सृजन पाल सिंह ‘कलाम’
उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मिसाइल बनाना, परमाणु शक्ति संपन्न भारत का सपना साकार करना या राष्ट्रपति भवन तक पहुंचना नहीं था। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद रखें।
यह बात सुनने में जितनी सरल लगती है, इसके भीतर राष्ट्र निर्माण का उतना ही गहरा दर्शन छिपा है। डॉ. कलाम का मानना था कि शिक्षक केवल बच्चों को किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि वे व्यक्तित्व गढ़ते हैं, चरित्र का निर्माण करते हैं और समाज को नई दिशा देते हैं। एक अच्छा शिक्षक केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी तैयार नहीं करता, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करता है, जो अपने समय की चुनौतियों का सामना कर सकें और देश के भविष्य को बेहतर बना सकें।
27 जुलाई 2015 को शिलांग स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. कलाम का निधन हो गया। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन भारत के वैज्ञानिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और युवाओं के सपनों को समर्पित किया, उसने जीवन की अंतिम सांस भी विद्यार्थियों के बीच ली। वह मंच पर थे, उनके हाथ में माइक्रोफोन था और सामने विद्यार्थी बैठे थे। वह अपना प्रिय काम कर रहे थे। उनके जीवन की इससे अधिक अर्थपूर्ण तस्वीर शायद ही कोई हो सकती है।
उनके निधन को एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उनकी स्मृति आज भी देश के कोने-कोने में जीवित है। स्कूलों में उनके नाम पर सदन बनाए जाते हैं। उनकी तस्वीरें लगाई जाती हैं। उनके विचारों को भाषणों, पुस्तकों और शैक्षणिक कार्यक्रमों में दोहराया जाता है। बच्चे उन्हें मिसाइल मैन के रूप में जानते हैं और युवा उन्हें एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद करते हैं, जिसने राष्ट्रपति भवन की गरिमा को आम नागरिकों, खासकर विद्यार्थियों, के और करीब पहुंचाया।
लेकिन डॉ. कलाम की लोकप्रियता का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि उनकी विरासत किसी एक राजनीतिक दल, धार्मिक समुदाय या भाषाई क्षेत्र तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग, विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों से जुड़े युवा तथा शिक्षा और विज्ञान में रुचि रखने वाले विद्यार्थी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। यह किसी भी महान व्यक्तित्व की सबसे बड़ी सफलता है कि उसके विचार उसकी व्यक्तिगत पहचान से आगे बढ़कर समाज की साझा पूंजी बन जाएं।
When Dr APJ Abdul Kalam addressed the European Parliament 🔥 https://t.co/wHTKWSYw3k
— Gabbar (@Gabbar0099) September 21, 2025
विज्ञान से राष्ट्र निर्माण तक का सफर
डॉ. कलाम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी व्यक्ति की दूरदृष्टि किस तरह एक राष्ट्र की क्षमताओं को आकार दे सकती है। भारत के मिसाइल कार्यक्रम, रक्षा अनुसंधान, अंतरिक्ष तकनीक और स्वदेशी वैज्ञानिक क्षमताओं के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की, जो अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर न रहे और विज्ञान तथा तकनीक के क्षेत्र में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े।
उनके वैज्ञानिक जीवन को केवल मिसाइलों और रक्षा प्रणालियों तक सीमित करके देखना उनके योगदान को छोटा करना होगा। उनका असली उद्देश्य भारत को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना था। वह चाहते थे कि देश के वैज्ञानिक, इंजीनियर और युवा अपने ज्ञान का उपयोग राष्ट्रीय समस्याओं को हल करने में करें। उनकी सोच में विज्ञान का महत्व तभी था, जब उसका लाभ देश और समाज तक पहुंचे।
स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास से लेकर भारत की रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत बनाने तक, डॉ. कलाम की भूमिका ने देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। आकाश मिसाइल, अग्नि मिसाइल, ब्रह्मोस जैसी प्रणालियों और भारत के रक्षा अनुसंधान से जुड़े व्यापक प्रयासों की चर्चा में उनका नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
