डॉ. मेनका गुरुस्वामी: भारतीय संसद में LGBTQIA+ समुदाय की पहली प्रतिनिधि

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 08-04-2026
Dr. Menaka Guruswamy: The First Representative of the LGBTQIA+ Community in the Indian Parliament
Dr. Menaka Guruswamy: The First Representative of the LGBTQIA+ Community in the Indian Parliament

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

6 मार्च 2026 भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक दिन बन गया जब डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली। मेनका ने भारतीय संसद में LGBTQIA+ समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रतीक बनते हुए, संसद में पहला कदम बढ़ाया। तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया था और वह निर्विरोध चुनी गईं। यह दिन न केवल उनके व्यक्तिगत सफर का एक बड़ा पड़ाव था, बल्कि भारतीय राजनीति और समाज में समावेशिता और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी साबित हुआ।

एक अद्भुत कैरियर की शुरुआत

डॉ. मेनका गुरुस्वामी का जन्म 27 नवंबर 1974 को हुआ था। उनके पिता मोहन गुरुस्वामी भारतीय राजनीति के जाने-माने व्यक्ति रहे हैं, जो वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के विशेष सलाहकार रह चुके थे। मेनका की मां मीरा गुरुस्वामी भी एक प्रसिद्ध व्यक्तित्व हैं। मेनका का शिक्षा जीवन बहुत ही प्रेरणादायक रहा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद पब्लिक स्कूल और दिल्ली के सरदार पटेल स्कूल से हुई थी। इसके बाद, उन्होंने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से B.A. LLB की डिग्री प्राप्त की। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से BCL और हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM करने के बाद, मेनका ने कानूनी दुनिया में अपने कदम जमाए।

धारा 377 के खिलाफ संघर्ष

डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने कानून के क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई है। उनका सबसे चर्चित योगदान धारा 377 को समाप्त कराने की दिशा में रहा है। यह धारा समलैंगिक संबंधों को अपराध मानती थी। साल 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलट दिया। मेनका और उनकी पार्टनर अरुंधति काटजू ने इस फैसले को चुनौती दी। उनकी कड़ी मेहनत और संघर्ष के बाद, साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इस फैसले ने न केवल समलैंगिक अधिकारों को मान्यता दी, बल्कि भारत में LGBTQIA+ समुदाय के लिए एक नए युग की शुरुआत की।

इस ऐतिहासिक जीत के बाद, मेनका और अरुंधति को टाइम मैगज़ीन द्वारा 2019 में दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया गया था। यह उनकी मेहनत और संघर्ष का प्रमाण था, जो उन्होंने समलैंगिक अधिकारों के लिए दिया था।

कानूनी दुनिया में अनगिनत मुक़दमे

डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने कई महत्वपूर्ण और चर्चित मुकदमों में पैरवी की है। सलवा जुडूम के खिलाफ उनका संघर्ष भी बहुत ही चर्चित रहा। इस कानून के तहत, छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (SPOs) के रूप में भर्ती करती थी। मेनका ने इसे रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपनी आवाज उठाई और इसमें महत्वपूर्ण सफलता हासिल की। इसके अलावा, मणिपुर में सेना और सुरक्षा बलों से जुड़ी मामलों में भी मेनका को 'एमिकस क्यूरी' (पीठ का सलाहकार) नियुक्त किया गया।

‘राइट टू एजुकेशन’ और सरकारी नौकरशाही से जुड़े केस

मेनका गुरुस्वामी ने 'राइट टू एजुकेशन' से जुड़े केस में भी अहम भूमिका निभाई। इस कानून के तहत, निजी स्कूलों में गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया था। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा था कि सरकारी नौकरशाह जनप्रतिनिधियों के मौखिक आदेशों का पालन नहीं कर सकते, उन्हें केवल लिखित आदेशों को मान्य मानना चाहिए। इस निर्णय को मेनका ने मजबूती से प्रस्तुत किया।

महत्वपूर्ण राजनीतिक और कानूनी मामलों में भूमिका

मेनका गुरुस्वामी ने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और कानूनी मामलों में भी अपनी भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, उन्होंने अगस्त 2023 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की थी। तमिलनाडु में RSS के रूट मार्च के खिलाफ दायर राज्य सरकार की याचिका के खिलाफ उन्होंने दिवंगत वकील राम जेठमलानी के साथ मिलकर RSS का पक्ष रखा था।

एक समाजिक कार्यकर्ता और प्रभावशाली वकील

डॉ. मेनका गुरुस्वामी न केवल एक प्रभावशाली वकील हैं, बल्कि एक समाजिक कार्यकर्ता भी हैं। उनके द्वारा किए गए कार्यों ने समाज में न्याय, समानता और विविधता को बढ़ावा दिया है। LGBTQIA+ अधिकारों के लिए उनके संघर्ष ने उन्हें न केवल कानूनी दुनिया में, बल्कि समाज के हर वर्ग में सम्मान दिलाया है। राज्यसभा में उनका चयन इस बात का प्रतीक है कि भारतीय समाज में विविधता का सम्मान बढ़ रहा है और लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत हो रही हैं।

menka guruswami

मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर अरुंधति काटजू भी वकील हैं

 

आगे का रास्ता

मेनका गुरुस्वामी का राजनीतिक और कानूनी सफर अभी जारी है। राज्यसभा में उनका प्रवेश भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नई दिशा की ओर इशारा करता है। यह भारत के समाज में विविधता और समानता की दिशा में एक और कदम है। उनके अनुभव और ज्ञान से भारतीय संसद को और अधिक समृद्धि मिल सकती है। आने वाले समय में उनके योगदान से भारत में समाजिक न्याय और समावेशिता को और बल मिलेगा।

 

डॉ. मेनका गुरुस्वामी न केवल एक कानूनी विशेषज्ञ हैं, बल्कि वह समावेशिता, समानता और विविधता के प्रतीक भी हैं। उनकी कहानी संघर्ष, मेहनत और समर्पण की है। वह न केवल LGBTQIA+ समुदाय के लिए, बल्कि हर नागरिक के लिए न्याय की मिसाल पेश करती हैं। उनके संघर्ष और उपलब्धियों से प्रेरित होकर, भारतीय समाज में बदलाव की एक नई लहर आ सकती है। 6 मार्च 2026 को जब उन्होंने राज्यसभा में शपथ ली, तो यह एक ऐतिहासिक पल था, जो भारत के लोकतंत्र में समावेशिता के नए अध्याय की शुरुआत है।