खेल और मातृत्व के बीच संतुलन बनाने के सवाल पर विचार करेगा दिल्ली उच्च न्यायालय

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 11-09-2026
The Delhi High Court will consider the issue of balancing sports and motherhood.
The Delhi High Court will consider the issue of balancing sports and motherhood.

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि वह इस सवाल पर विचार करेगा कि किसी खिलाड़ी के खेल करियर और मातृत्व के बीच संतुलन कैसे पैदा किया जाए।
 
यह सवाल पहलवान विनेश फोगाट की याचिका की सुनवाई के दौरान उठा, जो जुलाई 2025 में मां बनीं थी। वह अब मातृत्व अवकाश से लौट आई हैं और उन्होंने इस साल होने वाली सीनियर विश्व चैंपियनशिप के लिए महिला वर्ग के चयन ट्रायल्स में भाग लेने की अनुमति मांगी है।
 
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने बृहस्पतिवार को देर रात एक अंतरिम आदेश में फोगाट को 14 सितंबर को इंदिरा गांधी स्टेडियम में होने वाले चयन ट्रायल्स में भाग लेने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
 
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उनका यह मानना है कि इस अंतरिम चरण में सभी खिलाड़ियों पर लागू होने वाले पात्रता मानदंडों में केवल फोगाट के पक्ष में ढील नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इसका असर उन अन्य खिलाड़ियों पर पड़ सकता है जो अदालत के समक्ष नहीं हैं।
 
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, ‘‘यह अदालत जानती है कि किसी अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए चयन प्रक्रिया में किसी विशेष खिलाड़ी के व्यक्तिगत दावे से परे कई विचारणीय बिंदु शामिल होते हैं। यह सुनिश्चित करना देश के हित में है कि उसके प्रतिनिधियों का चयन निष्पक्ष, एकसमान और प्रदर्शन-आधारित प्रक्रिया से हो।’’
 
न्यायाधीश ने आगे कहा, ‘‘यह न्यायालय इस बात से भी अवगत है कि मातृत्व और खेल करियर के बीच कैसे संतुलन बनाया जाए और क्या किसी खिलाड़ी को मातृत्व और अपने खेल करियर में से किसी को चुनने की जरूरत है। यह बड़ा सवाल है जिस पर सावधानीपूर्वक विचार करने की जरूरत है। इस मुद्दे पर वर्तमान कार्यवाही में अभी अंतिम रूप से विचार-विमर्श और निर्णय होना बाकी है।’’
 
अदालत ने कहा कि जब तक चयन नीति की वैधता और लागू होने की स्थिति पर फैसला नहीं हो जाता तब तक इसके अंतर्गत निर्धारित पात्रता मानदंडों को किसी एक खिलाड़ी के मामले में यूं ही रद्द या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई विशेष श्रेणी नहीं बनाई जा सकती विशेष कर तब जबकि समान स्थिति वाले अन्य खिलाड़ियों को भी इसी तरह की दुविधा का सामना करना पड़ सकता है और उन्हें अपने खेल करियर के दौरान इसी तरह के विकल्प चुनने पड़ सकते हैं।