देस-परदेस: अब हूतियों से दो-दो हाथ करेगा मक्का-पैक्ट?

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  onikamaheshwari | Date 13-10-2026
Domestic & International: Will the Mecca Pact now lock horns with the Houthis?
Domestic & International: Will the Mecca Pact now lock horns with the Houthis?

 

प्रमोद जोशी

अमेरिका-ईरान युद्ध में ठहराव आने के बाद सऊदी अरब और हूती लड़ाकों के बीच लड़ाई में तेजी आ रही है. इस लड़ाई के निहितार्थ वही नहीं हैं, जो ईरान युद्ध के थे. ईरान की इसमें परोक्ष भूमिका होने की वजह से कई सवाल उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल मक्का रक्षा-समझौते का है, जिसके हालिया फैसले से बड़ी लड़ाई भड़कने का अंदेशा है.

हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि हम हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार करेंगे, पर लगता नहीं कि अगले महीने होने वाले चुनाव पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को देखते हुए वे फिलहाल कोई कार्रवाई करेंगे. ईरान समर्थित हूती मिलिशिया ने शनिवार को सऊदी राजधानी में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मिसाइलों से हमला किया, जिसमें कम से कम 12 लोग मारे गए और 300 से अधिक लोग घायल हो गए हैं.  

इसके बाद रविवार को एक और हमला होने की सूचना है. एक वरिष्ठ हूती प्रवक्ता ने दावा किया कि हमला हमने किया है. फरवरी में ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने के बाद से किसी खाड़ी अरब देश में हुआ यह सबसे घातक हमला था. जवाब में यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर सऊदी हमले की सूचना भी है.

Mecca pact activated as Houthi attacks on Saudi Arabia intensify

आर्थिक गतिविधियाँ

बार-बार हो रहे हूती हमलों के कारण सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की रियाद को वैश्विक यात्रा और व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षाओं को झटका दिया है. वहाँ आने वाले हफ्तों में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के बाधित होने का खतरा भी मंडरा रहा है.

उधर यमन में, सऊदी अरब के युद्धक विमान हूतियों के खिलाफ बमबारी अभियान चला रहे हैं.  हूती स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता अनीस अल-अस्बाही के अनुसार, यमन में हुए हवाई हमलों में 91 लोग मारे गए हैं, जिनमें अधिकतर महिलाएँ और बच्चे हैं.

हूती प्रवक्ता का कहना है कि हमने यह हमला इसलिए किया ताकि दुनिया यह समझ सके कि यमन में हवाई अड्डे, बंदरगाह, शादी और मातम के हॉल, अस्पताल और बाजार नागरिक सुविधाएँ हैं, जिन्हें निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए. विश्लेषकों का कहना है कि संघर्ष का राजनीतिक समाधान निकालना मुश्किल होता जा रहा है. हूतियों की रणनीति है कि सऊदी अरब को उससे कहीं ज्यादा तकलीफ़ पहुँचाओ, जितनी सऊदी अरब उन्हें पहुँचा सकता है.

मक्का पैक्ट

उधर पिछले हफ्ते ही मक्का समझौते से जुड़े तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सऊदी अरब में फौजी तैनाती में तेजी लाने का फैसला किया है. सोमवार 5 अक्तूबर को तीनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्रियों की रियाद में हुई आपात बैठक में इस समझौते को सक्रिय करने और सेना की तैनाती का फ़ैसला किया गया.

बैठक में ख़ासतौर पर मक्का और मदीना के पवित्र शहरों को निशाना बनाने वाले हमलों की निंदा की गई, पर हूतियों का नाम नहीं लिया गया. इस सक्रियता का अर्थ क्या है?सऊदी अरब को क्या अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल होगा?भारत की सुरक्षा के मसले और कुछ दूसरे सवाल भी उठ रहे हैं.

पाकिस्तानी सहयोग

गत 7 अगस्त को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पहली बार इस रक्षा समझौते को सक्रिय किया गया है. समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने पिछले सप्ताह ख़बर दी थी कि पाकिस्तान ने यमन की सऊदी समर्थित सरकार की मदद के लिए अदन में हथियारों से भरे चार विमान भेजे हैं.

