ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
क्रिकेट में विकेटकीपर की भूमिका अक्सर पर्दे के पीछे रह जाती है। बल्लेबाज चौके-छक्कों से सुर्खियां बटोरता है और गेंदबाज विकेटों से, लेकिन विकेट के पीछे खड़ा खिलाड़ी हर गेंद पर टीम की उम्मीदों को संभालता है।सैयद किरमानीइसी जिम्मेदारी को कला में बदलने वाले भारतीय क्रिकेटरों में से एक थे।
1983 की विश्व कप विजेता भारतीय टीम के सदस्य किरमानी ने करीब एक दशक तक भारत के विकेटों की रखवाली की और मुश्किल वक्त में बल्ले से भी टीम को संभाला। BCCI के मुताबिक उन्होंने भारत के लिए88 टेस्ट और 49 वनडेखेले और दोनों प्रारूपों में क्रमशः 198 और 36 डिसमिसल किए। उनकी कहानी खास इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने सिर्फ एक महान टीम का हिस्सा बनने का गौरव नहीं हासिल किया, बल्कि भारतीय क्रिकेट में विकेटकीपिंग के मानक को भी ऊंचा किया। 1983 विश्व कप में उन्हेंसर्वश्रेष्ठ विकेटकीपरचुना गया था।
खिलाड़ी का परिचय
सैयद मुजतबा हुसैन किरमानी का जन्म 29 दिसंबर 1949 को मद्रास, वर्तमान चेन्नई में हुआ था।उनका बचपन हैदराबाद में बीता और बाद में उनका परिवार बेंगलुरु में बस गया। वह दाएं हाथ के बल्लेबाज और विशेषज्ञ विकेटकीपर थे।
किरमानी ने भारत के लिए1976 से 1986 तक लगभग एक दशक क्रिकेट खेला। इस दौरान वह भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद विकेटकीपरों में शामिल रहे। उनके करियर में एक दिलचस्प बदलाव भी आया शुरुआत में उन्हें महान भारतीय स्पिन चौकड़ी के पीछे विकेटकीपिंग करनी पड़ी, जबकि बाद के दौर में उन्होंने कपिल देव जैसे तेज गेंदबाजों के साथ खुद को सफलतापूर्वक ढाला।

शुरुआती जीवन और संघर्ष
किरमानी की प्रतिभा बचपन में ही पहचान ली गई थी। बेंगलुरु के उनके शुरुआती कोचकेकी तारापोरने उनकी विकेटकीपिंग क्षमता को पहचाना। BCCI से बातचीत में किरमानी ने बताया था कि उनके कोच उन्हें घर से लेकर अभ्यास के लिए जाते और महान स्पिनरोंईएएस प्रसन्ना और बीएस चंद्रशेखरके सामने विकेटकीपिंग का अभ्यास करवाते थे। यह प्रशिक्षण उनके लिए किसी क्रिकेट स्कूल से कम नहीं था। उस दौर में आधुनिक तकनीक, वीडियो एनालिसिस और विशेष विकेटकीपिंग कोच जैसी सुविधाएं नहीं थीं। किरमानी ने दूसरे महान विकेटकीपरों को देखकर अपनी तकनीक विकसित की। उन्होंने बॉब टेलर से गेंद को बेहद मुलायम हाथों से पकड़ना, एलन नॉट से फिटनेस और तकनीक तथा वसीम बारी से बल्लेबाज पर दबाव बनाने की रणनीति सीखी।
भारतीय टीम में जगह बनाने से पहले उन्हें कुछ वर्षों तकफारुख इंजीनियर के बैकअपके रूप में रहना पड़ा। 1971 से 1975 के बीच वह टीम के साथ रहे, लेकिन नियमित टेस्ट खेलने का मौका नहीं मिला। किरमानी के लिए यह इंतजार आसान नहीं था, लेकिन इसी दौर ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दबाव के लिए तैयार किया। उन्होंने खुद इस अवधि को अपने लिए सीखने और परिपक्व होने का महत्वपूर्ण समय बताया था।
खेल करियर: विकेट के पीछे भरोसे का दूसरा नाम
किरमानी ने24 जनवरी 1976 को ऑकलैंड में न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यूकिया। पहले टेस्ट में उन्हें कोई डिसमिसल नहीं मिला, लेकिन अगले ही टेस्ट में उन्होंने छह खिलाड़ियों को आउट करके एक पारी में सर्वाधिक डिसमिसल के तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड की बराबरी कर ली।
यहीं से उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनने लगी। किरमानी सिर्फ विकेटकीपर नहीं थे। वह निचले क्रम में उपयोगी बल्लेबाजी करने वाले ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्हें मुश्किल परिस्थितियों में टीम का‘क्राइसिस मैन’कहा जाता था। उनके टेस्ट करियर में2,759 रन, दो शतक और 12 अर्धशतकदर्ज हैं। दोनों टेस्ट शतक उन्होंने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में बनाए।
