इक़बाल की ‘ख़ुदी’ में गीता के कर्मयोग की झलक

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-09-2026
Glimpses of the Gita’s Karma Yoga in Iqbal’s Khudi
Glimpses of the Gita’s Karma Yoga in Iqbal’s Khudi

 

ग़ौस सिवानी

यक़ीं मुहकम अमल पैहम मुहब्बत फ़ातेह-ए-आलम

जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें

क्या आपको लगता है कि इक़बाल के इस शेर में कहीं भगवद्गीता की झलक दिखाई देती है? जी हाँ! यह सवाल आपको हैरान कर सकता है, क्योंकि इक़बाल ने अपनी शायरी में इस्लामी फ़लसफ़े पर ज़ोर दिया है। लेकिन जिन स्रोतों से उन्होंने विचार और प्रेरणा ली, उनमें भगवद्गीता भी शामिल है।

असल में, अल्लामा इक़बाल भारतीय उपमहाद्वीप के उन महान विचारकों में गिने जाते हैं जिन्होंने पूर्व और पश्चिम के दर्शन, धार्मिक परंपराओं और मानव सभ्यता के अलग-अलग वैचारिक स्रोतों का गहरा अध्ययन किया। उनकी सोच का सबसे बड़ा आधार "ख़ुदी" और "अमल" है।
 
इक़बाल के अनुसार जीवन का रहस्य गति, संघर्ष, सृजन और लगातार कर्म करने में छिपा है। वे इंसान को तक़दीर के सामने बेबस प्राणी या दुनिया से भागने वाला संन्यासी नहीं, बल्कि एक सक्रिय, दृढ़ इच्छाशक्ति वाला और सृजनशील व्यक्तित्व मानते हैं।
 
इसी संदर्भ में कुछ शोधकर्ताओं ने इक़बाल के कर्म-दर्शन और हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ भगवद्गीता के कर्मयोग के बीच समानता की ओर ध्यान दिलाया है। हालाँकि इक़बाल की वैचारिक नींव क़ुरआन और इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने गीता सहित अनेक धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया।
 
जहाँ भी उन्हें नैतिक ज़िम्मेदारी और कर्म का महत्व दिखाई दिया, उन्होंने उसकी सराहना की। इक़बाल का परिवार मूल रूप से एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार था, जिसने मुग़ल काल में इस्लाम स्वीकार किया था।
 
इस परिवार में सदियों से शिक्षा का वातावरण रहा था। इक़बाल संस्कृत भाषा से भी परिचित थे, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया, जिनमें वेद और गीता शामिल थे। गीता के कर्म-दर्शन ने उन्हें प्रभावित किया और बाद में उन्होंने उसे अपनी शायरी का एक महत्वपूर्ण विषय बनाया।
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इक़बाल और कर्म का दर्शन

इक़बाल के अनुसार जीवन का अर्थ आराम, ठहराव और निष्क्रियता नहीं, बल्कि निरंतर गति और संघर्ष है। उनके अनुसार यह पूरा ब्रह्मांड लगातार गतिशील है और इंसान भी इस गतिशील व्यवस्था का सक्रिय हिस्सा है। इसलिए वे अपनी शायरी में बार-बार कर्म, गति और लगातार प्रयास का संदेश देते हैं। यही संदेश भगवद्गीता में भी मिलता है।

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी

यह ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
 
इस शेर में इक़बाल साफ़ कहते हैं कि इंसान की असली पहचान और उसका दर्जा उसके कर्म से तय होता है। इंसान अपने कर्मों के द्वारा ऊँचाई भी हासिल करता है और गिरावट भी।
 
एक और जगह वे कहते हैं:--
 
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

यह शेर इक़बाल के फ़लसफ़ा-ए-ख़ुदी का सार है। यहाँ इंसान को तक़दीर का गुलाम नहीं, बल्कि अपनी इच्छा और कर्म से आगे बढ़ने वाला व्यक्तित्व बताया गया है। इक़बाल संन्यास और दुनिया से भागने की प्रवृत्ति को पसंद नहीं करते थे।
 