पाकिस्तान के अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा को लेकर हाल में किए गए वादों को दोनों देशों के पुराने रक्षा संबंधों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. सऊदी अरब में बरसों से पाकिस्तानी सैनिक तैनात हैं. दोनों देशों ने पहला रक्षा सहयोग समझौता 1967 में किया था. 1982 में एक और रक्षा समझौते के ज़रिए इस सहयोग को मज़बूत किया गया.

उस समय 'सऊदी-पाकिस्तानी आर्म्ड फ़ोर्सेज़ ऑर्गनाइज़ेशन' बनाया गया, जिसके तहत पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी अरब में प्रशिक्षण देने, सलाह देने और तैनात करने की व्यवस्था की गई थी. इसके पहले 1979 में मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हथियारबंद लोगों के क़ब्ज़े के बाद दोनों देशों का सुरक्षा सहयोग ख़ासतौर पर बढ़ा.पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेस ने मस्जिद को हथियारबंद लोगों के क़ब्ज़े से छुड़ाने में सऊदी सैनिकों की मदद की थी.

असमंजस

पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब से आर्थिक लाभ लेना चाहता है, वहीं इस लड़ाई में पूरी तरह शामिल होने से बचना भी चाहता है. आर्थिक मुश्किलों में सऊदी अरब उसकी मदद करता रहा है. इन रिश्तों के कारण पाकिस्तान को रणनीतिक और आर्थिक फ़ायदे मिलते हैं. सैनिकों की तैनाती के बावज़ूद अप्रैल 2015 में पाकिस्तान की संसद ने हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे गठबंधन में शामिल होने के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था.

पाकिस्तान के उस फ़ैसले से ईरान समर्थित विद्रोहियों के ख़िलाफ़ व्यापक सुन्नी मोर्चा बनाने की सऊदी कोशिशों को झटका लगा था. तब पाकिस्तानी संसद में कहा गया था, ‘हमें यमन के संघर्ष में तटस्थ रहना चाहिए, ताकि संकट को ख़त्म करने में सक्रिय राजनयिक भूमिका निभा सकें.’ इसके बावज़ूद पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष राहील शरीफ ने सऊदी अरब के सैनिक गठबंधन की कमान संभाली थी.

सेवानिवृत्ति के बाद, जनवरी 2017 में उन्हें सऊदी अरब के नेतृत्व वाले 39-देशों के इस्लामी सैन्य आतंकवाद विरोधी गठबंधन (आईएमसीटीसी) का कमांडर नियुक्त किया गया, जिसे उस समय 'मुस्लिम नाटो' भी कहा जाता था. इस समय भी वे इस सैन्य गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं.

नया समझौता

सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 'स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफ़ेंस एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते में कहा गया है कि दोनों में से किसी एक पर हमला, दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. हाल में समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान ने 2025 से सऊदी अरब में ‘30 हज़ार से 40 हज़ार सैनिक तैनात किए हैं.’

साथ ही यह भी कहा गया कि मक्का समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य उपकरण दिए हैं. पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने गत 6 अक्तूबर को इन दावों को ‘अटकलों पर आधारित’ बताते हुए ख़ारिज किया है. साथ ही यह भी कहा कि साझा रक्षा व्यवस्था को लागू करने से जुड़ी सैन्य कार्रवाइयों की जानकारी गोपनीय है.

तुर्की की भूमिका

सवाल यह भी है कि क्या तुर्की खुलकर इस लड़ाई में शामिल होगा?संभावना है कि अगले 30 दिनों के भीतर मक्का समझौते या सैन्य तैनाती की मंज़ूरी के लिए तुर्की की ग्रैंड नेशनल असेंबली में पेश किया जाएगा. तुर्की बिना संसद की मंज़ूरी के किसी विदेशी देश में सैन्य बलों को तैनात नहीं कर सकता. माना जा रहा है कि यमन में सैनिकों की तैनाती के बजाय सऊदी अरब की धरती पर वायुरक्षा, ड्रोन, ख़ुफ़िया, निगरानी और टोह से जुड़ी गतिविधियों में तुर्की शामिल होगा.  

