जीना तो है उसी का, जो औरों के काम आया

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari • 3 Months ago
जीना तो है उसी का, जो औरों के काम आया
जीना तो है उसी का, जो औरों के काम आया

 

फ़िरदौस ख़ान  
 
वे लोग बहुत ख़ुशनसीब हुआ करते हैं, जो किसी के काम आते हैं, क्योंकि अल्लाह ही ख़िदमते-ख़ल्क यानी अपनी मख़लूक की मदद के लिए कुछ लोगों को चुनता है. यही वे लोग हैं, जो अल्लाह की तरफ़ से रहमत का ज़रिया बनकर मुसीबतज़दा और परेशान हाल लोगों तक पहुंचते हैं और उनकी मदद करते हैं. ये मदद कई तरह की हुआ करती है. कोई जान से मदद करता है, तो कोई मालो-दौलत से मदद करता है. कोई किसी ज़रूरतमंद को उस जगह तक पहुंचा देता है, जहां से उसकी मदद हो जाती है. 

 
इस्लाम में ख़िदमते-ख़ल्क को इबादत का दर्जा दिया गया है. इसीलिए अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों को ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने की ताक़ीद की. एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर तुम किसी की मदद करने के क़ाबिल न हो, तो किसी और से उसकी सिफ़ारिश कर दो.
 
एक अन्य हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो आदमी अपने किसी भाई को जिसके जिस्म पर ज़रूरत के मुताबिक़ कपड़े न हों, उसे कपड़े पहनाएगा या देगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनाएगा. और जो किसी भूखे को खाना खिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत के मेवे खिलाएगा. जो किसी प्यासे को पानी पिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का शर्बत पिलाएगा. 
 
ये मदद ऐसी होनी चाहिए कि ज़रूरतमंद लोगों को शर्मिन्दगी का अहसास न हो. इसीलिए तो कहते हैं कि मदद इस तरह करनी चाहिए कि एक हाथ से कुछ दो, तो दूसरे हाथ को ख़बर भी न हो. मिसाल के तौर पर किसी लड़की की शादी है या किसी को इलाज की ज़रूरत है या किसी के घर कोई कमाने वाला नहीं है और उन्हें दो वक़्त का खाना भी नहीं मिल पा रहा है, तो ऐसे लोगों तक मदद पहुंचाई जानी चाहिए,
 
बिना किसी शोर-शराबे के, बिना तस्वीरें वायरल किए. यही तो असल मदद है. 
 
आज के दौर में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो दूसरों की मदद करना अपना फ़र्ज़ मानते हैं और इस नेकी के काम में आगे रहते हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह ने फ़रमाया है कि नेकी सिर्फ़ यही नहीं है कि तुम अपना रुख़ मशरिक़ और मग़रिब की तरफ़ फेर लो, बल्कि असल नेकी तो ये है कि कोई शख़्स अल्लाह और क़यामत के दिन और फ़रिश्तों और अल्लाह की किताब और नबियों पर ईमान लाए और अल्लाह की मुहब्बत में अपना माल क़राबतदारों यानी रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों और साइलों यानी मांगने वालों पर और ग़ुलामों को आज़ाद कराने में ख़र्च करे और पाबंदी से नमाज़ पढ़े और ज़कात देता रहे और जब कोई वादा करे, तो उसे पूरा करे और तंगी और मुसीबत और जंग की सख़्ती के वक़्त सब्र करने वाला हो. यही लोग सच्चे हैं और यही लोग परहेज़गार हैं. 

(क़ुरआन 2:117)
दिल्ली के आज़ाद मार्केट इलाक़े में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो ख़ामोशी से इस नेक काम को अंजाम दे रहे हैं. एक ख़ुदाई ख़िदमतगार बरसों से हर रोज़ बिला नाग़ा एक देग़ बनाते हैं और तक़सीम करते हैं. जो भी उनसे खाने का सवाल करता है, वे उससे सिर्फ़ इतना पूछते हैं कि कितने लोगों के लिए चाहिए? इलाक़े में बहुत से ऐसे घर हैं, जिनमें अकेली बुज़ुर्ग औरतें हैं, कई घरों में छोटे बच्चे हैं और उनके घर कमाने वाला कोई नहीं है. ऐसे ज़रूरतमंद लोगों तक वे खाना पहुंचा रहे हैं. वे अपना नाम ज़ाहिर तक नहीं करना चाहते.         
  