इसलिए उन्होंने सूफ़ीवाद के नाम पर फैली निष्क्रियता की आलोचना की। हालाँकि वे सच्चे सूफ़ियों का सम्मान करते थे, उनकी किताबें पढ़ते थे और उनकी दरगाहों पर भी जाते थे। वे सूफ़ियों से इसलिए भी जुड़े थे क्योंकि उनका परिवार एक कश्मीरी ऋषि के प्रभाव से मुसलमान हुआ था।
 
इक़बाल ने जलालुद्दीन रूमी को अपना आध्यात्मिक गुरु भी माना है। उनके प्रिय सूफ़ियों में ग़ज़ाली, मंसूर हल्लाज, शेख़ अहमद सरहिंदी और शाह हमदान भी शामिल हैं। इसलिए सूफ़ी परंपरा से जुड़ाव होने के बावजूद वे संन्यास का समर्थन नहीं करते थे और जीवन में परिवर्तन के लिए कर्म और निरंतर प्रयास को ज़रूरी मानते थे।
 
भगवद्गीता और कर्म का सिद्धांत

भगवद्गीता भारतीय दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें श्रीकृष्ण युद्धभूमि में अर्जुन को उसके कर्तव्य और ज़िम्मेदारी निभाने की शिक्षा देते हैं। गीता का मूल संदेश यह है कि इंसान को फल की चिंता किए बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
 
महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले जब अर्जुन ने देखा कि सामने की सेना में उसके रिश्तेदार, गुरु और मित्र खड़े हैं, तो वह बहुत व्याकुल हो गया। उसने श्रीकृष्ण से कहा कि वह अपने बड़ों, गुरुओं, भाइयों, बेटों, मित्रों और रिश्तेदारों को मारना नहीं चाहता। ऐसी जीत, राज्य या सुख का क्या लाभ, जिसके लिए अपने ही लोगों का रक्त बहाना पड़े?
 
अपने ही लोगों की हत्या करना बहुत बड़ा पाप होगा। मुझे न विजय चाहिए, न राज्य और न ही वे सुख, जिनके लिए यह युद्ध लड़ा जा रहा है। ऐसे में अपने प्रियजनों को मारने से अच्छा है कि मैं बिना हथियार उठाए ही मारा जाऊँ।
 
महाभारत के अनुसार अर्जुन ने कहा, "हे कृष्ण! मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य और न ही सुख। जिन लोगों के लिए हम राज्य और सुख चाहते हैं, वही लोग आज हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।"
 
अर्जुन को इस मानसिक स्थिति से बाहर निकालने के लिए श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया। इसमें कर्तव्य (धर्म), कर्म, आत्मा की अमरता और फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करने पर ज़ोर दिया गया है।
 
यही संवाद भगवद्गीता कहलाता है। चूँकि इसमें कर्म पर विशेष बल दिया गया है, इसलिए यह शिक्षा इक़बाल को भी प्रभावित करती है और वे अपनी शायरी, व्याख्यानों और पत्रों में भी बार-बार यही संदेश देते हैं।
 
गीता में कर्म छोड़ने की नहीं, बल्कि कर्म करते हुए आध्यात्मिक उन्नति करने की शिक्षा दी गई है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह युद्ध से भागे नहीं, बल्कि मैदान में डटा रहे और अपने कर्तव्य का पालन करे।
 
यही वह बात है जो इक़बाल की सोच के बहुत क़रीब दिखाई देती है। इक़बाल भी इंसान को दुनिया से अलग होकर बैठने के बजाय जीवन के मैदान में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा देते हैं। तक़दीर और पुरुषार्थ के अंतर को गीता और हिंदू दर्शन में किस तरह समझाया गया है, इसके बारे में उनकी यह बात पढ़िए: "हिंदू समाज के मन और बुद्धि में कर्म और दर्शन का एक अनोखा मेल हुआ है।
 
