फवाद मिर्जा: घोड़े पर सवार होकर भारत के लिए रचा इतिहास

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 11-09-2026
Fouaad Mirza: A lifelong bond with horses—from Asian Games medals to the Arjuna Award.
Fouaad Mirza: A lifelong bond with horses—from Asian Games medals to the Arjuna Award.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

घोड़ों की पीठ पर बैठकर दौड़ने का शौक अक्सर बचपन की याद बनकर रह जाता है, लेकिन फवाद मिर्जा के लिए यही शौक आगे चलकर भारत के लिए इतिहास रचने का जरिया बना। बेंगलुरु में पले-बढ़े फवाद ने महज पांच साल की उम्र में पहली बार घोड़े की सवारी की। शुरुआत में उन्हें डर और घबराहट महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे घोड़ों के साथ उनका रिश्ता इतना गहरा होता गया कि यही रिश्ता उनके करियर की पहचान बन गया।

फवाद मिर्जा भारतीय घुड़सवारी के उन खिलाड़ियों में हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस खेल को नई पहचान दिलाई। 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में उन्होंने व्यक्तिगत और टीम इवेंटिंग में दो रजत पदक जीते। व्यक्तिगत इवेंटिंग में उनका रजत पदक खास तौर पर ऐतिहासिक था, क्योंकि इससे पहले भारत ने 1982 के एशियाई खेलों के बाद व्यक्तिगत घुड़सवारी स्पर्धा में पदक नहीं जीता था।

फवाद का जन्म 6 मार्च 1992 को बेंगलुरु, कर्नाटक में हुआ। उनका परिवार घोड़ों और घुड़सवारी से लंबे समय से जुड़ा रहा है। उनके पिता डॉ. हसनेन मिर्जा घोड़ों के विशेषज्ञ पशु चिकित्सक हैं। इसी वजह से फवाद का बचपन घोड़ों और दूसरे जानवरों के बीच बीता। वह खुद बताते रहे हैं कि बचपन में उनका ज्यादातर समय बाहर, घोड़ों, कुत्तों और बिल्लियों के साथ गुजरता था। पांच साल की उम्र में पहली बार घोड़े पर बैठने के बाद वह इस खेल की ओर लगातार बढ़ते गए।

हालांकि घुड़सवारी में आगे बढ़ना आसान नहीं था। यह ऐसा खेल है जिसमें सिर्फ खिलाड़ी की क्षमता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि अच्छे घोड़े, अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग, यात्रा और लगातार प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए पर्याप्त संसाधनों की भी जरूरत होती है। फवाद ने अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए भारत से बाहर जाकर प्रशिक्षण लिया। 2014 एशियाई खेलों के बाद उन्होंने यूरोप में अपने खेल को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया और जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षकों के साथ काम किया। इसी दौर ने उनके खेल को नई दिशा दी।

2014 के एशियाई खेलों में फवाद ने टीम इवेंटिंग में पांचवां और व्यक्तिगत स्पर्धा में 10वां स्थान हासिल किया। इसके बाद उन्होंने अपने प्रदर्शन को लगातार बेहतर किया। जर्मनी में उन्होंने अनुभवी प्रशिक्षक बेटिना होय के साथ प्रशिक्षण लिया और बाद में ओलंपिक पदक विजेता सैंड्रा ऑफर्थ के मार्गदर्शन में भी तैयारी की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रतिस्पर्धा ने उन्हें भारत के शीर्ष इवेंटिंग राइडरों में पहुंचा दिया।

फवाद के करियर का सबसे बड़ा मोड़ 2018 में आया। जकार्ता एशियाई खेलों में उन्होंने घोड़े Seigneur Medicott के साथ व्यक्तिगत इवेंटिंग में रजत पदक जीता। इसके बाद टीम इवेंटिंग में भी भारतीय टीम ने रजत पदक अपने नाम किया। व्यक्तिगत पदक के साथ फवाद ने 36 साल बाद भारत को एशियाई खेलों की व्यक्तिगत घुड़सवारी स्पर्धा में पदक दिलाया। वह 1982 के बाद ऐसा करने वाले पहले भारतीय बने।

