निकाह के बाद दोबारा कानूनी शादी करने वाले शुक्कुर बोले, ‘अपनी बेटियों के गरिमापूर्ण जीवन के लिए ऐसा किया’

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] • 9 Months ago
शुक्कुर परिवार-सुखी परिवार
शुक्कुर परिवार-सुखी परिवार

 

आशा खोसा / नई दिल्ली

मौलवी की मौजूदगी में निकाहनामे पर पवित्र आयतों के बीच निकाह कराया जाता है, लेकिन एडवोकेट सी शुक्कुर और उनकी पत्नी डॉ शीना शुक्कुर को मजिस्ट्रेट के सामने दोबारा शादी करनी पड़ी.

8 मार्च (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस), विशेष रूप से प्रतीकवाद के लिए इस तिथि को चुना गया. कासरगोड निवासी वकील और अभिनेता सी शुक्कुर और डॉ. शीना शुक्कुर ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत सब रजिस्ट्रार के कार्यालय में अपनी शादी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए.

इस्लामी परंपराओं के अनुसार निकाह करने के 29 साल बाद, शुक्कुर दंपति ने अपने पुनर्विवाह का आयोजन किया, ताकि वह अपनी तीन सयानी हो चुकी बेटियों को भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत विरासत अधिकार दिलवा सकें.

सी शुक्कुर 


इधर, उनके इस कानूनी पुनर्विवाह के बाद 8 मार्च को कुछ कट्टरवादी भड़क रहे थे, उधर शुक्कुर परिवार और दोस्तों से घिरे हुए थे. केरल के कुन्नूर विश्वविद्यालय के विधि संकाय की प्रमुख डॉ शीना शुक्कुर ने बताया, ‘‘हमने कानून विभाग से हमारे छात्रों द्वारा लाया गया शादी का केक काटा. जब वे हमें बधाई देने के लिए घर आए, तो मैंने उन्हें बिरयानी भी परोसी.’’

शुक्कुर और उनकी पत्नी के इस साहसिक कदम को उठाने के पीछे, अपनी तीन बेटियों - जैस्मीन, जेबिन और जेजाह के अधिकारों को सुरक्षित करने की उनकी मंशा थी. ताकि वे उन संपत्तियों को प्राप्त कर सकें, तो जो वे अपने मरने के बाद अपने पीछे छोड़ जाएंगे.

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लाडो त्रय, जिन्हें कानूनी हक दिलाने के लिए शुक्कुर दंपति को करनी पड़ी दोबारा कानूनी शादी  


 शुक्कुर कहते हैं, ‘‘मैं बहादुर आदमी नहीं हूं, मैंने यह सब अपनी बेटियों और इस तरह सभी बेटियों (मुस्लिम महिलाओं) को एक गरिमापूर्ण जीवन देने के लिए किया, जिन्हें पर्सनल लॉ के प्रावधानों के तहत उनका हक नहीं मिलेगा.’’

उनका कहना है कि भारत के संविधान के तहत ‘अपनी बेटियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने का उनका यह कार्य’ उस मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ है, जो उनकी संपत्ति का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा उनकी बेटियों को और बाकी उनके दो भाइयों और पिता (पुरुष उत्तराधिकारियों) को देता. उनकी मृत्यु - उन सभी मुस्लिम महिलाओं के लिए एक श्रद्धांजलि होगी, जो पर्सनल लॉ के प्रावधानों के तहत पीड़ित हैं.

हैरत के कारण शुक्कुर के दोस्तों ने उनसे मुलाकात की. उन्होंने उन्हें बताया कि उन्होंने अपनी बेटियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए, वकील होने के नाते, इसी तरह की और शादियां भी करवाई थीं, लेकिन समुदाय में कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया के डर से इन शादियों को गुप्त रखा.

डॉ. शीना ने आवाज-द वॉयस को केरल से फोन पर बताया, ‘‘एसएमए के तहत हमारी शादी के कागजात पर हस्ताक्षर करने के बाद, कई लोगों ने दावा किया कि उन्होंने भी ऐसा ही किया है, ताकि उनकी बेटियों को उनकी संपत्तियों में बराबर का हिस्सा मिले.’’

डॉ. शीना का कहना है कि वह आजकल मुस्लिम समुदाय की उन महिलाओं से घिरी हुई हैं, जो अपने या अपनी बेटियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के बारे में कानूनी परामर्श लेना चाहती हैं.