हालांकि इन परियोजनाओं की सफलता अनेक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, संस्थानों और वर्षों के सामूहिक परिश्रम का परिणाम रही, लेकिन डॉ. कलाम ने इन प्रयासों को दिशा देने और वैज्ञानिक समुदाय को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत की सुरक्षा और सामरिक क्षमता पर चर्चा करते समय उनका योगदान आज भी प्रासंगिक दिखाई देता है। उनके विचार हमें बताते हैं कि किसी देश की वास्तविक शक्ति केवल उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उन संसाधनों का उपयोग करने वाले लोगों की प्रतिभा, अनुशासन और दूरदृष्टि में निहित होती है।
फिर भी, डॉ. कलाम की महानता का मूल्यांकन केवल रक्षा क्षेत्र में मिली उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। उन्होंने विज्ञान की प्रयोगशालाओं से निकलकर देश के युवाओं के मन तक पहुंचने का रास्ता चुना। यही वह बिंदु है, जहां उनका व्यक्तित्व एक वैज्ञानिक से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माता का रूप लेता है।
जब एक युवा से पूछा गया जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सवाल
डॉ. कलाम के साथ काम करने वाले सृजन पाल सिंह के अनुभव उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाते हैं, जिसे समझना आज के युवाओं और शिक्षा व्यवस्था, दोनों के लिए जरूरी है।वर्ष 2009में जब सृजन पाल सिंह ने डॉ. कलाम के साथ काम करना शुरू किया, तब वह अपने करियर के शुरुआती दौर में थे।
एक युवा के लिए देश के सबसे सम्मानित वैज्ञानिकों और पूर्व राष्ट्रपति के साथ काम करना अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन डॉ. कलाम की विशेषता यह थी कि वह अपने सहयोगियों के पद या अनुभव से अधिक उनकी संभावनाओं में रुचि लेते थे।
वह अक्सर सृजन पाल सिंह से एक सवाल पूछते थे, जिसका उत्तर देना आसान नहीं था। सवाल था, आप चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां आपको किस रूप में याद रखें? आप अपने जीवन के लिए कैसी पहचान बनाना चाहते हैं?
यह कोई सामान्य बातचीत का प्रश्न नहीं था। इसके पीछे एक युवा को अपने जीवन का उद्देश्य खोजने के लिए प्रेरित करने की कोशिश थी। डॉ. कलाम हर बार उत्तर सुनते और अगली मुलाकात में उसी प्रश्न को नए रूप में सामने रख देते। वह चाहते थे कि उनका युवा सहयोगी अपने जवाब को और स्पष्ट करे, अपने विचारों को बेहतर बनाए और अपने जीवन की दिशा पर गंभीरता से विचार करे।
आखिरकार एक दिन सृजन पाल सिंह ने भी उनसे यही सवाल पूछ लिया। उन्होंने डॉ. कलाम के सामने चार विकल्प रखे। क्या वह भारत के स्पेस मैन के रूप में याद किया जाना चाहेंगे? मिसाइल मैन के रूप में? न्यूक्लियर मैन के रूप में? या फिर पीपुल्स प्रेसिडेंट के रूप में?
ये चारों पहचान अपने आप में बड़ी थीं। हर पहचान के पीछे दशकों का परिश्रम और देश के लिए असाधारण योगदान था। लेकिन डॉ. कलाम ने मुस्कुराते हुए कहा कि उनके उत्तर का सही विकल्प इन चारों में शामिल नहीं है। एक पांचवां विकल्प भी है, जिसे अक्सर लोग भूल जाते हैं। वह विकल्प था, शिक्षक।
डॉ. कलाम चाहते थे कि भारत उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद रखे। उनका विश्वास था कि शिक्षक दूसरों के जीवन में रोशनी फैलाते हैं। शिक्षक वैज्ञानिक तैयार करते हैं, डॉक्टर और इंजीनियर बनाते हैं, प्रशासकों को दिशा देते हैं और समाज के भविष्य का निर्माण करते हैं। किसी भी राष्ट्र की उपलब्धियों के पीछे उन शिक्षकों का योगदान होता है, जिन्होंने प्रतिभाओं को पहचाना, उन्हें अवसर दिए और उनकी क्षमता पर भरोसा किया। यह उत्तर उनके पूरे जीवन दर्शन को समझने की कुंजी है।
Remembering our beloved former President, Dr. APJ Abdul Kalam on his birth anniversary. His endearing personality inspires millions. https://t.co/epto5woyPb
— Narendra Modi (@narendramodi) October 15, 2017
शिक्षक केवल कक्षा में नहीं, पूरे समाज में होता है
डॉ. कलाम के विचारों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह शिक्षा को केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की चारदीवारी तक सीमित नहीं मानते थे। उनके लिए शिक्षा एक सतत प्रक्रिया थी, जिसका संबंध परिवार, समाज, संस्थानों और राष्ट्र के भविष्य से था।