इलाक़े की बाशिन्दा राबिया भी इस तरह के नेक कामों में पीछे नहीं रहतीं. वे अपनी कई परिचित महिलाओं के साथ मिलकर ज़रूरतमंद लोगों तक कपड़े और सामान पहुंचाती हैं. शादी-ब्याह में दुल्हन को बरी में भारी-भरकम जोड़े चढ़ाए जाते हैं, जो बस एक-दो बार ही पहने जाते हैं.
 
ऐसे में ये जोड़े किसी सन्दूक़ में बंद करके रख दिए जाते हैं. इसी तरह महिलाएं भी हर शादी-ब्याह या किसी और समारोह के लिए भारी-भरकम जोड़े तो बना लेती हैं, लेकिन उसे दो-चार बार से ज़्यादा नहीं पहनतीं. बस इसी तरह के कपड़ों को इकट्ठा किया जाता है और फिर उन्हें ऐसे घरों में भेज दिया जाता है, जहां उनकी ज़रूरत है.
 
कपड़ों के अलावा कम्बल, बर्तन और खाद्य सामग्री भी ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाई जाती है. बहुत से लोग ऐसे हैं, जो सरकारी डिपो से मिला राशन इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं है. ऐसे में उनसे राशन लेकर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचा दिया जाता है. इसमें गेहूं और चावल भी शामिल हैं.
 
दरअसल, हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं. हर मौसम में उस मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं. सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कम्बल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या. बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया. हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती, लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए. इस मौसम में कुछ नया ही पहनना है. पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वह पुराना लगने लगा. वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं. ये घर-घर की कहानी है.
 
जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वे पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है. कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए, किसके पास इतना वक़्त है. अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो. बस इसी सोच के साथ ये ख़ुदाई ख़िदमतगार काम कर रहे हैं.
 
बहुत लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें ये ख़ुदाई ख़िदमतगार ज़ाती तौर पर नहीं जानते और न ही कभी उनसे मिले हैं. कोई बता देता है कि उनके इलाक़े में ऐसे लोग हैं, जिन्हें मदद की ज़रूरत है, तो वे उन लोगों तक सामान पहुंचा देते हैं.
 
इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि वे वाक़ई बहुत ज़रूरतमंद हों. सबसे ख़ास बात ये है कि किसी को कपड़े या दूसरी चीज़ें देते वक़्त इस बात का पूरा ख़्याल रखा जाता है कि कपड़े ज़्यादा पुराने, फटे हुए या फिर रंग से बेरंग हुए न हों. चीज़ें भी ऐसी होनी चाहिए, जिनका ख़ुशी-ख़ुशी इस्तेमाल किया जा सके. चीज़ें वहीं अच्छी लगती हैं, जहां उनकी ज़रूरत होती है.
 
इलाक़े के डॉ. शफ़ीक़ अहमद इस्लाही भी ख़िदमते-ख़ल्क करते हैं. वे क़ुरान हाफ़िज़ हैं. वे एक मुअज़ज़िन भी हैं. वे मस्जिद में अज़ान देते हैं और जुमे को ख़ुत्बा भी पढ़ते हैं. वे ज़रूरतमंदों की हर मुमकिन मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. वे साल 1972 से ख़िदमते-ख़ल्क कर रहे हैं. उनके पास कोई ऐसा मरीज़ आता है, जिसके पास दवा के लिए पैसे न हों, तो वे उससे दवा की क़ीमत नहीं लेते. किसी मरीज़ को किसी बड़े अस्पताल में दिखाना हो, तो वे उसकी भी मदद करते हैं. वे उसके इलाज के लिए पैसों भी दे देते हैं. वे रमज़ान में खाद्य सामग्री तक़सीम करते हैं, तो सर्दियों में कम्बल बांटते हैं.
 
 
बच्चों के टीकाकरण और पोलियो की दवाई पिलाने के मामले में भी वे आगे रहते हैं. स्वास्थ्कर्मियों की टीम उनके क्लीनिक पर आ जाती है और मस्जिद के लाउडस्पीकर के ज़रिये ऐलान कर दिया जाता है कि उनके क्लीनिक में बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं या दवा पिलाई जा रही है.
 