अब खतरा इस बात का भी है कि आने वाले दिनों में रियाद की घोषणा के जवाब में हूती विद्रोही, सऊदी अरब के पेट्रोलियम इंफ्रास्ट्रक्चर और दक्षिणी शहरों को निशाना बनाएँगे. हूती अपनी धमकियों में तुर्की और पाकिस्तान का नाम नहीं लेते हैं, पर अब वे सीधे नाम भी ले सकते हैं.

Will the Houthi attacks activate the Mecca Pact? | Houthis | Al Jazeera

गृहयुद्ध को हवा

हाल में हुए ईरान-युद्ध ने यमन के गृहयुद्ध को फिर से हवा दे दी है, जो चार साल के युद्धविराम के बाद 2014 में हूती विद्रोहियों के सत्ता पर कब्ज़े के साथ शुरू हुआ था. दोनों पक्षों के बीच 2020 में हुआ युद्धविराम जुलाई 2026 में तब टूट गया जब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र पर अधिकार का उल्लंघन करते हुए एक ईरानी विमान को यमन की राजधानी में उतरने की अनुमति दे दी.

बढ़ते संघर्षों के बाद, विद्रोहियों ने अंततः सऊदी अरब पर समुद्री नाकाबंदी की घोषणा की और यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर कब्ज़ा कर लिया. अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने पत्रकारों से कहा था कि सऊदी सरकार, हूती हमलों का जवाब देते हुए अपने क्षेत्र पर फिर से कब्ज़ा कर लेगी.

हूती कौन हैं?

हूती यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन है, जिसका आधिकारिक नाम अंसार अल्लाह (अल्लाह के समर्थक) है. ये मुख्य रूप से यमन के उत्तर-पश्चिमी हिस्से सादा प्रांत और आसपास के ज़ैदी शिया समुदाय से आते हैं. नब्बे के दशक में ज़ैदी पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए यह आंदोलन शुरू हुआ.

ज़ैदी शिया (या ज़ैदिया) इस्लाम की शिया शाखा का एक प्रमुख और पुराना संप्रदाय है. ज़ैदी इमामों ने सदियों तक उत्तरी यमन पर शासन किया था, लेकिन 1962की क्रांति के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव खत्म हो गया. इस आंदोलन के संस्थापक थे हुसैन बद्रुद्दीन अल-हूती, जिनके नाम पर समूह को ‘हूती’कहा जाता है. 2004में यमनी सरकार के साथ संघर्ष में उनकी मौत हो गई. अब उनके सौतेले भाई अब्दुल मालिक अल-हूती आंदोलन का नेतृत्व करते हैं.

Mecca pact to be activated? Pakistan discusses Houthi attacks on Saudi  Arabia with Iran | World News

सना पर कब्ज़ा

2014 में हूतियों ने देश की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. आज वे यमन के उत्तर-पश्चिम के बड़े हिस्से पर (जहाँ 60-80प्रतिशत आबादी रहती है) नियंत्रण रखते हैं और एक अर्ध-राज्य की तरह शासन करते हैं. हूती खुद को ईरानी प्रॉक्सी नहीं मानते. अलबत्ता वे खुद को‘प्रतिरोध की धुरी’(ईरान, हिज़्बुल्ला, हमास आदि) का हिस्सा ज़रूर बताते हैं.

वे लंबे समय से सऊदी अरब के राजनीतिक और धार्मिक प्रभाव को अपना शत्रु मानते रहे हैं. सीमा विवाद और सऊदी द्वारा यमनी मामलों में भी दखलंदाजी की पुरानी शिकायतें हैं. सना पर हूतियों के कब्जे के बाद, वहाँ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार ने अदन को अपनी अस्थायी राजधानी बनाया है. सना छिन जाने के लगभग छह महीने बाद, सऊदी अरब ने यमन के गृहयुद्ध में सीधे हस्तक्षेप किया.

यह हस्तक्षेप सात साल तक चला और इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. इसके बाद सऊदी अरब ने यमन संघर्ष को बातचीत के जरिए खत्म करने की कोशिश की, लेकिन वर्षों की बातचीत के बावजूद उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली. हूतियों ने बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के पास रणनीतिक मजबूती हासिल कर ली है, जिससे लाल सागर में इतनी अस्थिरता पैदा हो गई है कि जहाजरानी कंपनियों को अपने जहाजों को लाल सागर से दूर मोड़ना पड़ रहा है.

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