इस समाज के गहरे विचार करने वाले दार्शनिकों ने कर्म की शक्ति पर बहुत गंभीर विचार किया और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य के जीवन का जो लगातार चलने वाला क्रम है, जो उसके दुखों और कष्टों का कारण भी है, वह उसके कर्मों से तय होता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य की वर्तमान स्थिति उसके पिछले कर्मों का स्वाभाविक परिणाम है। जब तक कर्म का यह नियम चलता रहेगा, तब तक उसी प्रकार के परिणाम भी सामने आते रहेंगे।
 
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध जर्मन कवि गोएथे का पात्र 'फ़ाउस्ट' जब यूहन्ना के सुसमाचार की पहली पंक्ति में 'वचन' की जगह 'कर्म' शब्द पढ़ता है— 'आरंभ में वचन था, वचन ईश्वर के साथ था और वचन ही ईश्वर था', तो वास्तव में उसकी गहरी दृष्टि उसी सत्य को देखती है जिसे हिंदू दार्शनिक सदियों पहले समझ चुके थे।
 
इस अनोखे ढंग से हिंदू दार्शनिकों ने भाग्य और मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा, अर्थात् नियति और स्वतंत्रता की समस्या को समझाने की कोशिश की। दार्शनिक दृष्टि से उनका यह विचार प्रशंसा के योग्य है।
 
विशेष रूप से इसलिए कि उन्होंने साहस के साथ उन सभी निष्कर्षों को भी स्वीकार किया जो इस सिद्धांत से निकलते हैं। अर्थात यदि मनुष्य का व्यक्तित्व उसके कर्मों से बनता है, तो उससे मुक्त होने का एक ही उपाय है- कर्म का त्याग।
 
लेकिन यह निष्कर्ष व्यक्ति और समाज, दोनों के लिए बहुत ख़तरनाक था। इसलिए ज़रूरत थी कि कोई महान सुधारक आए और कर्म-त्याग का सही अर्थ बताए। मानव इतिहास में श्रीकृष्ण का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा, क्योंकि इस महान व्यक्ति ने बहुत सुंदर ढंग से अपने देश की दार्शनिक परंपराओं की समीक्षा की और यह स्पष्ट किया कि कर्म-त्याग का अर्थ पूरी तरह कर्म छोड़ देना नहीं है।
 
कर्म करना तो मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा है और उसी से जीवन की रक्षा होती है। असली अर्थ यह है कि मनुष्य कर्म करे, लेकिन उसके फल से आसक्त न हो।श्रीकृष्ण के बाद श्रीरामानुज ने भी यही मार्ग अपनाया। लेकिन अफ़सोस कि जिस सत्य को श्रीकृष्ण और श्रीरामानुज सामने लाना चाहते थे, उसे आदि शंकराचार्य के तर्कों ने फिर से ढँक दिया और श्रीकृष्ण की क़ौम उनके सुधार के फल से वंचित रह गई।"(दीबाचा-ए-असरार-ए-ख़ुदी)
 
असरार-ए-ख़ुदी की भूमिका के इस अंश में अल्लामा इक़बाल ने हिंदू दर्शन, विशेष रूप से कर्म के सिद्धांत और कर्म-त्याग की धारणा का बहुत गहराई और निष्पक्षता के साथ विश्लेषण किया है। यहाँ वे केवल आलोचना नहीं करते, बल्कि हिंदू दार्शनिकों की बौद्धिक महानता को भी स्वीकार करते हैं।
 
इक़बाल के अनुसार हिंदू विचारकों ने मनुष्य के जीवन के एक बड़े प्रश्न, भाग्य और स्वतंत्र इच्छा  को समझाने का गंभीर प्रयास किया। उनके अनुसार मनुष्य की वर्तमान स्थिति उसके पूर्व कर्मों का परिणाम है और जीवन का क्रम, कर्म के नियम के अनुसार चलता रहता है। इक़बाल इस विचार की दार्शनिक गहराई को स्वीकार करते हैं और उसकी सराहना करते हैं। इसी कारण वे गोएथे के फ़ाउस्ट का उदाहरण देते हैं, जहाँ "वचन" की जगह "कर्म" को मूल सत्य माना गया है।
 