आधी रात को भी किसी को उनकी ज़रूरत होती है, तो वे इलाज के लिए पहुंच जाते हैं. हालांकि वे बहुत ही ज़ईफ़ हैं, लेकिन अपना फ़र्ज़ निभाने में पीछे नहीं रहते. इलाक़े के हिन्दू लोग उन्हें भगवान की तरह मानते हैं. पप्पू का कहना है कि उनकी एक पुकार पर डॉक्टर साहब आ जाते हैं. वे बिना किसी भेदभाव के सबकी मदद करते हैं. कोरोना काल के दौरान उन्होंने उनमें से कई लोगों की दुकानों का किराया तक अपने पास से दिया है.        
 
इलाक़े की बाशिन्दा क़सीम फ़ातिमा भी इस नेक काम में डॉक्टर साहब का हाथ बटाती हैं. वे ज़रूरतमंद लोगों को उन ख़ुदाई ख़िदमतगारों तक पहुंचाती हैं, जो मदद मुहैया कराते हैं. उनके पास दूर-दूर से ज़रूरतमंद महिलाएं आती हैं. कई साहिबे-हैसियत लोग उनके ज़रिये लोगों तक मदद पहुंचाते हैं. वे बताती हैं कि मदद लेने वाले लोगों की तस्वीरें नहीं खींची जातीं, क्योंकि इससे उनकी ख़ुद्दारी को ठेस पहुंचती है. कोई भी व्यक्ति बहुत ही बेबसी और मजबूरी की हालत में ही किसी से मदद क़ुबूल करता है.
 
हां, इतना ज़रूर है कि खाद्य सामग्री और कम्बल वग़ैरह तक़सीम करते वक़्त लोगों से उनके किसी पहचान-पत्र की छायाप्रति ले ली जाती है. इससे पारदर्शिता भी बनी रहती है और यह भी सुनिश्चित रहता है कि एक वक़्त में एक व्यक्ति को एक बार ही मदद दी जाए. खाद्य सामग्री में आटा, चावल, दाल, चना, बेसन, तेल, वनस्पति घी, चीनी, नमक और मसाले आदि दिए जाते हैं. 
  
कोरोना काल में लगी तालाबंदी के वक़्त में भी यहां के ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने ज़रूरतमंद लोगों को खाद्य सामग्री और ऑक्सीज़न सिलेंडर मुहैया करवाए हैं. ईद के मौक़े पर यह सुनिश्चत किया गया कि ज़कात और फ़ितरे की रक़म अपने आसपास के ऐसे लोगों तक पहुंचाई, जो बेसहारा हैं, मजबूर हैं और बेबस हैं, जिनके यहां कोई कमाने वाला नहीं है या जो मेहनत-मशक़्क़त करके भी मुश्किल से गुज़ारा कर पा रहे हैं.
 
तालाबंदी की वजह से कितने ही घरों में फ़ाक़ों तक की नौबत आ गई थी. वैसे भी हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा पड़ौसी अच्छा है या बुरा है. मैदाने हश्र में इसका जवाब वह ख़ुद देगा, लेकिन अगर वह भूख से मर गया, तो इसका जवाब हमें ही देना होगा. 
 
दानिश ख़ान का कहना है कि मदद करने के लिए बहुत से पैसों की नहीं, बल्कि नीयत की ज़रूरत होती है. अगर इंसान किसी की मदद करना चाहे, तो वह अपनी थाली में से आधा खाना किसी भूखे को खिला सकता है.
 
उनका कहना है कि हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम ज़कात और फ़ितरे की रक़म से अपने आसपास के ज़रूरतमंद लोगों की इतनी मदद कर दें कि वे दो वक़्त भरपेट खाना खा सकें, बीमार अपना इलाज करा सकें और ज़रूरत की कोई चीज़ खरीद सकें. अल्लाह भी उन्हीं लोगों को पसंद करता है, जो उसके बंदों से मुहब्बत करते हैं और उनकी मदद करते हैं.
 
(लेखिका शायरा, कहानीकार व पत्रकार हैं)