रमज़ान में छात्रों के लिए सहरी बनाती हैं राजेश्वरी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 05-03-2026
A Hindu mother in Tamil Nadu sets a Sehri table for Muslim students
A Hindu mother in Tamil Nadu sets a Sehri table for Muslim students

 

भक्ति चालक

रमजान के दिनों में तिरुचिरापल्ली के खजामलाई के पास जे.के. नगर के एक घर से हर रात 8 बजे के बाद घी और मसालों की भीनी-भीनी खुशबू आने लगती है। यह घर सेल्वी राजेश्वरी का है। शहर के अलग-अलग हॉस्टल्स में रहने वाले मुस्लिम छात्रों के लिए खाने के पैकेट तैयार करने में राजेश्वरी इन दिनों काफी मसरूफ रहती हैं। जब पूरा शहर सोने की तैयारी कर रहा होता है, तब राजेश्वरी चूल्हे पर बड़े बर्तन चढ़ाती हैं, प्याज काटती हैं और चावल धोकर बड़ी कड़ाही में डालती हैं। हिंदू होने के बावजूद आज वे रमजान की रवायत का एक अटूट हिस्सा बन गई हैं।

पिछले कई सालों से रमजान के मुकद्दस महीने में वे उन छात्रों के लिए सहरी तैयार करने में मदद कर रही हैं जो खुद खाना नहीं बना सकते। इस नेक काम की शुरुआत उनके किरायेदार प्रोफेसर माईदीन अब्दुल कादर ने की थी। बाहर से पढ़ाई के लिए आए छात्रों को वक्त पर सहरी का इंतजाम करने के लिए होती परेशानियां देखकर वे बेचैन हो गए थे।

इसके बाद उन्होंने खुद खाना पकाकर उसका मुफ्त बंटवारा शुरू किया। एक छोटे स्तर पर शुरू हुई यह पहल आज एक बड़ी खिदमत में बदल गई है, जिसके तहत 100 से 200 से ज्यादा छात्रों को हर रोज़ खाना खिलाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में राजेश्वरी की भूमिका बेहद अहम है। प्याज छीलने से लेकर चूल्हा जलाने और खाने के पैकेट पैक करने तक, वे माईदीन और उनकी मां फातिमा के साथ मिलकर काम करती हैं। घी राइस, कुस्का, वेज बिरयानी, दाल-चावल और टोमेटो राइस के साथ उबले हुए अंडे जैसी चीजें बांटी जाती हैं।

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इस बारे में मीडिया से बात करते हुए राजेश्वरी बताती हैं, “फातिमा और उनका बेटा रोज़ा रखने वाले मुस्लिम छात्रों के लिए सहरी का खाना तैयार करते हैं। वे हर रोज़ रात 8 बजे काम पर लग जाते हैं और मैं उनकी मदद करती हूं। मुझे जात-पात या मजहब नहीं देखना, बस इंसानियत की खिदमत करनी है। इससे मुझे दिली सुकून मिलता है।”

रात 11 बजे तक खाने के पैकेट तैयार हो जाते हैं। उसके बाद माईदीन सफर पर निकल पड़ते हैं। के।के। नगर, सुब्रमण्यपुरम और सेथुरापट्टी जैसे 50 किलोमीटर के दायरे में घूमकर वे सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों के हॉस्टल्स में ये पैकेट पहुंचाते हैं। यह काम सुबह 4 बजे तक चलता रहता है। दोस्तों और चैरिटेबल संस्थाओं की मदद से इसका खर्च उठाया जाता है। लेकिन राजेश्वरी के शामिल होने की वजह से इस पहल की खास चर्चा हो रही है। राजेश्वरी इसे बहुत सादगी से देखती हैं। वे कहती हैं, “मैं जो कुछ कर रही हूं, वह मुझे पसंद है, उससे मुझे खुशी मिलती है।”

जामिया अनवरुल उलूम अरबी कॉलेज के शिक्षक एन। मोहीद्दीन अब्दुल कादर और उनकी टीम 19 फरवरी को रमजान शुरू होने के बाद से हर रोज़ रात 11 से सुबह 4:30 बजे तक यह सेवा दे रही है। दोपहर तक इस खाने के लिए रजिस्ट्रेशन किया जाता है। खास बात यह है कि यह सारी तैयारी राजेश्वरी द्वारा मुफ्त में दी गई जगह में की जाती है। कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुआ यह सफर आज भी लगातार जारी है। राजेश्वरी के किचन में मसालों की तरह अलग-अलग मजहब भी एक हो गए हैं। तिरुचिरापल्ली के छात्रों को हर साल रमजान में मिलने वाले इस गरम खाने से बड़ा सहारा मिल रहा है। ये पैकेट पहुंचाने वाली राजेश्वरी की ममता हर छात्र तक पहुंच रही है।