इक़बाल का कर्म-दर्शन

इक़बाल हर उस विचार का विरोध करते हैं जो मनुष्य को निष्क्रिय बना दे। वे विशेष रूप से मुसलमानों को कर्म और निरंतर प्रयास का संदेश देते हैं ताकि वे अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा फिर से प्राप्त कर सकें।
 
वे अपने एक व्याख्यान में कहते हैं:"पिछले पाँच सौ वर्षों से इस्लामी चिंतन व्यवहारिक रूप से ठहरा हुआ है। एक समय था जब पश्चिमी विचारों को प्रकाश और प्रेरणा इस्लामी दुनिया से मिलती थी।"(अल्लामा मुहम्मद इक़बाल के अंग्रेज़ी व्याख्यानों का उर्दू अनुवाद, पृष्ठ 13, इक़बाल अकादमी पाकिस्तान)
 
इक़बाल का मुख्य उद्देश्य इस्लामी चिंतन का पुनर्जागरण था। वे चाहते थे कि जैसे पश्चिमी और हिंदू विचारकों ने अपनी परंपराओं को नए रूप में प्रस्तुत किया, वैसे ही मुसलमान भी अपनी बौद्धिक शक्ति को फिर से जागृत करें। भगवद्गीता की शिक्षाओं के प्रति उनकी रुचि का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी था।
 
ख़ुदी और कर्म का संबंध

इक़बाल के फ़लसफ़ा-ए-ख़ुदी और गीता के कर्मयोग में एक बड़ी समानता यह है कि दोनों मनुष्य को सक्रिय जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। इक़बाल के अनुसार ख़ुदी कोई स्थिर चीज़ नहीं है, बल्कि लगातार कर्म और संघर्ष से विकसित होने वाली शक्ति है। जितना अधिक मनुष्य कर्म करता है, उसकी ख़ुदी उतनी ही मज़बूत होती जाती है।
 
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।

यह शेर इंसान को आगे बढ़ते रहने, नई मंज़िलों की तलाश करने और संघर्ष जारी रखने का संदेश देता है।
 
इसी तरह वे कहते हैं:--
 
नहीं तेरा नशीमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में।

यह शेर इक़बाल की कविता "एक नौजवान के नाम" से है। यहाँ वे आराम, ऐश और ठहराव के बजाय ऊँचे लक्ष्य, स्वतंत्रता और निरंतर संघर्ष की शिक्षा देते हैं। अपने भाषणों में भी वे युवाओं से कहते थे कि आरामपसंदी छोड़ो और मेहनत करो।
 
इक़बाल और संसार-त्याग की आलोचना

इक़बाल उन सभी विचारों के आलोचक थे जो मनुष्य को दुनिया से काट दें, निष्क्रिय बना दें या केवल भाग्य के भरोसे छोड़ दें। उन्होंने कुछ सूफ़ी प्रवृत्तियों और कुछ दार्शनिक व्याख्याओं की भी इसी आधार पर आलोचना की, क्योंकि उनके अनुसार उनसे कर्म की शक्ति कमज़ोर पड़ती थी।
 
विशेष रूप से वे आदि शंकराचार्य के माया दर्शन और अद्वैत की उन व्याख्याओं से सहमत नहीं थे जिनमें संसार को केवल भ्रम या असत्य माना जाता है। हालाँकि वे आदि शंकराचार्य का सम्मान करते थे। इक़बाल के अनुसार यह संसार कर्म का क्षेत्र है और यही मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। इसलिए मनुष्य को अंतिम साँस तक प्रयास करते रहना चाहिए।
 