शुक्कुर एक विशिष्ट ‘मल्लपुरम मोम्पला’ परिवार से आते हैं. वे कहते हैं कि उनका पालन-पोषण उनके माता-पिता ने किया, जो धर्मनिष्ठ मुसलमान थे. मैं पहली पीढ़ी का पेशेवर हूं. मेरे पिता एक कृषक और एक व्यापारी थे और उनके पास जमीन-जायदाद थी. हालांकि, हमारे घर में पिता ने यह सुनिश्चित किया था कि न केवल मेरी मां का पूरा अधिकार मिले, बल्कि हर चीज पर उनकी राय भी ली जाए.

शुक्कुर का कहना है कि उन्होंने एक नियमित स्कूल के साथ-साथ धार्मिक शिक्षा के लिए मदरसा में पढ़ाई की थी. उन्होंने कहा, ‘‘बहुत सोचने के बाद, जब मैंने और मेरी पत्नी ने एसएमए के तहत अपनी शादी को पंजीकृत करने का फैसला किया, तो मैं अपने पिता की राय लेना चाहता था.’’

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वह अपने 82 वर्षीय पिता की प्रतिक्रिया से इतने अनिश्चित थे कि उन्होंने अपनी बेटी से कहा कि वह अपने उप्पुपा (दादाजी) से बात करे. शुक्कुर की मां के मरने के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली.

उनके मन की बात जानने के बाद शुक्कुर ने भी उनसे बात की. शुक्कुर बताते हैं, ‘‘वह बहुत खुश थे और उन्होंने मुझे हरी झंडी दे दी.’’

शुक्कर का कहना है कि छोटे भाई मुनीर की पत्नी शकीरा दुबई से उनकी दूसरी शादी में शामिल होने के लिए आई, यह देखकर वे बहुत खुश हुए.

मुनीर और शकीरा के चार बेटे हैं. शकीरा इस शादी की गवाहों में से एक थी और इस कार्यक्रम के बारे में बीबीसी द्वारा उनका साक्षात्कार लिया गया था.

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शुक्कुर की तीन बेटियां हैं. पहली जैस्मीन दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में काम करती हैं, दूसरी जेबिन चेन्नई में पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं और तीसरी जजाह दसवीं कक्षा की छात्रा है.

शीना और शुक्कुर केरल के कालीकट विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के दौरान मिले थे. शीना को बाद में फुलब्राइट वेंडरबिल्ट फेलो के रूप में चुना गया और वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी लॉ स्कूल, नैशविले, टेनेसी, यूएसए से उन्होंने पीएचडी की.

शुक्कुर बताते हैं, ‘‘हम पवित्र मुसलमान हैं. मेरी पत्नी शीना को हमारी संस्कृति का गहरा ज्ञान है. वह मोपला मटारे (मोपला समुदाय का लोक गीत) की प्रतिपादक हैं. मोपला रामायण पर उनकी बात, मोपला (केरल मुसलमानों) की एक परंपरा यूट्यूब पर है और आप देख सकते हैं कि कितने लोगों ने इसे देखा है.’’

शुक्कुर कहते हैं कि एक वकील के रूप में पंजीकरण करवाने के बाद उन्हें मुस्लिम समुदाय की वास्तविकता का पता चला, विशेष रूप से महिलाओं को वैवाहिक जीवन में क्या सामना करना पड़ाता है. वे पीड़ित थीं. उन्होंने कहा, ‘‘मैंने देखा है कि मुस्लिम महिलाएं कैसे पीड़ित होती हैं.’’ हालांकि, उनका कहना है कि बहुविवाह प्रथा 15 साल पहले तक प्रचलित थी और अब इसमें भारी कमी आई है.

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शुक्कुर कहते हैं, “मेरी बेटियों के प्रभाव के कारण मेरी राय और रवैया बदल गया. जैसे-जैसे वे बड़ी हो रही हैं, उन्होंने मुझसे मौजूदा परंपराओं, रीति-रिवाजों और पितृसत्तात्मक मानसिकता के बारे में सवाल पूछे.”

उन्होंने बताया, ‘‘मुझे बदलने के लिए मजबूर किया गया.’’

उन्होंने कहा कि ‘‘वे अपनी बेटियों, जो अल्लाह का आशीर्वाद हैं, के बारे में यह सुनिश्चित करने के लिए पुनर्विवाह की ओर गए, ताकि भारत के सभी नागरिक समान अधिकार प्राप्त करें - पुरुष, महिला, हिंदू, ईसाई या यहां तक कि एक नास्तिक भी - भारत के संविधान के तहत हकदार हैं.’’

मलयालम फिल्म ‘‘नना थान केस कोडू’’ में एक वकील की भूमिका निभाने के लिए शुक्कुर केरल में एक लोकप्रिय अभिनेता भी बने.