एक शिक्षक का काम केवल यह बताना नहीं है कि सही उत्तर क्या है। उसका काम विद्यार्थियों को सही प्रश्न पूछना सिखाना भी है। जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी को सोचने की स्वतंत्रता देता है, उसकी जिज्ञासा को प्रोत्साहित करता है और उसे गलतियों से सीखने का अवसर देता है, तभी वास्तविक शिक्षा का वातावरण बनता है।
सृजन पाल सिंह के साथ डॉ. कलाम का व्यवहार इसका उदाहरण है। वह सीधे यह नहीं बताते थे कि जीवन में क्या बनना चाहिए। इसके बजाय वह बार-बार सवाल पूछते थे और सामने वाले को अपना उत्तर विकसित करने का अवसर देते थे। वह किसी पर अपना लक्ष्य थोपने के बजाय उसे अपना उद्देश्य खोजने के लिए प्रेरित करते थे।
आज हमारी शिक्षा व्यवस्था को इसी दृष्टिकोण की जरूरत है। विद्यार्थियों पर अच्छे अंक लाने, प्रतियोगी परीक्षाएं पास करने और अच्छी नौकरी पाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इन लक्ष्यों का अपना महत्व है, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल इतना नहीं हो सकता। हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता, नैतिक साहस, रचनात्मकता और सामाजिक जिम्मेदारी भी विकसित करे।
माता-पिता की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि उन्हें क्या करना है। उन्हें यह सोचने का अवसर भी देना चाहिए कि वे अपने जीवन से क्या हासिल करना चाहते हैं और समाज के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। उनके सवालों को सुनना, उनकी जिज्ञासा का सम्मान करना और उनकी गलतियों पर धैर्य रखना भी शिक्षा का हिस्सा है।
एक अच्छा शिक्षक वह नहीं, जो हर समय बोलता रहे। अच्छा शिक्षक वह भी है, जो अपने विद्यार्थी को सोचने, सवाल करने और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में मदद करे।
डॉ. कलाम की विरासत किसी एक व्यक्ति की नहीं
डॉ. कलाम के निधन के बाद भी उनके प्रति लोगों का सम्मान बना रहना इस बात का संकेत है कि उन्होंने समाज के भीतर एक स्थायी स्थान बनाया। उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए किसी राजनीतिक अभियान या किसी एक विचारधारा की आवश्यकता नहीं पड़ी। उनके विचारों से प्रभावित लोग स्वयं आगे आए और उन्हें नई पीढ़ियों तक पहुंचाते रहे।
इसका कारण यह है कि डॉ. कलाम की अपील व्यापक थी। वह भारत के विकास की बात करते थे, लेकिन उनके विकास का केंद्र केवल आर्थिक प्रगति नहीं थी। वह ज्ञान, आत्मनिर्भरता, चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे।
उनकी जिंदगी यह संदेश देती है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म, धर्म, भाषा या सामाजिक पृष्ठभूमि से बड़ी हो सकती है। एक व्यक्ति अपने कर्मों और विचारों के जरिए ऐसे लोगों को जोड़ सकता है, जो अलग-अलग परिस्थितियों में पले-बढ़े हों, लेकिन एक बेहतर भविष्य का सपना देखते हों।
आज जब समाज में विभाजन और अविश्वास की चुनौतियां दिखाई देती हैं, तब डॉ. कलाम की विरासत हमें याद दिलाती है कि शिक्षा और ज्ञान लोगों को जोड़ने की ताकत रखते हैं। बच्चों के सपनों की कोई धार्मिक या भाषाई सीमा नहीं होती। विज्ञान की खोजों और शिक्षा के अवसरों का लाभ भी पूरी मानवता को मिलना चाहिए।
यही कारण है कि डॉ. कलाम को याद करना केवल अतीत के एक महान वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस विचार को आगे बढ़ाना है, जिसमें भारत का भविष्य उसके युवाओं की प्रतिभा, मेहनत और नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है।
परिवार से शुरू होता है राष्ट्र निर्माण
डॉ. कलाम की शिक्षकीय सोच को अपनाने के लिए किसी बड़े पद, विशेष प्रशिक्षण या संस्थान की आवश्यकता नहीं है। इसकी शुरुआत हमारे अपने व्यवहार से हो सकती है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए शिक्षक बन सकते हैं। बड़े भाई-बहन छोटे भाई-बहनों के लिए उदाहरण बन सकते हैं। कार्यालय में अनुभवी कर्मचारी अपने साथियों को सीखने में मदद कर सकते हैं। समाज में जिम्मेदार नागरिक अपने आचरण के माध्यम से दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं।
