मुदस्सर अहमद डार की जिद्द ने बदल दी बंदूक की ज़मीन
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 24-09-2026
Mudassar Ahmed Dar's stubborn resolve changed the landscape of the gun.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
14 फरवरी 2019 के उस भयावह पुलवामा हमले की टीस आज भी देश के जेहन में ताज़ा है। उस हमले के बाद प्रशासनिक और सुरक्षा फाइलों में घाटी के पांच गांव-ललहार (काकापुरा), करीमाबाद, गुलजारपुरा-अवंतीपुरा और दरबगाम गहरे काले रंग से रेखांकित कर दिए गए थे। ये वही गांव थे जिन्हें 'ब्लैक विलेज' के नाम से जाना जाता था, जहां रियाज अहमद, समीर टाइगर और अय्यूब ललहारी जैसे दुर्दांत आतंकवादियों की हुकूमत चलती थी।
दहशत का आलम यह था कि आम नागरिक अपनी जुबान पर 'भारत' का नाम तक नहीं ला सकते थे। आतंकियों ने खुला फरमान जारी कर रखा था: “जो भी ग्रामीण पुलिस या प्रशासन के पास जाएगा, उसे हमारा दुश्मन माना जाएगा और उसकी सजा केवल मौत होगी”।
इस फरमान के डर से लोग अपनी बुनियादी सहूलियतों और समस्याओं के लिए भी सरकारी दफ्तरों की चौखट लांघने से घबराते थे। सर्दियों में बर्फबारी से जब इलाका कट जाता, तो बच्चों की ट्यूशन बंद हो जाती और वे पढ़ाई छोड़ देते।
बुरहान वानी के मारे जाने के बाद भड़की आग में आतंकी रियाज अहमद युवाओं को उग्रवाद के दलदल में धकेल रहा था। लेकिन, सबसे घने अंधेरे के बीच ही अक्सर रोशनी की पहली किरण फूटती है। इस कहानी में वह किरण बने 31 वर्षीय एमबीए ग्रेजुएट मुदस्सर अहमद डार।
अपमान से जन्मा बदलाव का संकल्प
मुदस्सर खुद आतंकवाद के दंश के प्रत्यक्ष पीड़ित रहे थे। पुलवामा हमले के बाद जब वे किसी काम से दिल्ली गए, तो एक होटल ने उन्हें सिर्फ इसलिए कमरा देने से मना कर दिया क्योंकि उनके पहचान पत्र पर 'पुलवामा' लिखा था। उस दिन मिले अपमान ने उनके भीतर किसी नफरत को नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि को बदलने के एक अटूट संकल्प को जन्म दिया। कश्मीर लौटकर मुदस्सर ने सकारात्मक सोच वाले युवाओं को अपने साथ जोड़ा और इन पांच 'ब्लैक विलेज' में उतर गए। उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे पहला और मजबूत हथियार बनाया।
सर्दियों के महीनों में जब छान्दाजी, केत्सन और रेशवारी जैसे दूर-दराज़ इलाके पूरी दुनिया से कट जाते थे, तब मुदस्सर और उनकी टीम ने स्वैच्छिक आधार पर तीन 'विंटर कम्युनिटी लर्निंग सेंटर' शुरू किए।
पीजी और ग्रेजुएट युवाओं की मदद से 300 से 400 बच्चों को मुफ्त पढ़ाया गया। उन्होंने 'संडे फॉर सोसाइटी' अभियान चलाया, जिसमें निजी अकादमियों के शिक्षक रविवार को बच्चों को पर्सनालिटी डेवलपमेंट, कम्युनिकेशन और लीडरशिप स्किल्स सिखाने आते थे। इसके साथ ही, 540 से ज्यादा जरूरतमंद व जनजातीय बच्चों को मुफ्त स्टेशनरी बांटी गई।
धमकियों और बंदूकों के साए में संवाद
बदलाव का यह रास्ता आसान नहीं था। शुरुआत में आतंकियों ने मुदस्सर को 'भारत का एजेंट' और 'मुखबिर' कहकर जान से मारने की धमकियाँ दीं। 2020 में जब उन्होंने ललहारपुरा में एक क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित कराया, तो एक आतंकी ने उनकी हत्या तक की साजिश रच डाली। लेकिन मुदस्सर डिगे नहीं।
