तो उनके सामने भारत की व्यवस्था एक बड़ी दीवार बनकर खड़ी हो जाती है. देश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बेहद सीमित हैं. वहीं प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस आम आदमी के बजट से पूरी तरह बाहर होती है. इसी मजबूरी ने मेवाती परिवारों को विदेश में मेडिकल शिक्षा तलाशने पर मजबूर किया.
यह फैसला किसी भी साधारण परिवार के लिए आसान नहीं होता. बरसों की जमा पूंजी, खेती-किसानी की जमीन और खाड़ी देशों में पसीना बहा रहे परिजनों की पूरी कमाई बच्चों की पढ़ाई में झोंक दी जाती है. मकसद सिर्फ एक विदेशी डिग्री हासिल करना नहीं है, बल्कि बच्चे को डॉक्टर बनाकर अपने पैरों पर खड़ा करना है.
साल 2022 में जब रूस और यूक्रेन के बीच भीषण युद्ध छिड़ा, तब पहली बार दुनिया के सामने मेवात की यह नई तस्वीर खुलकर आई. उस समय जब केंद्र सरकार ने यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने के लिए अभियान चलाया, तो उसमें मेवात के कई छात्र भी शामिल थे.
युद्ध की खबरों के बीच जब टीवी पर मेवात के गांवों में परिजनों की फिक्र और चिंता दिखी, तब लोगों को अहसास हुआ कि अब इस इलाके के बच्चे केवल खाड़ी में मजदूरी करने नहीं जाते, बल्कि यूरोप में डॉक्टरी पढ़ने भी जाते हैं.
यूक्रेन के अलावा कजाकिस्तान और किर्गिस्तान भी मेवाती छात्रों के लिए मेडिकल पढ़ाई के बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं. कजाकिस्तान की सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी में एक समय दर्जनों मेवाती छात्र एक साथ पढ़ाई कर रहे थे. इसके अलावा रूस, जॉर्जिया, चीन, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों में भी मेवात के लड़के-लड़कियां एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं.
मेडिकल के अलावा अब उच्च शिक्षा के दूसरे रास्तों पर भी युवाओं की नजर है. एमबीए, एलएलबी, आईटी, बीटेक, एमटेक, होटल मैनेजमेंट और बीएससी नर्सिंग जैसे कोर्स के लिए युवा अब ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और इटली जा रहे हैं.
विदेश में पढ़ाई का यह फैसला कितना बड़ा आर्थिक निवेश है, इसे कुछ स्थानीय मिसालों से समझा जा सकता है. गांव लाहबास के रहने वाले भूरा कुरैशी ने अपने बेटे आसिफ कुरैशी को एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए रूस भेजा है.
उनका कहना है, “भारत में छह साल की डॉक्टरी की पढ़ाई का कुल खर्च करीब 90 लाख से सवा करोड़ रुपये तक बैठता है. यह खर्च उठाना किसी मध्यमवर्गीय परिवार के बस की बात नहीं है. वहीं रूस में पढ़ाई, रहने और खाने का पूरा खर्च लगभग 35 लाख रुपये में निपट जाता है.”
इसी तरह चन्देनी गांव के मोहम्मद शरीफ ने अपने दो बेटों सदाकत और बसारत को किर्गिस्तान भेजा है. वे बताते हैं, “भारत में दोनों बेटों को डॉक्टर बनाने में ढाई करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च आ जाता, जबकि किर्गिस्तान में दोनों की पढ़ाई महज 60 से 70 लाख रुपये में पूरी हो रही है.”
जेहटाना गांव के रहने वाले अब्बास खान का बेटा अबरार खान और नई गांव निवासी प्रिंसिपल कमर अली का बेटा भी किर्गिस्तान में एमबीबीएस कर रहे हैं. कमर अली बताते हैं, “बच्चों का सपना पूरा करने के लिए कई परिवारों को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ती है, लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए माता-पिता यह बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हैं.”
इलाके के जानकार और एडवोकेट गुलाम नबी बताते हैं, “भारत के प्राइवेट कॉलेजों और विदेशी यूनिवर्सिटियों की फीस में जमीन-आसमान का अंतर है. यही अंतर लोगों को बाहर जाने के लिए प्रेरित करता है.”
वहीं मोहम्मद आदिल इलयास का कहना है,”ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे देशों में छात्रों को पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम काम करने की इजाजत मिलती है, जिससे बच्चे अपना रोजमर्रा का जेब खर्च खुद निकाल लेते हैं.”इटली जैसे देशों में मिलने वाली सरकारी स्कॉलरशिप भी छात्रों को आकर्षित कर रही है.
हालांकि, विदेशी डिग्री हासिल करना ही सब कुछ नहीं है. एमबीबीएस पूरा करने के बाद भारत में प्रैक्टिस करने के लिए फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा पास करना अनिवार्य होता है. मेवात की सनोवर हुसैन ने विदेश से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत में यह परीक्षा पास की और डॉक्टर बनीं. सनोवर की यह सफलता आज पूरे इलाके की लड़कियों और उनके परिवारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.
मेवात की इस विदेश यात्रा को दो पीढ़ियों के नजरिए से देखा जाना चाहिए. पहली पीढ़ी ने खाड़ी देशों में खून-पसीना बहाकर परिवार को आर्थिक मजबूती दी. अब वही परिवार उस आर्थिक नींव के सहारे अपनी अगली पीढ़ी को डॉक्टर, वकील और अफसर बनाने के सपने देख रहा है.
यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह मेवात के समाज में आ रही शैक्षणिक और वैचारिक क्रांति की एक जिंदा मिसाल है. मेवात की नई पहचान अब सिर्फ उसकी पुरानी समस्याओं से नहीं, बल्कि उसके युवाओं के उड़ते सपनों से तय हो रही है.