आवाज़ द वॉयस /नई दिल्ली
मेथड एक्टिंग के ‘बादशाह’ कहे जाने वाले वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का आवाज़ द वॉयस को दिया गया एक पुराना इंटरव्यू इन दिनों सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है। इस बातचीत में नसीरुद्दीन शाह ने साफ़ कहा कि उन्हें, उनके भाइयों या उनके वालिद साहब को कभी भी मुसलमान होने की वजह से अपने पेशेवर जीवन में किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के छात्र जीवन को याद करते हुए बताया कि उनकी तीन पीढ़ियाँ एएमयू में पढ़ी हैं। उन्होंने उस दौर की शैक्षणिक और सामाजिक परिस्थितियों पर बात करते हुए अपने शिक्षकों का विशेष रूप से ज़िक्र किया। नसीरुद्दीन शाह ने बताया कि उनकी एक शिक्षिका, जाहिदा ज़ैदी, उन्हें हमेशा हौसला देती थीं और यह नसीहत करती थीं कि अपनी काबिलियत पर भरोसा रखो, कभी कोई परेशानी नहीं आएगी। उनके अनुसार, यह सीख उनके पूरे जीवन में उनके साथ रही।
आवाज़ द वॉयस के एवी संपादक मंजीत ठाकुर से बातचीत में नसीरुद्दीन शाह ने देश में मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव की चर्चाओं पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी ‘इनफिरादियत’ यानी अलग-थलग किए जाने का अनुभव नहीं किया और न ही उन्होंने कभी अपने काम को एक मुसलमान की पहचान के साथ जोड़ा। उनका कहना था कि इस मुल्क में काम करते हुए उनके धर्म ने कभी उनके रास्ते में रुकावट नहीं डाली।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उनके पिता सरकारी सेवा में रहे और उन्हें भी मुसलमान होने के कारण किसी तरह का नुकसान नहीं उठाना पड़ा। उनके दो भाई भी अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़े, जिनमें से एक ने पूरी ज़िंदगी सेना में सेवा दी और दो युद्धों में हिस्सा लिया, लेकिन वहां भी धर्म कभी बाधा नहीं बना।
उन्होंने कहा कि सहनशीलता हमारे डीएनए में है. हिंदू, मुस्लिम,सिख के गीत यूं नहीं गाते थे. यह ढकोसला नहीं था. नफरत का यह दौर भी निकल जाएगा.नसीरुद्दीन शाह की यह पूरी और विचारोत्तेजक बातचीत आवाज़ द वॉयस के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है, जहां वे अपने निजी अनुभवों के ज़रिये समाज और व्यवस्था पर एक संतुलित और आत्मविश्वासी दृष्टिकोण रखते नज़र आते हैं।