उन्होंने व्यक्तिगत रूप से 17 ऐसे भटके हुए युवाओं की काउंसलिंग की, जो उग्रवाद की राह पर कदम बढ़ा चुके थे। मुदस्सर बताते हैं कि जो लड़का पहले उन्हें 'मुखबिर' कहकर धमकियां देता था, लगातार संवाद और कुरान के इस पवित्र संदेश "एक निर्दोष की जान बचाना पूरी इंसानियत को बचाने जैसा है" के बाद उसके दिल से नफरत पिघल गई। वही लड़का बाद में उन्हें 'भैया' कहने लगा और हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट आया।
जहां गूंजते थे देश-विरोधी नारे, वहां लहराया तिरंगा
ललहारपुरा का वह मैदान, जहां कभी मारे गए आतंकियों के जनाज़ों में पत्थरबाज़ों की भीड़ जुटती थी, पाकिस्तानी झंडे लहराए जाते थे और भारत-विरोधी नारे गूंजते थे, आज मुदस्सर के भगीरथ प्रयासों से एक जीवंत क्रिकेट स्टेडियम में तब्दील हो चुका है।
आज वहां शान से 'तिरंगा' लहराता है। पास में स्थित 'शहीदों के कब्रिस्तान' में 1990 के दशक के बड़े आतंकी की कब्र पर आज कोई मोमबत्ती जलाने वाला भी नहीं बचा है। स्टेडियम में जब मैच का उद्घाटन करने पुलिस व नागरिक प्रशासनिक अधिकारी पहुंचे, तो जिन हाथों में कभी पत्थर हुआ करते थे, उन्होंने अधिकारियों पर फूलों की बारिश की।
मुदस्सर का दायरा सिर्फ मैदान और किताबों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कश्मीर के 6 जिलों में 205 से अधिक जरूरतमंद परिवारों को ईद फूड किट्स पहुँचाए, गरीब बेटियों की शादी का खर्च उठाया, मेडिकल व नर्सिंग छात्रों की फीस भरी और गुरेज़ की महिला उद्यमियों के उत्पादों को डिजिटल पहचान दी। इतना ही नहीं, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को बदनाम करने की साजिशों का भी तार्किक जवाब दिया।
तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ द्वारा यूएनओ में पेश उस पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट का मुदस्सर ने कड़ा खंडन किया, जिसके आधार पर भारत पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी और दावा किया गया था कि 'अज्ञात कब्रों' में आम कश्मीरी नागरिक दफन हैं।
मुदस्सर की टीम ने 6 वर्षों तक गहन शोध कर एक तथ्यात्मक रिपोर्ट जारी की और साबित किया कि उन कब्रों में स्थानीय नागरिक नहीं, बल्कि सीमा पार से आए घुसपैठिए आतंकवादी दफ़्न थे। सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के लिए उन्होंने पुलवामा स्टेडियम में एक ऐतिहासिक अंतर-धार्मिक संवाद (Interfaith Dialogue) आयोजित कराया, जहां चारों धर्मों के लगभग 14,000 लोग एक मंच पर एकत्र हुए। इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी जम्मू-कश्मीर के माननीय उपराज्यपाल (LG) श्री मनोज सिन्हा भी बने।
एक नया पुलवामा, एक नई सुबह
पांच वर्षों की अथक मेहनत का परिणाम आज सबके सामने है। इन पूर्व 'ब्लैक विलेज' में आज न तो कोई सक्रिय आतंकवादी बचा है और न ही ये इलाका अब आतंकियों की भर्ती का अड्डा है।
जहां कभी बारूद की गंध हुआ करती थी, वहां अब एक अत्याधुनिक 'मेडिसिटी' आकार ले रही है और विकास कार्य बुलेट ट्रेन की रफ्तार से चल रहे हैं। गांव के बच्चे और बुजुर्ग अब उन्हें प्यार और सम्मान से 'मुदस्सर भैया' कहकर पुकारते हैं।
उनकी इस राष्ट्रसेवा के लिए उन्हें राष्ट्रीय राष्ट्रपति पुरस्कार (2012), 15वें भारत रत्न डॉ. बी.आर. अंबेडकर पुरस्कार (2025), अंतर्राष्ट्रीय बुद्ध शांति पुरस्कार (2025) और कई 'यूथ आइकॉन अवॉर्ड' से अलंकृत किया जा चुका है। मुदस्सर अहमद डार की यह जीवन-गाथा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आतंकवाद और नफरत को गोलियों की तड़तड़ाहट से नहीं, बल्कि इंसानियत, शिक्षा, अटूट साहस और आपसी विश्वास के चिराग जलाकर ही हमेशा के लिए मिटाया जा सकता है।