आवाज़ द वायस / मुंबई
मुंबई के मशहूर बिज़नेसमैन और रियल एस्टेट डेवलपर परवेज़ सुलेमान लकड़ावाला के नाम एक बड़ी कामयाबी दर्ज हुई है। रियल एस्टेट और ख़ास तौर पर झुग्गी पुनर्वास (SRA) के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से किए गए उनके शानदार काम के लिए उन्हें ब्रिटिश संसद में मानद डॉक्टरेट से नवाज़ा गया है। लंदन के 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स' में आयोजित 'सोरबोन इंटरनेशनल कन्वेंशन' के दौरान उन्हें यह सम्मान दिया गया।इस वैश्विक सम्मान के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं कि मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे ऐसा कोई सम्मान मिलेगा। यह सब मेरे मां-बाप की दुआओं और परिवार-दोस्तों के सहयोग से मुमकिन हो पाया है।
दुनिया ने माना काम का लोहा
यह सम्मान परवेज़ लकड़ावाला को फ्रेंच उच्च शिक्षण संस्थान 'इकोल सुपीरियर रॉबर्ट डी सोरबोन' की ओर से दिया गया। यह संस्था पेशेवर तजुर्बे के आधार पर डिग्री देने के लिए दुनिया भर में मशहूर है। मानद उपाधि स्वीकार करने के बाद अपनी भावनाएं ज़ाहिर करते हुए लकड़ावाला ने कहा कि यह मेरे एसआरए योजनाओं के ज़रिए किए गए झुग्गी पुनर्वास के काम को मिली वैश्विक कामयाबी है। मैं इस पेशे में 30 सालों से हूं और अब तक 32 इमारतों का निर्माण पूरा कर चुका हूं।
झुग्गी में बीता बचपन और संघर्ष के दिन
परवेज़ लकड़ावाला का जन्म बेहद ग़रीबी में हुआ। बांद्रा की एक छोटी सी झोपड़ी में उनका बचपन बीता। उस ज़माने में झुग्गी में साफ़ पानी और बुनियादी सुविधाओं के लिए भी भटकना पड़ता था। परवेज़ बताते हैं कि उनके घर के बाहर गंदगी का अंबार था और घर की हालत भी बहुत ख़राब थी। ऐसे हालात में रहने वाले बच्चों के लिए बड़ा सपना देखना भी गुनाह माना जाता था। लेकिन परवेज़ ने कभी अपनी ग़रीबी को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया। बल्कि, इन्ही हालात ने उन्हें संघर्ष का सबक़ सिखाया।
पढ़ाई की ज़िद और वकालत की डिग्री
ग़रीबी की वजह से पढ़ाई छूटने का डर था, फिर भी परवेज़ ने शिक्षा का दामन नहीं छोड़ा। झोपड़ी में रहकर पढ़ाई करना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई ज़िद के साथ पूरी की। बहुत से लोगों को यह मालूम नहीं है कि परवेज़ लकड़ावाला न सिर्फ़ एक कामयाब बिज़नेसमैन हैं, बल्कि वे कानून के स्नातक (लॉ ग्रेजुएट) भी हैं। उन्होंने वकालत की पढ़ाई की, जिसने उन्हें जीवन में अनुशासन और अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने की ताक़त दी। उनका पक्का यक़ीन है कि शिक्षा की वजह से ही वे आज इस मुक़ाम तक पहुंच सके हैं।

बिज़नेस में उड़ान और दरियादिली
1989 में उन्होंने 'ग्रेस ग्रुप ऑफ कंपनीज़' की नींव रखी और रियल एस्टेट क्षेत्र में अपनी क़िस्मत आज़माने का फ़ैसला किया। शुरुआत छोटी थी, लेकिन नीयत साफ़ थी इसलिए उन्हें कामयाबी मिलती गई। 1995 के आसपास उन्होंने झुग्गी पुनर्वास (SRA) के क्षेत्र में क़दम रखा, जब ज़्यादातर बिल्डर्स वहां काम करने को तैयार नहीं होते थे। आज मुंबई में उन्होंने 32 से ज़्यादा शानदार इमारतों के प्रोजेक्ट कामयाबी के साथ पूरे किए हैं।
उन्होंने नए डिज़ाइन्स, आधुनिक सुविधाओं और नई सोच को लागू करके ग़रीबों के घरों को एक नया चेहरा दिया। अपने सफ़र के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं कि अगर इंसान की नीयत साफ़ हो और वह लोगों की दुआएं लेता रहे, तो उसे तरक़्क़ी करने से दुनिया की कोई भी ताक़त नहीं रोक सकती।
सिर्फ़ पैसा कमाना उनका मक़सद कभी नहीं था। ख़ुद ग़रीबी देखने की वजह से उन्हें ग़रीबों के दर्द का अहसास है। इसीलिए आज वे हज़ारों ग़रीब बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च उठाते हैं। जिन मां-बाप के लिए अपने बच्चों की स्कूल या कॉलेज की फ़ीस भरना मुमकिन नहीं होता, उनके लिए परवेज़ लकड़ावाला उम्मीद की किरण बन गए हैं। वे बेहद आजिज़ी से कहते हैं कि अल्लाह ने मुझे दिया है, ताकि मैं इसे समाज को वापस लौटा सकूं।
लॉकडाउन के फ़रिश्ते
कोरोना के लॉकडाउन के दौरान जब पूरा देश डर के साये में था, तब परवेज़ लकड़ावाला सड़क पर उतरकर काम कर रहे थे। हज़ारों मज़दूर अपने छोटे बच्चों के साथ पैदल गांव की तरफ़ निकल पड़े थे। इन लोगों की हालत देखकर परवेज़ ने अपने ख़र्च पर गाड़ियों और बसों का इंतज़ाम किया। उन्होंने क़रीब 3000 से ज़्यादा लोगों को उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाया। सफ़र के दौरान लोगों के खाने-पीने का इंतज़ाम भी उन्होंने अपनी देखरेख में किया था। उनके इस काम के लिए न सिर्फ़ मुंबई में बल्कि राजस्थान जैसे राज्यों से भी उन्हें सराहना मिली।
नई कोशिशों का हौसला
मुंबई जैसे शहर में जहां घर का सपना देखना भी कई लोगों के लिए महंगा होता है, वहां परवेज़ लकड़ावाला ने हज़ारों परिवारों को उनका हक़ का घर दिलाया है। आज करोड़ों की इमारतें बनाने वाले इस इंसान का ख़ुद का सफ़र ढाई सौ स्क्वायर फ़ीट के घर से शुरू हुआ था।
वजूद और आत्मसम्मान की लड़ाई
परवेज़ लकड़ावाला के काम का सबसे अहम पहलू वह आत्मसम्मान है जो उन्होंने आम आदमी को दिया। पुरानी यादें ताज़ा करते हुए वे बताते हैं कि पहले झुग्गी में रहने वाले लोग अपना पता किसी को बताने में शर्म महसूस करते थे। उन्हें अपने रहन-सहन पर अफ़सोस होता था। लेकिन आज वही लोग जब सभी सुविधाओं से लैस फ्लैट में दाख़िल हुए, तो वे गर्व से अपना पता बताते हैं। उन्हें उनकी हक़ की संपत्ति और सुरक्षा का अहसास दिलाने में मुझे सबसे ज़्यादा ख़ुशी मिलती है।
कामयाबी का राज़: नेक नीयत और ईमानदारी
आज परवेज़ लकड़ावाला 'ग्रेस ग्रुप ऑफ कंपनीज़' के चेयरमैन हैं, जिसकी शुरुआत उन्होंने 1989 में की थी। वकालत की पढ़ाई कर चुके परवेज़ ने हमेशा अपने काम में ईमानदारी और अनुशासन को अहमियत दी।
कारोबारी कामयाबी के साथ-साथ परवेज़ लकड़ावाला आज भी सामाजिक कामों में उतने ही सक्रिय हैं। कोरोना के लॉकडाउन में हज़ारों मज़दूरों को अपने ख़र्च पर गांव पहुंचाने वाले या ग़रीब छात्रों की पढ़ाई के लिए फ़ीस भरने वाले परवेज़ आज भी कई लोगों के लिए उम्मीद का सहारा हैं।
परवेज़ लकड़ावाला हमेशा कहते हैं कि क़िस्मत से ज़्यादा आपकी नीयत मायने रखती है। अगर आपकी नीयत अच्छी है, तो ऊपर वाला ख़ुद आपकी मदद को आता है और आपको कामयाबी देता है।
लंदन में मिला यह सम्मान उनकी तीन दशकों की निस्वार्थ सेवा को मिली एक वैश्विक पहचान है।