From Bihar to the World Stage: शम्स आलम की असाधारण और अविश्वसनीय यात्रा

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 10-01-2026
From Bihar to the World Stage: The extraordinary and incredible journey of Shams Alam
From Bihar to the World Stage: The extraordinary and incredible journey of Shams Alam

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

 
बिहार के मधुबनी जिले के बिस्फी प्रखंड के छोटे से गांव राठोस से निकलकर विश्व मंच तक अपनी पहचान बनाने वाले मोहम्मद शम्स आलम शेख आज भारत के सबसे प्रेरणादायक पैरा एथलीटों में गिने जाते हैं। उनकी ज़िंदगी संघर्ष, अनुशासन और कभी न हार मानने वाले जज़्बे की ऐसी मिसाल है, जो यह साबित करती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, इंसान की इच्छाशक्ति उससे कहीं बड़ी होती है।
 
शम्स आलम का जन्म एक ऐसे गांव में हुआ, जहां शिक्षा के साधन सीमित थे, बुनियादी ढांचा लगभग न के बराबर था और सपने देखने की गुंजाइश बहुत कम। बचपन तालाब में तैरते हुए, गांव की रेत पर कबड्डी खेलते हुए और कभी स्कूल की वर्दी पहनने का सपना देखते हुए बीता। बेहतर शिक्षा की तलाश उन्हें मुंबई ले आई, जहां उन्होंने बेहद कम उम्र में अकेले रहना, खाना बनाना, पढ़ाई करना और जीवन संभालना सीख लिया। जिस उम्र में बच्चे अक्षर पहचानते हैं, उस उम्र में शम्स ज़िंदगी की जंग लड़ रहे थे।
 
खेल धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया। मेहनत और अनुशासन के बल पर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के कराटे खिलाड़ी के रूप में खुद को स्थापित किया। साल 2010 में वह एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के बिल्कुल करीब थे। लेकिन तभी जीवन ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने सब कुछ बदल दिया। रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर और उसके बाद हुई एक गलत सर्जरी ने उन्हें हमेशा के लिए पैरालाइज्ड कर दिया। चलने की क्षमता चली गई और वर्षों से पाला गया सपना टूटता हुआ नजर आया। इस दौर में कई अपने भी दूर हो गए। रातें आंसुओं में बीतने लगीं। उनका आत्मविश्वास शरीर की वजह से नहीं, बल्कि समाज की बेरहम सोच की वजह से टूटने लगा।
 

लेकिन एक सच्चे खिलाड़ी के भीतर की आग कभी बुझती नहीं।
 
मुंबई के पैराप्लेजिक फाउंडेशन में इलाज और पुनर्वास के दौरान शम्स को यह एहसास हुआ कि तैराकी सिर्फ थेरेपी नहीं, बल्कि उनके जीवन की नई दिशा बन सकती है। बचपन में गांव के जिस तालाब में वह कभी गिर जाया करते थे, वही तालाब अनजाने में उन्हें भविष्य के लिए तैयार कर रहा था। उन्होंने तैराकी को पूरी गंभीरता से अपनाया, अपने शरीर और मन को दोबारा गढ़ा और पैरा स्विमिंग की दुनिया में कदम रखा।
 
इसके बाद शम्स आलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं से लेकर राष्ट्रीय चैंपियनशिप और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक उन्होंने लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। जर्मनी, कनाडा, पोलैंड, पुर्तगाल और आइसलैंड जैसे देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने न सिर्फ पदक जीते, बल्कि पैरा स्विमिंग में भारत की पहचान को और मजबूत किया। 2018 में जकार्ता में हुए एशियन पैरा गेम्स में 43 देशों के खिलाड़ियों के बीच चौथा स्थान हासिल करना उनके करियर की बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा।
 
साल 2022 में पुर्तगाल में हुए वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में उन्होंने विश्व स्तर पर टॉप-10 में जगह बनाई। आइसलैंड में 2024 और 2025 में उन्होंने कुल 12 पदक जीते, जिनमें स्वर्ण पदक और 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में नया एशियन रिकॉर्ड भी शामिल है।
 
शम्स आलम केवल स्विमिंग पूल तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने ओपन वाटर स्विमिंग में भी इतिहास रचा। मुंबई में सनक रॉक से गेटवे ऑफ इंडिया तक 6 किलोमीटर की दूरी 1 घंटे 40 मिनट 28 सेकंड में पूरी कर उन्होंने लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और वर्ल्ड रिकॉर्ड अकादमी, कैलिफोर्निया में अपना नाम दर्ज कराया। इसके बाद गोवा में 8 किलोमीटर की समुद्री तैराकी, जिसमें 5 किलोमीटर ज्वार के विपरीत तैरना शामिल था, पूरी कर उन्होंने समुद्र तटों की सुगमता को लेकर जागरूकता फैलाई। 2024 में पटना में 13 किलोमीटर की गंगा ओपन वाटर स्विम 2 घंटे 13 मिनट में पूरी कर उन्होंने पैरा एथलीट द्वारा की गई सबसे लंबी ओपन वाटर तैराकी का विश्व रिकॉर्ड बनाया।
 
उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ दिव्यांग खिलाड़ी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे स्वयं राष्ट्रपति ने प्रदान किया। वह बिहार से यह सम्मान पाने वाले पहले पैरा एथलीट हैं।
 
लेकिन शम्स आलम की पहचान सिर्फ पदकों और रिकॉर्ड्स तक सीमित नहीं है। उनका एक स्पष्ट मिशन है—भारत को अधिक सुलभ बनाना, ताकि दिव्यांगजन बिना रुकावट यात्रा कर सकें, सीख सकें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें। उनका मानना है कि ताकत शरीर से नहीं, इरादों से आती है।
 
उनकी इसी असाधारण यात्रा पर आधारित एक प्रेरणादायक डॉक्यूमेंट्री भी हाल ही में सामने आई है, जो उनके बचपन, संघर्ष, मेडिकल ट्रॉमा, खेल में वापसी, अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों और सामाजिक संदेश को गहराई से दर्शाती है। यह वीडियो शम्स आलम की कहानी को न सिर्फ दिखाता है, बल्कि महसूस कराता है कि डर डूब जाए, तो इंसान तैरना सीख ही लेता है।
 
मधुबनी के एक छोटे से तालाब से लेकर दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक का यह सफर हमें यही सिखाता है कि हमारी सीमाएं हमारे शरीर में नहीं, हमारे डर में होती हैं। और जब डर हार जाता है, तो इंसान इतिहास रच देता है।