मेरठ : मुस्लिम युवकों ने रोजे में उठाई सूरज प्रकाश की अर्थी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 13-03-2026
An example of humanity in Meerut: Muslim brothers gave shoulder, Suraj Prakash's last rites were performed according to Hindu customs.
An example of humanity in Meerut: Muslim brothers gave shoulder, Suraj Prakash's last rites were performed according to Hindu customs.

 

आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली

मेरठ शहर के पुराने इलाके खंदक के नौगजा मोहल्ले में इंसानियत और आपसी भाईचारे की एक अद्वितीय मिसाल देखने को मिली। यहाँ 82 वर्षीय सूरज प्रकाश उर्फ ज्ञानी जी के निधन के बाद उनकी अंतिम यात्रा ने धर्म और मजहब की सीमाओं को पीछे छोड़ दिया। मोहल्ले के हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। मुस्लिम भाइयों ने अर्थी को कंधा दिया और पूरे अंतिम संस्कार में उनका साथ निभाया।
 
सूरज प्रकाश लंबे समय से अकेले ही इसी मोहल्ले में रहते थे। उनके परिवार के अधिकांश सदस्य शहर के बाहर थे। पड़ोस में ही डेयरी चलाने वाले कमल भड़ाना पिछले कई वर्षों से उनकी देखभाल करते रहे थे। वह उनके खाने-पीने का इंतजाम भी करते थे। कमल भड़ाना बताते हैं कि रविवार रात वह रोज की तरह सूरज जी के लिए खाना लेकर पहुंचे। उस समय सूरज जी ने कहा कि उनका खाने का मन नहीं है। उन्होंने खाना फ्रिज में रख देने को कहा।
 
 
सोमवार सुबह जब कमल अपनी दुकान खोलने के बाद सूरज जी के पास गए, तो उन्हें पता चला कि वह मृत अवस्था में थे। सूरज प्रकाश के निधन की खबर फैलते ही मोहल्ले के लोग उनके घर पहुंच गए। सभी ने मिलकर अर्थी और अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। इस दौरान हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग बराबर संख्या में मौजूद रहे।
 
मोहल्ले के निवासी विक्की शर्मा बताते हैं कि अंतिम यात्रा की सभी व्यवस्थाएं मोहल्ले वालों ने मिलकर कीं। पड़ोसी आसिफ ने कहा कि मोहल्ले में सभी उन्हें प्यार से "गुरु जी" कहकर बुलाते थे। बचपन में सूरज जी अक्सर बच्चों को टॉफी दिया करते थे और पतंग उड़ाने के लिए पैसे भी दिया करते थे। मोहल्ले के लोग पिछले कई वर्षों से सूरज जी की मदद कर रहे थे। शादाब झब्बू ने बताया कि बीते कुछ वर्षों में सूरज जी चलने-फिरने में असमर्थ हो गए थे। तब से पड़ोसी बारी-बारी से उनके लिए खाना और नाश्ता पहुंचा दिया करते थे।
 
सबसे खास बात यह रही कि इस समय रमजान के रोजे चल रहे थे। इसके बावजूद मोहल्ले के मुस्लिम युवकों ने अर्थी को कंधा दिया। इरशाद, जीशान, फरमान, अनीस और मुनीम सहित कई मुस्लिम युवक बारी-बारी से अर्थी कंधे पर उठाकर लगभग सवा दो किलोमीटर पैदल सूरजकुंड श्मशान घाट तक पहुंचे। अंतिम यात्रा के दौरान “राम नाम सत्य है” की गूंज सुनाई दे रही थी, और मुस्लिम भाई दुआ करते हुए उनके साथ चल रहे थे। यह दृश्य देखकर आसपास के लोग भी भावुक हो उठे।
 
अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ। मुखाग्नि सूरज जी के देखभाल करने वाले कमल भड़ाना ने दी। उनके भतीजे संजय कंकरखेड़ा काम के सिलसिले में बाहर थे और अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके।
 
इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि इंसानियत और भाईचारा किसी भी धर्म से बड़ा होता है। नौगजा मोहल्ले के लोगों ने अपने इस व्यवहार से सामाजिक सद्भाव और एकता की मिसाल पेश की। उनके इस सहयोग और प्यार ने पूरे मोहल्ले को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया।
 
स्थानीय लोग बताते हैं कि सूरज प्रकाश अपने जीवन में हमेशा दूसरों के लिए उदाहरण बने। वह बच्चों के लिए प्यार और मोहब्बत का प्रतीक थे। मोहल्ले में उनका व्यक्तित्व लोगों के लिए प्रेरणा बन गया। उनकी देखभाल करने वाले पड़ोसियों की मेहनत और प्यार ने उनके अंतिम दिनों को आरामदायक बनाया।
 
 
इस घटना की सबसे बड़ी बात यह है कि धार्मिक सीमाओं के बावजूद मोहल्ले के लोग एक-दूसरे के साथ खड़े रहे। मुस्लिम युवकों ने अपने रोजे रखते हुए हिंदू रीति-रिवाज का सम्मान किया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि धार्मिक भेदभाव और मजहबी मतभेद इंसानियत की राह में बाधा नहीं बन सकते।
 
पड़ोसियों का कहना है कि इस तरह के सहयोग और एकता के उदाहरण पूरे शहर के लिए प्रेरणादायक हैं। यह न केवल मोहल्ले के लोगों के लिए, बल्कि समाज के लिए भी सीखने योग्य है। सूरज प्रकाश की यादें अब मोहल्ले में हमेशा जीवित रहेंगी। उनका जीवन और उनका निधन दोनों ही लोगों को यह सिखाते हैं कि मानवता, आपसी सहयोग और भाईचारा ही असली धर्म हैं।
 
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुस्लिम युवकों का यह कदम समाज में प्रेम और सह-अस्तित्व का प्रतीक बन गया। उन्होंने दिखाया कि कठिन समय में भी एक-दूसरे का साथ देना संभव है। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ मिलकर न केवल अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभा सकते हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक संदेश भी फैलाते हैं।
 
मोहल्ले के लोग बताते हैं कि सूरज प्रकाश हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते थे। उनके जीवन में मोहल्ले का हर व्यक्ति उनका सम्मान करता था। उनकी याद में मोहल्ले के लोग आज भी एक-दूसरे के साथ मिलकर इंसानियत और भाईचारे की मिसाल कायम करना चाहते हैं। यह घटना मेरठ शहर के लिए गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण बन गई है। यह दिखाता है कि आपसी सहयोग और भाईचारा किसी भी मजहब या धर्म से बड़ा होता है। सूरज प्रकाश की अंतिम यात्रा ने साबित कर दिया कि इंसानियत हमेशा धर्म और मजहब से ऊपर होती है।
 
 
नौगजा मोहल्ले की यह कहानी समाज में भाईचारे, एकता और प्रेम का संदेश फैलाती है। यह मिसाल यह भी दिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी इंसानियत और सहानुभूति का महत्व कभी कम नहीं होता। मुसलमान और हिंदू एक साथ खड़े होकर यह संदेश देते हैं कि जीवन में प्यार और भाईचारा हमेशा जीतता है।
 
सूरज प्रकाश का अंतिम संस्कार न केवल उनके जीवन का सम्मान था, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी बन गया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि इंसानियत और सहयोग के बिना समाज का निर्माण असंभव है। मुस्लिम और हिंदू समुदाय के लोगों ने मिलकर यह संदेश दिया कि भाईचारा और इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।