जकार्ता में व्यक्तिगत स्पर्धा का स्वर्ण फवाद के बेहद करीब था। उन्होंने शुरुआती चरणों में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन जंपिंग राउंड में एक बाधा को छू जाने के कारण उन्हें स्वर्ण से संतोष करना पड़ा। बाद में उन्होंने इस गलती को अपनी सीख बताया। उनके लिए वह रजत पदक केवल उपलब्धि नहीं था, बल्कि यह समझने का अवसर भी था कि बड़े मंच पर छोटी-सी गलती कितना बड़ा अंतर पैदा कर सकती है।

एशियाई खेलों की इस सफलता ने फवाद को देशभर में पहचान दिलाई और 2019 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड के लिए चुना गया। भारत सरकार की आधिकारिक सूची में फवाद मिर्जा का नाम 2019 के अर्जुन अवॉर्ड विजेताओं में घुड़सवारी के लिए दर्ज है।

29 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया। यह सम्मान मिलने की खबर पर फवाद ने कहा था कि शुरुआत में उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ था। उनके लिए राष्ट्रपति भवन में यह सम्मान हासिल करना जिंदगी के खास पलों में से एक था। उस समय उनका अगला बड़ा लक्ष्य टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना था।

अर्जुन अवॉर्ड के बाद भी फवाद रुके नहीं। 2019 में उन्होंने पोलैंड के स्ट्रेजगोम में CCI3*-S प्रतियोगिता में अपने नए घोड़े Dajara के साथ स्वर्ण पदक जीता। यह प्रदर्शन उनके ओलंपिक अभियान के लिए भी महत्वपूर्ण था। फवाद ने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर भारतीय घुड़सवारी में एक और उपलब्धि हासिल की। 2020 टोक्यो ओलंपिक में उन्होंने Seigneur Medicott के साथ व्यक्तिगत इवेंटिंग में हिस्सा लिया और 23वें स्थान पर रहे। FEI के अनुसार, टोक्यो में भाग लेना उनके करियर की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है।

फवाद की कहानी की सबसे बड़ी प्रेरणा यही है कि घुड़सवारी में खिलाड़ी और घोड़े के बीच तालमेल केवल तकनीक से नहीं बनता। इसके लिए भरोसा, धैर्य, अनुशासन और लंबे समय तक साथ काम करने की जरूरत होती है। फवाद ने बचपन के डर को धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदला और फिर उसी आत्मविश्वास को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की पहचान बनाया।

उनकी यात्रा में मुश्किलें बाद के वर्षों में भी कम नहीं हुईं। पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने की कोशिशों के दौरान उनका मुख्य प्रायोजन समाप्त हो गया और इसके साथ वे अपने प्रायोजक के घोड़ों से भी अलग हो गए। इस दौर में उन्होंने छात्रों को प्रशिक्षण देने, मुश्किल घोड़ों को तैयार करने और युवा घोड़ों को ट्रेन करने जैसे काम किए ताकि अपना सफर जारी रख सकें। 2026 में उन्हें नई फंडिंग मिली और फिनलैंड की जोहाना पोहोनेन ने उन्हें अपने घोड़ों Mokatoo और Camouflage 38 के साथ आगे बढ़ने का मौका दिया।

 

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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आज भी फवाद मिर्जा सक्रिय अंतरराष्ट्रीय घुड़सवारी सर्किट का हिस्सा हैं। FEI के रिकॉर्ड के मुताबिक 2026 में वह Mokatoo और दूसरे घोड़ों के साथ प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं। अगस्त 2026 में आचेन में विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने Mokatoo के साथ हिस्सा लिया। उनकी कहानी अब भी जारी है और लक्ष्य वही है भारत को विश्व घुड़सवारी के बड़े मंच पर और मजबूत पहचान दिलाना।

फवाद मिर्जा की यात्रा बताती है कि खेल सिर्फ मैदान या स्टेडियम तक सीमित नहीं होता। कभी-कभी एक घोड़ा, एक बच्चा और एक सपना मिलकर इतिहास लिखते हैं। बेंगलुरु में पांच साल की उम्र में घोड़े पर बैठने वाला वह बच्चा आज भारत के सबसे चर्चित इवेंटिंग राइडरों में शामिल है और उसकी कहानी आने वाली पीढ़ी के लिए यह संदेश छोड़ती है कि जुनून को अनुशासन और धैर्य मिल जाए तो सपनों को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया जा सकता है।