ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर जब पूरा विश्व भगवान बुद्ध के जीवन, उनके उपदेशों और करुणा के संदेश को स्मरण करता है, तब भारत के लिए यह अवसर केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। इसी संदर्भ में “बौद्ध सर्किट” आज एक ऐसी अवधारणा के रूप में उभरकर सामने आया है, जो न केवल बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था से जुड़ा है बल्कि भारत की पर्यटन नीति और विदेशी मुद्रा अर्जन की रणनीति का भी अहम हिस्सा बन चुका है। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2014 में शुरू की गई स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत इस सर्किट का विकास किया गया, जिसका उद्देश्य देश में थीम-आधारित पर्यटन को बढ़ावा देना और विश्वस्तरीय सुविधाएं विकसित करना है।

बौद्ध सर्किट उन प्रमुख तीर्थ स्थलों का समूह है, जो भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े हुए हैं। यह सर्किट भारत और नेपाल के उन स्थानों को एक साथ जोड़ता है, जहां बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति, प्रथम उपदेश और महापरिनिर्वाण जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विश्व के आठ प्रमुख बौद्ध स्थलों में से सात भारत में स्थित हैं, इसके बावजूद भारत को वैश्विक बौद्ध तीर्थयात्रियों का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा प्राप्त होता है। यही कारण है कि सरकार इस सर्किट के विकास को प्राथमिकता दे रही है, ताकि अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय पर्यटक भारत की ओर आकर्षित हो सकें।
इस सर्किट में नेपाल के लुंबिनी और कपिलवस्तु के साथ भारत के श्रावस्ती, सारनाथ, कुशीनगर, राजगीर, वैशाली और बोधगया जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं। ये सभी स्थान न केवल ऐतिहासिक महत्व रखते हैं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र माने जाते हैं।

लुंबिनी, जो आज नेपाल में स्थित है, वह स्थान है जहां 563 ईसा पूर्व में महारानी माया ने सिद्धार्थ गौतम को जन्म दिया था और इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। कपिलवस्तु वह प्राचीन नगर है जहां सिद्धार्थ ने राजकुमार के रूप में अपना प्रारंभिक जीवन बिताया और यहीं से उन्होंने 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन त्याग कर ज्ञान की खोज शुरू की।
भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित श्रावस्ती वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के चौदह चातुर्मास बिताए और अनेक उपदेश दिए। वहीं सारनाथ वह पवित्र स्थल है जहां बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया, जिसे “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है। कुशीनगर वह स्थान है जहां बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया और इसे बौद्ध धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
बिहार का राजगीर वह स्थल है जहां पहली बौद्ध संगीति आयोजित हुई थी और जहां बुद्ध ने अपने जीवन के कई वर्ष बिताकर उपदेश दिए। वैशाली वह स्थान है जहां बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश दिया और बाद में दूसरी बौद्ध संगीति भी यहीं आयोजित हुई। बोधगया, जो इस सर्किट का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है, वह स्थान है जहां बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ और यहां स्थित महाबोधि मंदिर विश्व धरोहर स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

बौद्ध सर्किट का विकास स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत किया जा रहा है, जिसमें विभिन्न राज्यों में स्थित बौद्ध स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में सांची, मंदसौर, धार और सतना जैसे स्थानों पर बुनियादी ढांचे का विकास किया जा रहा है, जबकि गुजरात में जूनागढ़, गिर सोमनाथ और कच्छ क्षेत्र के बौद्ध गुफा स्थलों को पर्यटन के लिए विकसित किया जा रहा है। आंध्र प्रदेश के अमरावती, बोज्जनकोंडा और सालिहुंडम जैसे स्थल भी इस योजना का हिस्सा हैं।
बिहार में बोधगया को एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए कन्वेंशन सेंटर बनाया गया है, वहीं उत्तर प्रदेश में वाराणसी, कुशीनगर और श्रावस्ती के बीच बेहतर सड़क और अन्य सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। इन सभी प्रयासों का उद्देश्य पर्यटकों को विश्वस्तरीय अनुभव प्रदान करना है।
सरकार ने केवल बौद्ध सर्किट ही नहीं, बल्कि कोस्टल, डेजर्ट, इको, हेरिटेज, हिमालयन, नॉर्थ-ईस्ट, रामायण, कृष्ण, सूफी, ग्रामीण और वन्यजीव जैसे कई अन्य पर्यटन सर्किट भी विकसित किए हैं। इन सभी का उद्देश्य भारत की विविध सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना है।

बौद्ध सर्किट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण साधन बनकर उभर रहा है। वर्ष 2017 के आंकड़ों के अनुसार, इस सर्किट से जुड़े 11 प्रमुख स्थलों का योगदान देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों का लगभग 6.46 प्रतिशत था। सरकार द्वारा थाईलैंड, जापान, श्रीलंका, वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे बौद्ध बहुल देशों में विशेष प्रचार अभियान चलाए जा रहे हैं, जिससे उच्च खर्च करने वाले पर्यटक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, बेहतर कनेक्टिविटी और महापरिनिर्वाण एक्सप्रेस जैसी विशेष ट्रेनों की शुरुआत से पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो रही है। साथ ही, इंटरनेशनल बौद्ध कॉन्क्लेव जैसे आयोजनों के माध्यम से भारत की बौद्ध विरासत को वैश्विक स्तर पर प्रचारित किया जा रहा है। गाइडों को जापानी, थाई और मंदारिन जैसी भाषाओं में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे विदेशी पर्यटकों को बेहतर अनुभव मिल सके।

केंद्र सरकार ने 2026-27 के बजट में बौद्ध सर्किट को और विस्तारित करने के लिए पूर्वोत्तर भारत पर विशेष ध्यान दिया है। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में नए पर्यटन बुनियादी ढांचे के विकास की योजना बनाई गई है। इन क्षेत्रों में मठों के संरक्षण, बेहतर सड़क और हवाई कनेक्टिविटी तथा इंटरप्रिटेशन सेंटर के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।
मेकांग-गंगा सहयोग कार्यक्रम के तहत इन क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया जा रहा है, जिससे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के पर्यटक बड़ी संख्या में यहां आ सकें। यह पहल न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगी बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न करेगी।

भारत में भगवान बुद्ध से जुड़े कई महत्वपूर्ण संग्रहालय और स्मारक मौजूद हैं, जो इस सर्किट का अभिन्न हिस्सा हैं। नई दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय, सारनाथ का पुरातत्व संग्रहालय, बोधगया और नालंदा के संग्रहालय बौद्ध इतिहास और कला का समृद्ध भंडार प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा सांची स्तूप, अजंता गुफाएं, तवांग मठ, रुमटेक मठ और हेमिस मठ जैसे स्थल भारत की बौद्ध विरासत को और अधिक समृद्ध बनाते हैं।
बुद्ध पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर यह स्पष्ट हो जाता है कि बौद्ध सर्किट केवल एक धार्मिक यात्रा मार्ग नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत, पर्यटन विकास और आर्थिक प्रगति का एक मजबूत आधार है। यदि सरकार और संबंधित संस्थाएं इस दिशा में निरंतर प्रयास करती रहें, तो आने वाले समय में भारत वैश्विक बौद्ध पर्यटन का केंद्र बन सकता है। इससे न केवल देश की विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि होगी, बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे और भारत की आध्यात्मिक पहचान को विश्व स्तर पर नई ऊंचाइयां मिलेंगी।