मोहम्मद अकरम
भारतीय राजनीति के फलक पर ऐसी कम ही शख्सियतें हैं जिन्होंने न केवल सत्ता के गलियारों में अपनी धमक बनाए रखी, बल्कि सादगी और शुचिता की मिसाल भी पेश की। पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई उन्हीं चुनिंदा नामों में से एक हैं। आजादी के बाद से अब तक भारतीय संसद में केवल 20 मुस्लिम महिलाएं ही सदस्य बनी हैं, और मोहसिना किदवई का लगातार तीन बार निर्वाचित होना उनकी असाधारण स्वीकार्यता को दर्शाता है।
अगस्त 2022 में दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में उनकी आत्मकथा ‘हिन्दुस्तानी सियासत और मेरी जिंदगी रशीद किदवई की जुबानी’ के उर्दू संस्करण का विमोचन हुआ था, जो उनके 90 साल के सफर और 1960 से 2016 तक कांग्रेस के उतार-चढ़ाव की एक जीवंत दास्तां है।
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आजमगढ़ की वह जीत, जिसने बदला इतिहास
किताब के विमोचन के अवसर पर वरिष्ठ विद्वान प्रो. अख्तरुल वासे ने एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि गांधी परिवार ने जो नहीं किया, वह मोहसिना किदवई ने कर दिखाया। साल 1977 में जब पूरा देश कांग्रेस विरोधी लहर में डूबा था और जनता ने पार्टी को पूरी तरह नकार दिया था, उस दौर में मोहसिना किदवई ने आजमगढ़ उपचुनाव जीतकर न केवल इंदिरा गांधी की वापसी की राह आसान की, बल्कि दुनिया को यह भी दिखाया कि एक मुस्लिम महिला समाज और राजनीति का नेतृत्व कैसे कर सकती है। यह किताब दिल्ली की सत्ता से लेकर आजमगढ़ के मैदानों और डुमरियागंज की गलियों तक की राजनीतिक उठापटक को समेटे हुए है।
घरेलू दहलीज से संसद की दहलीज तक
विमोचन कार्यक्रम में खुद मोहसिना किदवई मौजूद थीं और उन्होंने अपने राजनीतिक सफर के शुरुआती दिनों को याद किया था। 90 वर्ष की आयु में भी उनकी स्मृतियां उतनी ही ताजा थीं। उन्होंने बताया कि जब वह ब्याह कर अपने ससुराल गईं, तो वहां राजनीति 'ओढ़ना-बिछौना' थी। उन्होंने महसूस किया कि एक राजनेता और एक सामाजिक कार्यकर्ता का उद्देश्य एक ही होता है लोगों के दुख-दर्द को समझना। उन्होंने कहा, "मैं लोगों के दर्द को देखकर घर से बाहर निकली और इस तरह राजनीति में कदम रखा। मजे की बात यह है कि जब कांग्रेस के लिए बुरा समय था, वही मेरे लिए राजनीति सीखने का सबसे अच्छा वक्त साबित हुआ।"
इंदिरा गांधी: सख्त छवि के पीछे का नरम दिल
मोहसिना किदवई ने अपनी किताब के जरिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उस छवि को भी साफ करने की कोशिश की है, जो आज के दौर में अक्सर 'कठोर' या 'तानाशाह' के रूप में पेश की जाती है। मोहसिना जी के अनुसार, इंदिरा गांधी वास्तव में एक बेहद नरम दिल और इंसानियत से लबरेज महिला थीं। उन्होंने एक दिलचस्प वाकये का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार आजमगढ़ के दौरे पर इंदिरा जी ने खाना खाने से पहले खुद प्लेट अपने हाथ में ली और गाड़ी के ड्राइवर के पास जाकर कहा कि 'आप लोग भी पहले खाना खा लीजिए'। यह उनके व्यक्तित्व का वह पहलू था जो उन्हें आम लोगों से जोड़ता था।
सादगी और संगीत का संगम
प्रो. सिद्दीकुर रहमान किदवई, जिन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता की थीं, उन्होंने मोहसिना जी को 'आपा' कहकर संबोधित करते हुए उनके निजी जीवन के अनछुए पहलुओं को सामने रखा। उन्होंने बताया कि मोहसिना आपा अपनी निजी जिंदगी में एक मुकम्मल घरेलू महिला हैं। बचपन को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वह छोटी उम्र में बहुत सुरीले गीत गाया करती थीं। यह उनकी शख्सियत का वह कोमल पक्ष है जो शायद ही दुनिया जानती हो। अलीगढ़ से आए प्रो. शाफे किदवई ने किताब पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अक्सर यह माना जाता है कि राजनीति अच्छे लोगों के लिए नहीं है, लेकिन मोहसिना किदवई इस धारणा को गलत साबित करने वाली एक जिंदा मिसाल हैं।

आधुनिक दौर में किदवई की प्रासंगिकता
प्रसिद्ध पत्रकार रशीद किदवई द्वारा लिखित और एएमयू के प्रो. शफीक किदवई की निगरानी में अनुवादित यह किताब केवल एक बायोग्राफी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के आधे दशक का दस्तावेज है। कार्यक्रम का संचालन मासूम मुरादाबादी ने किया, जहां वक्ताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि आज के दौर में जब राजनीति में ध्रुवीकरण और भाषा की मर्यादा का संकट है, तब मोहसिना किदवई जैसी संतुलित और गंभीर शख्सियतों की समाज को सख्त जरूरत है।
यह किताब हमें याद दिलाती है कि एक महिला के लिए घर से निकलना, समाज के तानों को सहना और फिर देश की नीति निर्माण का हिस्सा बनना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा। मोहसिना किदवई की जिंदगी का यह सफर आने वाली पीढ़ी की महिला राजनेताओं के लिए एक गाइडिंग लाइट (पथ प्रदर्शक) की तरह है।