पंजाब के कादियां से सवा सौ साल से मोहब्बत का पैगाम दे रहा है जमात-ए-अहमदिया सम्मेलन

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 1 Years ago
पंजाब के कादियां से सवा सौ साल से मोहब्बत का पैगाम दे रहा है जमात-ए-अहमदिया सम्मेलन
पंजाब के कादियां से सवा सौ साल से मोहब्बत का पैगाम दे रहा है जमात-ए-अहमदिया सम्मेलन

 

अमरीक सिंह/ जालंधर

पंजाब के जिला गुरदासपुर के कादियां मुसलमान बाहुल्य इलाके कादियां में सालाना क़ौंमतरी जमात-ए-अहमदिया सम्मेलन हाल ही में संपन्न हो गया. अहम बात यह है कि यह सम्मेलन बीते 127 वर्षों से मुतवातर इसी जगह मनाया जाता है और दुनिया भर में फैले अहमदिया मुसलमान प्रतिनिधि भारी तादाद में इसमें शिरकत करते हैं.

शुरू से ही यह आयोजन तीन दिन चलता आया है और नामवर बुद्धिजीवी इसमें शिरकत करते हैं. आखिरी दिन इसलिए भी अहम होता है कि विचार-वमर्श से निकले महत्वपूर्ण निष्कर्ष को कौमियत संदेश के तौर पर सदर द्वारा प्रस्तुत किया जाता है.

इस बार के सदर इमाम जमात-ए-अहमदिया हजरत मिर्जा मशरूर अहमद खलीफा मसीह अल-खासिम थे. अंतिम सत्र में पैगाम देते हुए उन्होंने कहा कि समकालीन (बेलगाम) मीडिया की वजह से दुनिया अनैतिकता तथा अश्लीलता की तरफ आकर्षित हो रही है. यह समूचे समाज के लिए घातक है.

मिर्जा मशरूर अहमद खलीफा मसीह अल-खासिम ने कहा कि इंसानियत और नेकी की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए. यही खुदा की सच्ची इबादत है और उसके पावन संदेशों का मूल सार भी! उन्होंने 'नजर के पर्दे' की अवधारणा अख्तियार करने पर भी जोर दिया.

मसीह अल कासिम ने पैगाम में जानकारी दी कि हिंदुस्तानी पंजाब के कादियां से लेकर सुदूर अफ्रीकी देशों, ब्रिटेन, टोगो, आइवरी कोस्ट, बुर्किना फांसो आदि मुल्कों में भी ऐसे ठीक ऐसे ही रूहानियत से लबरेज जलसे हो रहे हैं. वहां के पैगाम भी कौम के लिए खासे अहम हैं. 

गौरतलब है कि तीन दिवसीय कादियां सम्मेलन अथवा जलसे में 37 मुल्कों के लगभग 15,000 लोगों ने शिरकत की और ये अपने-अपने मुल्कों के प्रतिनिधि रहनुमाओं की अगुवाई में पंजाब के कादियां आए थे. इस मौके पर ब्रिटेन के लंदन में बड़ी तादाद में अहमदी मुसलमानों ने इकट्ठा होकर कादियां सम्मेलन की 'लाइव' कार्रवाई देखी.

जिक्रेखास है कि लाइव प्रसारण में महिलाओं और नौजवानों ने बड़ी तादाद में धार्मिक नज्में पढ़ीं. इतनी भारी तादाद में महिलाओं की शिरकत पहली बार देखी गई. यह अहमदिया समुदाय में एक सकारात्मक मोड़ है, जो प्ररोक्ष रूप से रिवायती मजहबी अवधारणा के मुताबिक औरतों के हकों को बुलंद एवं पुख्ता करता है.                               

सम्मेलन में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, बांग्लादेश, मॉरीशस, फिलिस्तीन, ग्रीस, नेपाल और भूटान से आए प्रतिनिधियों और श्रद्धालुओं ने शिरकत की. वहीं भारत के जम्मू, कश्मीर, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली और गुजरात सहित तमाम राज्यों से लोग बड़ी तादाद में कादियां सम्मेलन में पहुंचे. 

कादियां में बड़ी तादाद में अहमदिया मुसलमान रहते हैं. आए साल होने वाला उनका सम्मेलन राजनीति से कोसों दूर रहता है, फिर भी सरकारी तौर पर विशेष प्रशासनिक प्रबंध किए जाते हैं. मलेरकोटला की मानिंद कादियां भी अमन और सद्भाव की विशेष मिसाल है.

यह सरहदी जिला गुरदासपुर का एक सामान्य कस्बा है. स्थानीय परिवार सुदूर देशों में बसे अहमदिया मुसलमानों से अपने लड़के- लड़कियों के रिश्ते अथवा निकाह करते हैं. दूसरे देशों से दुल्हन बन कर आईं दुल्हनों को देखकर नहीं लगता कि उनका जन्म भारतीय पंजाब से अलहदा किसी और धरती पर हुआ था और अब वे यहां के समाज (तथा मुहावरे की भाषा में कहें तो) 'पंजाबी मिट्टी' का हिस्सा हैं!

कादियां में सिख-हिंदू-अहमदिया मुसलमान परिवार आपसी एकता के साथ रहते हैं और कभी भी यहां सांप्रदायिक अथवा सामुदायिक तनाव नहीं हुआ. यह भी कादियां की एक अति अहम खसूसियत है, जो जहर भरे इस सामाजिक माहौल में यकीनन एक अद्भुत मिसाल है!