उनका पहला टेस्ट शतक 1979 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आया। उस समय वह टीम में वापसी की कोशिश कर रहे थे और खुद किरमानी ने BCCI को बताया था कि तत्कालीन मुख्य चयनकर्ता राज सिंह डूंगरपुर ने उन्हें ‘डू-ऑर-डाई’ स्थिति में नाइटवॉचमैन के रूप में भेजा था।
किरमानी ने दबाव को पीछे छोड़ते हुए शतक जड़ दिया और टीम में अपनी जगह मजबूत कर ली। दूसरा टेस्ट शतक उन्होंने 1984 में इंग्लैंड के खिलाफ बनाया। इस मैच में उन्होंने नंबर आठ पर बल्लेबाजी करते हुए102 रनबनाए।

देश के लिए उपलब्धियां
सैयद किरमानी के करियर का सबसे बड़ा अध्याय निश्चित रूप से1983 विश्व कपथा। कपिल देव की कप्तानी में भारतीय टीम को टूर्नामेंट की शुरुआत में खिताब का प्रबल दावेदार नहीं माना जा रहा था। लेकिन भारत ने पहले ही मुकाबले में तत्कालीन विश्व चैंपियन वेस्टइंडीज को 34 रन से हराकर अपनी क्षमता का संकेत दे दिया।
किरमानी के अनुसार, इस जीत ने टीम के आत्मविश्वास को पूरी तरह बदल दिया था। इसके बाद आयाट्यूनब्रिज वेल्स का ऐतिहासिक मुकाबला, जहां भारत का सामना जिम्बाब्वे से था। भारत की हालत एक समय17 रन पर 5 विकेटथी। किरमानी को अचानक बल्लेबाजी के लिए तैयार होना पड़ा। वह ड्रेसिंग रूम से मैदान पर पहुंचे और कप्तान कपिल देव के साथ मिलकर पारी को संभाला।
कपिल देव ने उस मैच में नाबाद175 रनबनाए और किरमानी के साथ उनकी नाबाद126 रन की साझेदारीभारत की ऐतिहासिक जीत की नींव बनी। किरमानी ने उस साझेदारी में 24 रन बनाए। विकेटकीपिंग में भी वह असाधारण रहे। उसी विश्व कप में उन्होंने जिम्बाब्वे के खिलाफ एक वनडे मेंपांच डिसमिसलकरके उस समय के विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की। उन्हें पूरे टूर्नामेंट काबेस्ट विकेटकीपरचुना गया। 1983 विश्व कप जीतना उनके लिए करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। खुद किरमानी ने भी इसे अपने क्रिकेट जीवन का शिखर बताया है।
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर
सैयद किरमानी की उपलब्धियां सिर्फ विश्व कप तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने करीब एक दशक तक भारतीय टीम के विकेटकीपर की भूमिका निभाई, 88 टेस्ट खेले और भारतीय क्रिकेट में विकेटकीपिंग का एक मजबूत मानक स्थापित किया। उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें1980-81 में अर्जुन अवॉर्डसे सम्मानित किया। BCCI के रिकॉर्ड में भी उनका नाम 1980-81 के अर्जुन अवॉर्ड विजेताओं में दर्ज है। इसके अगले ही वर्ष, 1982 में उन्हें पद्मश्रीसे भी सम्मानित किया गया। यानी अर्जुन अवॉर्ड उनके करियर के उस दौर में आया, जब वह भारतीय क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद विकेटकीपरों में अपनी जगह पक्की कर चुके थे।
प्रेरक कहानी: जब 17 रन पर गिर गए थे 5 विकेट
सैयद किरमानी की सबसे प्रेरक कहानियों में 1983 विश्व कप का जिम्बाब्वे मुकाबला खास है। भारत की टीम बुरी तरह दबाव में थी।17 रन पर पांच विकेटगिर चुके थे। किरमानी उस समय ड्रेसिंग रूम में आराम कर रहे थे और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उन्हें इतनी जल्दी बल्लेबाजी करनी पड़ेगी।
अचानक उन्हें संदेश मिला“किरि, जल्दी पैड पहन लो।” उन्होंने जल्दबाजी में अपना नाश्ता छोड़ा और मैदान पर पहुंचे। वहां कप्तान कपिल देव पहले से संघर्ष कर रहे थे। दोनों ने मिलकर तय किया कि भारत को पूरे 60 ओवर खेलना होगा। किरमानी ने कपिल को अधिक से अधिक स्ट्राइक देने की रणनीति अपनाई और भारत ने अंततः 60 ओवर पूरे किए। कपिल 175 रन पर नाबाद रहे और किरमानी 24 रन पर नाबाद लौटे।
उस मैच के बाद जो हुआ, वह इतिहास है भारत ने टूर्नामेंट में आगे बढ़ते हुए पहली बारविश्व कप अपने नाम किया। यह कहानी बताती है कि क्रिकेट में हर खिलाड़ी को हर दिन हीरो बनने का मौका नहीं मिलता। कभी-कभी असली भूमिका तब शुरू होती है, जब टीम सबसे ज्यादा मुश्किल में होती है।