वे कहते हैं:--
 
फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का

न हो निगाह में शोखी तो दिलबरी क्या है।

और—

जहान-ए-ताज़ा की अफ़कार-ए-ताज़ा से है नुमूद

कि संग-ओ-ख़िश्त से होते नहीं जहाँ पैदा।

ये शेर बताते हैं कि नए विचार और कर्म मिलकर ही नई दुनिया का निर्माण करते हैं।
 
इक़बाल का हिंदू परंपरा से संबंध

इक़बाल के पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे, जिन्होंने बाद में इस्लाम स्वीकार किया था। स्वयं इक़बाल ने भी एक शेर में अपने ब्राह्मण वंश का उल्लेख किया है। लेकिन उनकी वैचारिक और आध्यात्मिक निष्ठा पूरी तरह इस्लामी परंपरा के साथ थी। उनका मुख्य उद्देश्य इस्लामी चिंतन का पुनर्जागरण और मुसलमानों में बौद्धिक जागृति लाना था। इसके लिए उन्होंने जहाँ इस्लामी परंपरा से प्रेरणा ली, वहीं हिंदू ज्ञान और दर्शन से भी सीख प्राप्त की।

जावेदनामा और गति का संदेश

इक़बाल की महान मसनवी जावेदनामा वास्तव में एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसमें वे अनेक ऐतिहासिक, दार्शनिक और धार्मिक व्यक्तियों से संवाद करते हैं। इस पूरी रचना का मूल संदेश भी गति, विकास और निरंतर कर्म है।
 
इस पुस्तक में उनके आध्यात्मिक गुरु मौलाना रूमी बार-बार मनुष्य को जड़ता, निष्क्रियता और केवल ध्यान में डूबे रहने से बाहर निकलकर कर्म और सृजन के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
 
इसी कारण इक़बाल की पूरी विचारधारा में गति एक मूल सिद्धांत है। उनके अनुसार जीवन का अर्थ ही गति है और ठहराव ही मृत्यु है।
 
वे कहते हैं:--
 
यही आईन-ए-क़ुदरत है, यही उस्लूब-ए-फ़ितरत है

जो है राह-ए-अमल में गामज़न, महबूब-ए-फ़ितरत है।

अर्थात् प्रकृति का यही नियम है कि जो व्यक्ति कर्म के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता रहता है, वही प्रकृति का प्रिय बनता है।इक़बाल का अपना जीवन भी कर्म और संघर्ष का उदाहरण था। उन्होंने जो कुछ भी पाया, अपने परिश्रम से पाया। उनके पिता शेख़ नूर मुहम्मद दर्ज़ी थे और टोपियाँ सिलते थे। ऐसे में उनके लिए यूरोप जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं था, लेकिन लगातार मेहनत ने इसे संभव बना दिया।
 
इसी कारण भगवद्गीता का कर्म-दर्शन उन्हें बहुत प्रिय था। वे उसे संस्कृत में पढ़ते थे और चाहते थे कि उसका अनुवाद करें ताकि अधिक से अधिक लोग उससे लाभ उठा सकें। इसी उद्देश्य से उन्होंने महाराजा किशन प्रसाद शाद को लिखे एक पत्र में गीता का अनुवाद करने की इच्छा व्यक्त की थी।
 
हालाँकि वे पेशेवर अनुवादक नहीं थे और उन्होंने किसी अन्य पुस्तक का अनुवाद भी नहीं किया था, लेकिन इस ग्रंथ ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे उसका अनुवाद करना चाहते थे।गीता का अल्लामा इक़बाल की सोच पर कितना गहरा प्रभाव था, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गीता में कहा गया है कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं, क्योंकि आत्मा अमर है। इसी संदर्भ में इक़बाल कहते हैं:
 
ज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहीं

टूटना जिसका मुक़द्दर हो यह वह गौहर नहीं

कुल मिलाकर देखा जाए तो इक़बाल की शायरी पर भगवद्गीता में वर्णित श्रीकृष्ण के उपदेशों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। वे चाहते थे कि पूरी क़ौम हमेशा कर्म और संघर्ष में लगी रहे।
 
सूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौम

करती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाब।