भारतीय टेबल टेनिस के सितारे मीर कासिम अली को क्यों भूल गए?

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 28-08-2026
Muslim Arjuna Awardee: The Story of Mir Kasim Ali
Muslim Arjuna Awardee: The Story of Mir Kasim Ali

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
किसी खिलाड़ी की महानता केवल उसके जीते हुए पदकों से तय नहीं होती। कई बार वह उस दौर में अपनी पहचान बनाता है, जब खेल की सुविधाएं सीमित हों, अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच आसान न हो और किसी खिलाड़ी की उपलब्धियों को आज जैसी मीडिया कवरेज भी न मिले। मीर कासिम अली ऐसे ही खिलाड़ियों में शामिल रहे, जिन्होंने भारतीय टेबल टेनिस को एक अलग पहचान दिलाई और 1969 में अर्जुन अवॉर्ड हासिल किया। उन्हें यह सम्मान टेबल टेनिस में उनके योगदान के लिए दिया गया था।

मीर कासिम अली का नाम आज शायद नई पीढ़ी के बहुत कम खेलप्रेमियों को याद हो, लेकिन भारतीय टेबल टेनिस के इतिहास में उनका स्थान महत्वपूर्ण है। वह राष्ट्रीय चैंपियन रहे और बाद में कॉमनवेल्थ टेबल टेनिस चैंपियनशिप में भी भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए शानदार प्रदर्शन किया। आंध्र प्रदेश टेबल टेनिस एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट टेबल टेनिस एसोसिएशन दोनों ही उन्हें अपने क्षेत्र से निकले राष्ट्रीय चैंपियन और अर्जुन अवॉर्डी के रूप में याद करते हैं।
 
शुरुआती जीवन और संघर्ष: जब टेबल टेनिस में बना नाम

मीर कासिम अली के शुरुआती जीवन, जन्मस्थान और पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़ी विस्तृत प्रमाणित जानकारी सार्वजनिक स्रोतों में बहुत सीमित है। लेकिन उपलब्ध खेल रिकॉर्ड यह स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने उस दौर में भारतीय टेबल टेनिस में अपनी जगह बनाई, जब यह खेल आज की तरह बड़े पैमाने पर लोकप्रिय या व्यावसायिक नहीं था।
 
उनका खेल करियर आंध्र प्रदेश और तत्कालीन हैदराबाद क्षेत्र की टेबल टेनिस परंपरा से जुड़ा रहा। आंध्र प्रदेश टेबल टेनिस एसोसिएशन के अनुसार, मीर कासिम अली राज्य से निकले राष्ट्रीय चैंपियन और अर्जुन अवॉर्डी थे। उनकी यात्रा इस मायने में भी खास थी कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
 
 
खेल करियर: राष्ट्रीय चैंपियन से अंतरराष्ट्रीय मंच तक

मीर कासिम अली का सबसे मजबूत परिचय उनके खेल रिकॉर्ड से मिलता है। 1968 और 1969 में वह लगातार दो वर्षों तक राष्ट्रीय सीनियर पुरुष एकल चैंपियन रहे। उपलब्ध राष्ट्रीय चैंपियनशिप रिकॉर्ड के अनुसार, 1968 में जब जाबलपुर में प्रतियोगिता आयोजित हुई तो पुरुष एकल का खिताब मीर कासिम अली ने जीता। अगले वर्ष 1969 में बेंगलुरु में भी वह पुरुष एकल चैंपियन बने।
 
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि राष्ट्रीय चैंपियन बनना उस दौर में भारतीय टेबल टेनिस में सर्वोच्च व्यक्तिगत उपलब्धियों में से एक था। 1968 में उन्होंने फर्रुख आर. खोदाईजी से राष्ट्रीय चैंपियन का खिताब हासिल किया और 1969 में भी अपना दबदबा कायम रखा। इसके बाद 1970 में जी. जगन्नाथ ने राष्ट्रीय पुरुष एकल खिताब जीता।
यानी मीर कासिम अली का नाम भारतीय टेबल टेनिस के उस दौर के शीर्ष खिलाड़ियों में लगातार दिखाई देता है।
 
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दिखाई दिया दम

मीर कासिम अली की प्रतिभा केवल राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं रही। वह कॉमनवेल्थ टेबल टेनिस चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों में शामिल रहे और प्रतियोगिता के एकल वर्ग में फाइनल तक पहुंचे। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की टेबल टेनिस संस्थाएं उन्हें कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप के फाइनलिस्ट के रूप में दर्ज करती हैं।
 
1971 की अंतरराष्ट्रीय टेबल टेनिस पत्रिका में भी मीर कासिम अली के अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन का उल्लेख मिलता है। इसमें उन्हें कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता के पुरुष एकल ड्रॉ में लगातार आगे बढ़ते हुए बताया गया है। उन्होंने कनाडा के डेरेक वॉल और हांगकांग के लाउ सेक फोंग जैसे खिलाड़ियों को हराकर सेमीफाइनल तक जगह बनाई, जहां भारतीय खिलाड़ी जी. जगन्नाथ के रास्ते में आने के बाद मीर कासिम अली फाइनल में पहुंचे। यह उपलब्धि उस समय भारतीय टेबल टेनिस के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय खिलाड़ियों के लिए ऐसी सफलता हासिल करना आसान नहीं था।
 
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर

लगातार राष्ट्रीय सफलता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन ने मीर कासिम अली को देश के प्रमुख टेबल टेनिस खिलाड़ियों में स्थापित कर दिया। 1969 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। आधिकारिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड में 1969 के अर्जुन अवॉर्ड विजेताओं में मीर कासिम अली का नाम टेबल टेनिस के लिए दर्ज है। उस वर्ष उनके साथ क्रिकेट में बिशन सिंह बेदी, फुटबॉल में इंदर सिंह और कुश्ती में चंदगी राम जैसे बड़े नामों को भी अर्जुन सम्मान मिला था। मीर कासिम अली के लिए यह सम्मान उनके पूरे खेल करियर की राष्ट्रीय मान्यता था। खास बात यह है कि वह टेबल टेनिस में अर्जुन अवॉर्ड पाने वाले शुरुआती भारतीय खिलाड़ियों में शामिल थे। उनसे पहले जे.सी. वोहरा, जी.आर. दीवान, यू. सुंदरराज और एफ.आर. खोदाईजी इस सम्मान से नवाजे जा चुके थे।
 
 
उनकी प्रेरक कहानी: रिकॉर्ड से ज्यादा बड़ा था दौर

मीर कासिम अली की कहानी का प्रेरक पहलू केवल उनके दो लगातार राष्ट्रीय खिताब या अर्जुन अवॉर्ड तक पहुंचना नहीं है। उनका करियर उस समय सामने आया जब भारतीय टेबल टेनिस अपने विकास के शुरुआती दौर में था। आज खिलाड़ियों के पास आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र, वैज्ञानिक फिटनेस व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय कोचिंग और लगातार मीडिया कवरेज है। उस दौर में ऐसी सुविधाएं बेहद सीमित थीं। इसके बावजूद मीर कासिम अली ने राष्ट्रीय स्तर पर लगातार दो बार पुरुष एकल खिताब जीता और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में फाइनल तक पहुंचे। उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि प्रतिभा और निरंतर मेहनत सीमित संसाधनों के बावजूद खिलाड़ी को ऊंचे स्तर तक पहुंचा सकती है।
 
उनके करियर की एक खास बात यह भी रही कि उन्होंने अपने राष्ट्रीय खिताब की रक्षा की। 1968 में चैंपियन बनने के बाद 1969 में भी वही खिताब अपने नाम करना उनकी निरंतरता और प्रतिस्पर्धी क्षमता को दर्शाता है।
 
आज मीर कासिम अली क्या कर रहे हैं?

मीर कासिम अली अब सक्रिय खेल करियर में नहीं हैं और उनके वर्तमान जीवन से जुड़ी विस्तृत, विश्वसनीय सार्वजनिक जानकारी बहुत सीमित है। इसलिए उनके वर्तमान पेशे या निजी जीवन के बारे में बिना प्रमाण के कोई दावा करना उचित नहीं होगा। लेकिन खेल संस्थाओं के रिकॉर्ड में उनका नाम आज भी जीवित है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की टेबल टेनिस संस्थाएं उन्हें राष्ट्रीय चैंपियन, अर्जुन अवॉर्डी और कॉमनवेल्थ टेबल टेनिस चैंपियनशिप के फाइनलिस्ट के रूप में याद करती हैं। उनकी विरासत भारतीय टेबल टेनिस के इतिहास में दर्ज है—विशेषकर उस दौर में जब उन्होंने 1968 और 1969 में लगातार दो राष्ट्रीय पुरुष एकल खिताब जीतकर अपनी श्रेष्ठता साबित की।
 
एक ऐसा नाम जिसे नई पीढ़ी को जानना चाहिए

आज जब भारत टेबल टेनिस में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े नामों के साथ अपनी पहचान बना चुका है, तब यह याद करना जरूरी है कि इस सफर की नींव बहुत पहले रखी गई थी। मीर कासिम अली उसी नींव के एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी थे। राष्ट्रीय चैंपियन से लेकर कॉमनवेल्थ फाइनल तक का सफर और फिर 1969 का अर्जुन अवॉर्ड—उनका करियर भारतीय टेबल टेनिस के उस सुनहरे अध्याय का हिस्सा है, जब कुछ खिलाड़ियों ने सीमित सुविधाओं के बीच अपने खेल से देश को पहचान दिलाई।
 
उनकी कहानी शायद इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि आज उनके बारे में जानकारी बहुत कम उपलब्ध है। लेकिन इतिहास केवल उन खिलाड़ियों का नहीं होता जिनके नाम आज हर कोई जानता है। इतिहास उन खिलाड़ियों का भी होता है जिन्होंने अपने दौर में रास्ता बनाया, ताकि आने वाली पीढ़ियां उस रास्ते पर आगे बढ़ सकें।
 
मीर कासिम अली उन्हीं शुरुआती भारतीय टेबल टेनिस नायकों में से एक हैं एक राष्ट्रीय चैंपियन, कॉमनवेल्थ फाइनलिस्ट और 1969 के अर्जुन अवॉर्डी, जिनका नाम भारतीय खेल इतिहास में सम्मान के साथ दर्ज है।