महान स्पिनरों से लेकर कपिल देव तक
किरमानी के करियर की एक खास बात यह भी थी कि उन्होंने भारतीय क्रिकेट के दो अलग-अलग गेंदबाजी दौर देखे। शुरुआत में उन्हेंबिशन सिंह बेदी, ईएएस प्रसन्ना, बीएस चंद्रशेखर और एस. वेंकटराघवनजैसे महान स्पिनरों के पीछे विकेटकीपिंग करनी थी।
बाद में भारतीय गेंदबाजी में कपिल देव के नेतृत्व में तेज गेंदबाजों का प्रभाव बढ़ा। किरमानी ने अपनी तकनीक को उसी हिसाब से बदला। कपिल देव के साथ उनकी जोड़ी खास रही। तेज गेंदबाज के पीछे विकेटकीपिंग करते हुए किरमानी गेंद की स्विंग और गति को पढ़ने में माहिर थे। BCCI के मुताबिक कप्तान बिशन बेदी और सुनील गावस्कर को उनकी फुर्ती और भरोसे पर इतना विश्वास था कि कपिल जैसे गेंदबाजों के पीछे स्लिप में अतिरिक्त खिलाड़ी रखने की जरूरत भी कई बार महसूस नहीं की जाती थी।
आंकड़े जो उनकी महानता बताते हैं
सैयद किरमानी ने भारत के लिए:
BCCI के अनुसार टेस्ट क्रिकेट में उनके 38 स्टंपिंग उस समय बेहद उल्लेखनीय उपलब्धि थी और आज भी भारतीय रिकॉर्ड के रूप में दर्ज है।
खेल के बाद की जिंदगी
1986 के आसपास अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदाई लेने के बाद किरमानी ने क्रिकेट से रिश्ता खत्म नहीं किया। उन्होंने भारतीय क्रिकेट प्रशासन और चयन व्यवस्था में भी भूमिका निभाई। वहराष्ट्रीय चयन समिति के अध्यक्षरहे औरकर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (KSCA) के उपाध्यक्ष भी रहे। 2015-16 में BCCI ने भारतीय क्रिकेट में उनके लंबे योगदान के लिए उन्हेंCol. C.K. Nayudu Lifetime Achievement Award के लिए चुना। जनवरी 2016 में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। BCCI के अनुसार इस सम्मान के साथ 25 लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी थी।

आज वे क्या कर रहे हैं?
सैयद किरमानी आज भी भारतीय क्रिकेट की उस पीढ़ी की महत्वपूर्ण आवाज हैं, जिसने देश में क्रिकेट को एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते देखा। वह समय-समय पर क्रिकेट से जुड़े कार्यक्रमों, इंटरव्यू और चर्चाओं में नजर आते हैं तथा अपने लंबे अनुभव के जरिए भारतीय क्रिकेट की पुरानी यादों और तकनीकी पहलुओं पर बात करते हैं।
2016 में BCCI के साथ बातचीत में उन्होंने अपने पूरे करियर को याद करते हुए कहा था किक्रिकेट ने उन्हें जीवन की शिक्षा दी।उनके लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं था, बल्कि अनुशासन, धैर्य, टीमवर्क और दबाव में सही फैसला लेने की सीख भी था।
आज जब भारतीय क्रिकेट में विकेटकीपिंग को महेंद्र सिंह धोनी, ऋषभ पंत और दूसरे आधुनिक सितारों से जोड़ा जाता है, उससे कई दशक पहले सैयद किरमानी ने इस भूमिका के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया था।
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सैयद किरमानी की विरासत
सैयद किरमानी की कहानी उस दौर की कहानी है, जब क्रिकेट में आज जैसी तकनीक नहीं थी। न वीडियो एनालिसिस, न आधुनिक फिटनेस सेंटर और न हर गेंद का डिजिटल रिकॉर्ड। खिलाड़ी विपक्षी टीम को देखकर सीखते थे और मैदान पर अपने अनुभव से खुद को बेहतर बनाते थे।
किरमानी ने इसी दौर में अपनी पहचान बनाई।फारुख इंजीनियर के बैकअप से भारत के नंबर-वन विकेटकीपर बनने तक, महान स्पिनरों के पीछे खड़े होने से लेकर कपिल देव की तेज गेंदबाजी को संभालने तक, और 1983 विश्व कप की ऐतिहासिक जीत से अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री तक उनका सफर भारतीय क्रिकेट के विकास की कहानी भी है।
और शायद सैयद किरमानी की सबसे बड़ी खासियत यही थी—वह कभी सबसे ज्यादा शोर करने वाले खिलाड़ी नहीं रहे, लेकिन जब टीम को उनकी जरूरत पड़ी, वह हमेशा वहां खड़े मिले। 1983 की विश्व विजेता टीम का यह ‘क्राइसिस मैन’ भारतीय क्रिकेट में उस भरोसे का नाम है, जो विकेट के पीछे खड़ा होकर भी पूरे मैच की दिशा बदल सकता है।