उनका कहना है कि उन्होंने अपनी बेटियों को पूरे अधिकार के साथ पाला है और उनका मानना है कि उन्हें मौके मिलने चाहिए. हमने अपनी बेटियों की परवरिश इस तरह से की है कि उन्हें हर चीज के बारे में बोलने का पूरा अधिकार है, चाहे वह लंच या डिनर के लिए क्या बनाया जाए, परिवार के लिए कोई वाहन खरीदना हो, प्रॉपर्टी खरीदना हो या फिर मेरे पहनने के वस्त्र हों.

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वो कहते हैं, “मेरी माँ को हमारे परिवार में सभी अधिकार प्राप्त थे, मेरे पिता ने उन पर और उनकी राय पर अधिक ध्यान दिया, मैं उनका ही अनुसरण कर रहा हूं और ऐसा ही करने के लिए बाध्य हूं.’’

अपेक्षित रूप से, इन शुक्करों को पुनर्विवाह के बाद रूढ़िवादी लॉबी के गुस्से का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया, “किसी ने कहा कि मुझे बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए, सामाजिक रूप से बहिष्कार कर देना चाहिए, दूसरों ने कहा कि मैंने इस्लाम का उल्लंघन किया है, जबकि एक मौलवी ने मुझे मस्जिद में प्रवेश करने से रोकने के लिए फोन किया था.”

शुक्कुर अप्रभावित रहे. उन्होंने कहा, ‘‘अगले दिन, जैसा कि रमजान का महीना चल रहा था और मैं उपवास कर रहा था, मैं सुबह की नमाज के लिए मस्जिद जाने वाला पहला व्यक्ति था और किसी ने मुझसे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं की.’’

किसी ने मुसलमानों को एक वकील के रूप में मेरी सेवाओं का उपयोग करने का आह्वान भी किया. ’’मुस्लिम समुदाय ने इन आवाजों को नहीं सुना, उन्होंने उनकी उपेक्षा की.’’

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उनका कहना है कि मैरी रॉय (लेखिका अरुंधति रॉय की मां) के प्रसिद्ध मामले के बाद केरल में महिलाओं के अधिकारों के बारे में बहुत जागरूकता आई है, ईसाई महिलाओं के विरासत में संपत्ति के अधिकार के लिए एक मामला जीतने के कारण ईसाई पर्सनल लॉ में बदलाव आया.

उनका कहना है कि समाज बदल गया है. मुस्लिम महिलाएं मुखर हैं और वे अपने वैवाहिक जीवन में अन्याय सहने को तैयार नहीं हैं.

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उनका कहना है कि उनके पुनर्विवाह के बाद, कई लोग अपनी बेटियों, बहनों, या अन्य महिलाओं को विरासत का अधिकार दिलाने में सहायता लेने के लिए उनके कार्यालय आए.

उनका कहना है कि इस्लाम में बहुविवाह की अनुमति है, जिसने कई महिलाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ किया है. अनदेखी, पत्नी भरण-पोषण पाने और अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए दर-दर भटकती रहती हैं, विधवाएं अपने पति की संपत्ति में सिर्फ एक-आठवें हिस्से की हकदार हैं, उन्हें अंततः अपना घर छोड़ने और खुद के भरण-पोषण लिए मजबूर होना पड़ता है.

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शुक्कुर परिवार

उन्होंने कहा कि अपने अनुभव और इस तरह के अन्याय के संपर्क में आने के कारण, उन्होंने प्रोजेक्ट लाइफ मिशन के तहत गरीब लोगों को घरों के आवंटन के नियमों को बदलने के लिए केरल सरकार को प्रस्ताव दिया था. उन्होंने कहा, ‘‘मैंने केरल के स्थानीय निकाय मंत्री एमबी राजेश से संपर्क किया और उन्होंने मुझसे वादा किया कि अब से घर की महिला के पक्ष में नियम बदल दिए जाएं.’’

उन्होंने कहा कि केरल में राजनीतिक दल बिना धर्म का जिक्र किए महिलाओं के अधिकारों के लिए तेजी से बोल रहे हैं.

हालांकि शुक्कुर महिलाओं के खिलाफ पर्सनल लॉ के भेदभावों के समाधान के तौर पर ‘समान नागरिक संहिता’ का समर्थन नहीं करते हैं, क्योंकि ‘‘भारत एक कानून द्वारा शासित होने के लिए, बहुत विविध और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भूमि है.’’

उन्होंने कहा कि लोगों को भारत के संविधान के तहत उनके अधिकार मिलने चाहिए, जबकि वे सभी मामलों में अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं.