दुर्गापूजा के उत्सवी माहौल में सिलीगुड़ी में हिंदू दुकानों से बिरयानी और पूजा-सामग्री खरीदने की अपील ने बाजार में धार्मिक पहचान की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं. क्या कारोबार में गुणवत्ता, कीमत और भरोसे की जगह धर्म लेने लगेगा? यह विवाद छोटे व्यापारियों की आजीविका, सांप्रदायिक सौहार्द और त्योहारों की साझा सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा है.
मंजीत ठाकुर
दुर्गापूजा बंगाल में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, शिल्प, खान-पान, रोजगार और सामुदायिक जीवन का एक बड़ा उत्सव है. महीनों पहले से कुम्हार मूर्तियां बनाने लगते हैं, कलाकार पंडाल सजाने में जुट जाते हैं, कारीगर प्रतिमा के आभूषण तैयार करते हैं और छोटे दुकानदार त्योहार के कारोबार की उम्मीद में अपनी पूंजी लगाते हैं.
लेकिन इसी उत्सवी मौसम में सिलीगुड़ी से आई एक खबर ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है: क्या अब त्योहार की खरीदारी में भी दुकानदार का धर्म, उसके सामान की गुणवत्ता और कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रहा है?
11अक्टूबर 2026को प्रकाशित खबरों के अनुसार, सिलीगुड़ी में हिंदू जागरण मंच ने ऐसे पोस्टर लगाए, जिनमें लोगों से हिंदू दुकानों से बिरयानी और पूजा-सामग्री खरीदने की अपील की गई.
संगठन ने इसे आदेश नहीं, बल्कि हिंदू कारोबारियों को आर्थिक समर्थन देने की अपील बताया. दूसरी ओर, स्थानीय आलोचकों और वामपंथी नेताओं ने इस अभियान पर आपत्ति जताई और धार्मिक पहचान के आधार पर बाजार को बांटने की आशंका व्यक्त की.
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके केंद्र में केवल एक पोस्टर या बिरयानी की दुकान नहीं है. सवाल उस आर्थिक व्यवहार का है, जिसमें ग्राहक और दुकानदार के बीच भरोसे, कीमत, गुणवत्ता और सेवा के रिश्ते की जगह धार्मिक पहचान लेने लगे.
‘अपील’ और सामाजिक दबाव के बीच की दूरी
किसी भी नागरिक को अपनी पसंद के दुकानदार से सामान खरीदने का अधिकार है. कोई व्यक्ति किसी खास कारोबार, स्थानीय उत्पाद या छोटे उद्यमी का समर्थन करना चाहे, तो इसमें अपने आप में कोई समस्या नहीं है. धार्मिक समुदायों के भीतर आर्थिक सहयोग की पहल भी लोकतांत्रिक समाज में चर्चा का वैध विषय हो सकती है.
लेकिन जब अपील यह कहने लगे कि सामान किस धर्म के व्यक्ति से खरीदना चाहिए, तब उसका सामाजिक अर्थ बदल जाता है. ऐसी अपील ग्राहक को केवल एक विकल्प नहीं देती; वह खरीदारी को धार्मिक निष्ठा की कसौटी भी बना सकती है.
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा. किसी दुकान को चुनना ग्राहक का निजी निर्णय है, लेकिन सार्वजनिक अभियान के जरिए दुकानदारों की धार्मिक पहचान के आधार पर खरीदारी को प्रोत्साहित करना एक व्यापक सामाजिक संदेश देता है.
यदि ऐसा संदेश बार-बार दोहराया जाए, तो दूसरे समुदाय के कारोबारी को ग्राहक खोने का डर हो सकता है. ग्राहक भी यह सोच सकता है कि किसी खास दुकान से सामान खरीदना उसके समुदाय के प्रति निष्ठा का प्रश्न बना दिया जाएगा.
फिलहाल सिलीगुड़ी में इस अभियान के कारण कितने कारोबारियों को वास्तविक आर्थिक नुकसान हुआ है, इसका प्रमाण उपलब्ध खबरों में नहीं दिया गया है. इसलिए नुकसान को घटित तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा. लेकिन आर्थिक बहिष्कार की आशंका और बाजार में पैदा होने वाला सामाजिक दबाव अपने आप में गंभीर सवाल हैं.
त्योहारों की अर्थव्यवस्था किसी एक समुदाय की नहीं
दुर्गापूजा की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए पंडाल के सामने लगी रोशनी से आगे देखना होगा. इसमें मूर्तिकार, बांस और कपड़े के कारोबारी, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, चित्रकार, फूल विक्रेता, दर्जी, खाद्य विक्रेता, परिवहनकर्मी और असंख्य छोटे उद्यमी शामिल होते हैं. इनमें अलग-अलग धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग काम करते हैं.
रिपोर्टों में इस बात का भी उल्लेख है कि दुर्गापूजा की सजावट और शोलापिथ के आभूषणों से जुड़े कारीगरों में मुस्लिम कारीगर भी शामिल हैं.
यह साझेदारी कोई असाधारण सामाजिक प्रयोग नहीं है. भारतीय त्योहारों की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से श्रम के इस परस्पर निर्भर रिश्ते पर टिकी रही है. पूजा किसी की आस्था हो सकती है, लेकिन उसके आयोजन में लगने वाला श्रम अनेक लोगों की आजीविका का साधन बनता है.
इसलिए सवाल यह नहीं है कि हिंदू व्यापारी को कारोबार क्यों मिले. सवाल यह है कि क्या उसे समर्थन देने का एकमात्र रास्ता मुस्लिम व्यापारी से दूरी बनाना है? क्या स्थानीय कारोबार को मजबूत करने के लिए धार्मिक पहचान को सामने लाना जरूरी है?
क्या छोटे दुकानदारों की मदद के लिए बेहतर बाजार, उचित ऋण, प्रशिक्षण, डिजिटल भुगतान और ग्राहकों तक पहुंच जैसे विकल्प नहीं हैं?यदि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना उद्देश्य है, तो वह प्रयास कारोबारियों की धार्मिक पहचान के बजाय उनकी जरूरतों और आर्थिक स्थिति पर आधारित होना चाहिए.
'Buy biryani from Hindu shops' poster campaign sparks row in Bengal's Siliguri ahead of Durga Puja. The posters were put up across the city by Hindu Jagaran Manch, an affiliate of the RSS. The organisation stated that messages like "Eat biryani at a Hindu shop" and "Buy puja articles from Hindu shops" are not a diktat.
— News Arena India (@NewsArenaIndia) October 13, 2026
बिरयानी से बड़ा सवाल
इस विवाद में बिरयानी का उल्लेख प्रतीकात्मक महत्व रखता है. भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं होता; वह स्मृति, स्वाद, संस्कृति और सामाजिक मेलजोल का हिस्सा भी है.बंगाल की खाद्य संस्कृति में अलग-अलग परंपराओं और समुदायों का योगदान रहा है. किसी व्यंजन को किसी एक धर्म की स्थायी संपत्ति मान लेना इस सांस्कृतिक इतिहास को संकुचित करना होगा.
बिरयानी बनाने वाला व्यक्ति हिंदू है या मुस्लिम, यह जानना ग्राहक का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसे खरीदारी की अनिवार्य कसौटी बना देना एक अलग बात है.इसी तरह पूजा-सामग्री की दुकान चलाने वाले की धार्मिक पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि वह गुणवत्तापूर्ण सामान उचित कीमत पर उपलब्ध करा रहा है या नहीं.
बाजार का एक बुनियादी सिद्धांत है कि ग्राहक अपने विवेक से निर्णय ले. जब इस निर्णय पर सामुदायिक दबाव हावी होने लगता है, तब बाजार केवल वस्तुओं के लेन-देन की जगह नहीं रहता; वह पहचान की राजनीति का मैदान बन सकता है.
संविधान और नागरिकता का प्रश्न
भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों की रक्षा करता है. अनुच्छेद 15राज्य को धर्म सहित कुछ आधारों पर भेदभाव करने से रोकता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को पेशा अपनाने, व्यापार करने और व्यवसाय चलाने का अधिकार देता है. इन प्रावधानों का कानूनी दायरा और निजी व्यक्तियों पर उनका लागू होना अलग-अलग प्रश्न हैं; इसलिए हर धार्मिक अपील को स्वतः असंवैधानिक घोषित करना सही नहीं होगा.
फिर भी संवैधानिक मूल्यों का सामाजिक महत्व अदालतों की व्याख्या तक सीमित नहीं है. समान नागरिकता का अर्थ है कि किसी व्यक्ति की आजीविका और सामाजिक प्रतिष्ठा केवल उसकी धार्मिक पहचान के कारण संदेह के घेरे में न आए.
लोकतंत्र में किसी संगठन को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है. उसी तरह नागरिकों को उस विचार की आलोचना करने का भी अधिकार है. इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते समय भी संयम जरूरी है. पूरे हिंदू समाज को इस अभियान से जोड़ना उतना ही अनुचित होगा, जितना किसी समुदाय के सभी कारोबारियों को एक ही नजर से देखना.
क्या त्योहारों की अर्थव्यवस्था अगला कम्युनल प्लैशपॉइन्ट बनेगी?
सिलीगुड़ी के पोस्टर अपने आप में यह साबित नहीं करते कि बंगाल की त्योहार अर्थव्यवस्था धार्मिक आधार पर बंट चुकी है. लेकिन वे एक ऐसी प्रवृत्ति की ओर ध्यान खींचते हैं, जिसमें खाना खरीदना, दुकान चुनना, कारोबार करना जैसी रोजमर्रा की गतिविधियां सामुदायिक पहचान के चश्मे से देखी जाने लगती हैं.
इसका असर केवल अल्पसंख्यक दुकानदारों तक सीमित नहीं रह सकता. यदि ग्राहक की पसंद पर पहचान का दबाव बढ़ता है, तो कारोबारियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी गुणवत्ता और कीमत से हटकर धार्मिक पहचान पर टिक सकती है.
अंततः नुकसान उन छोटे व्यवसायों का होगा, जिनके पास बड़े बाजारों और ग्राहकों तक पहुंच बनाने के सीमित साधन हैं.प्रशासन की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है. उसे किसी वैध अपील पर केवल उसके राजनीतिक संदेश के कारण कार्रवाई करने के बजाय यह देखना चाहिए कि कहीं धमकी, जबरदस्ती, सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा या किसी के कारोबार को रोकने की कोशिश तो नहीं हो रही. साथ ही, राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को भी समझना होगा कि उनके संदेशों का असर पोस्टर लगाने तक सीमित नहीं रहता.
दुर्गापूजा की असली शक्ति उसकी भव्यता में ही नहीं, बल्कि उस सामूहिक श्रम में भी है जो उसे संभव बनाता है.पंडाल की सजावट करने वाले हाथों, प्रतिमा गढ़ने वाले कलाकारों और बाजार में सामान बेचने वाले छोटे कारोबारियों की आजीविका को धार्मिक खांचों में बांटना त्योहार के सामाजिक आधार को कमजोर कर सकता है.
सवाल यह नहीं कि किस धर्म की दुकान से खरीदारी हो. सवाल यह है कि क्या हम ऐसा बाजार चाहते हैं, जहां ग्राहक का फैसला उसकी पसंद से हो या उसकी धार्मिक पहचान से? दुर्गापूजा की रोशनी तभी व्यापक अर्थ में उत्सव बनेगी, जब उसके उजाले में काम करने वाले हर कारीगर और कारोबारी को अपनी मेहनत के लिए सम्मान और अवसर मिले. त्योहार लोगों को जोड़ने का अवसर है,उसे आर्थिक बहिष्कार की परीक्षा में बदल देना किसी के भी हित में नहीं है.क्या ऐसा करके हम एक और पाकिस्तान के विचार को सींच नहीं रहे हैं?
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