लेकिन शिक्षक बनने का अर्थ दूसरों पर अधिकार जमाना नहीं है। इसका अर्थ है धैर्य रखना, शांति से बात करना, दूसरों की बात सुनना और अपने व्यवहार से अच्छे मूल्यों को स्थापित करना। केवल उपदेश देकर समाज नहीं बदलता। समाज तब बदलता है, जब लोग उन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाते हैं, जिनकी वे दूसरों से अपेक्षा करते हैं।
यदि हम अपने परिवार में ईमानदारी, संवेदनशीलता, अनुशासन और सम्मान का वातावरण बनाते हैं, तो उसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। यदि हम उन्हें सवाल पूछने देते हैं, तो उनमें जिज्ञासा विकसित होती है। यदि हम उन्हें दूसरों की सहायता करना सिखाते हैं, तो उनमें सामाजिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती है।
राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया किसी संसद, मंत्रालय या बड़ी योजना से ही शुरू नहीं होती। उसकी नींव घरों, स्कूलों और उन छोटे-छोटे व्यवहारों में रखी जाती है, जो धीरे-धीरे समाज की संस्कृति बन जाते हैं।
डॉ. कलाम की विरासत का वास्तविक अर्थ भी यही है। उनके सपनों का भारत केवल आधुनिक मिसाइलों, उन्नत तकनीक और मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश नहीं था। वह ऐसा भारत चाहते थे, जहां युवा बड़े सपने देखें, ज्ञान को महत्व दें और अपने व्यक्तिगत विकास को राष्ट्र की प्रगति से जोड़कर देखें।
"Every human being has got some knowledge, but a great teacher doesn't care whether you sit in the first row or the last row." - Dr APJ Abdul #Kalam #IADN 📹 Dr. APJ Abdul Kalam, while interacting with the KRM Public School, Chennai students on 21.06.2014 https://t.co/4Wn4FRqSNu
— IADN (@NewsIADN) June 2, 2023
अब सवाल हमसे है
डॉ. कलाम युवाओं को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करते थे। उनका विश्वास था कि सपने केवल सोते समय दिखाई देने वाली कल्पनाएं नहीं होने चाहिए। सच्चा सपना वह है, जो व्यक्ति को मेहनत करने, कठिनाइयों का सामना करने और अपने लक्ष्य की दिशा में लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे।
लेकिन बड़े सपने देखने का अर्थ केवल बड़ी नौकरी, ऊंचा पद या व्यक्तिगत प्रसिद्धि हासिल करना नहीं है। बड़ा सपना वह भी हो सकता है, जिसमें कोई शिक्षक हजारों बच्चों का भविष्य बदलना चाहता हो। कोई डॉक्टर गरीबों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने का संकल्प लेता हो। कोई वैज्ञानिक ऐसी खोज करना चाहता हो, जिससे लोगों का जीवन आसान हो। कोई युवा अपने गांव में शिक्षा की स्थिति सुधारने का प्रयास करता हो।
हर व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए हर व्यक्ति का सपना भी अलग हो सकता है। जरूरी यह है कि हमारा जीवन केवल अपने लाभ तक सीमित न रहे और हमारे काम से दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव आए।
डॉ. कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि उनकी तस्वीर लगाने, उनके उद्धरण साझा करने या उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करने भर से नहीं दी जा सकती। उनकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यह होगी कि हम उनके विचारों को अपने आचरण का हिस्सा बनाएं। हम दूसरों को आगे बढ़ने में मदद करें, युवाओं की प्रतिभा पर भरोसा करें और अपने आसपास ज्ञान तथा संवेदनशीलता का वातावरण तैयार करें।
सृजन पाल सिंह ने डॉ. कलाम के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए अंत में जिस सवाल को लोगों के सामने रखा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह सवाल केवल किसी महान व्यक्ति की याद में नहीं, बल्कि अपने जीवन का उद्देश्य खोजने के लिए है।आने वाली पीढ़ियां आपको किस रूप में याद रखें, यह आप तय कीजिए।
क्या आप चाहते हैं कि लोग आपको आपकी संपत्ति, पद और उपलब्धियों के लिए याद रखें? या आप चाहते हैं कि आपके जाने के बाद भी आपके विचार, आपके कर्म और आपके द्वारा बदली गई जिंदगियां लोगों को प्रेरित करती रहें?इस सवाल का उत्तर किसी दूसरे व्यक्ति के पास नहीं है। इसका उत्तर हमें स्वयं खोजना होगा।
यही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सबसे बड़ी सीख है। जीवन की सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि हमने अपने लिए क्या हासिल किया, बल्कि इस बात में भी है कि हमारे कारण दूसरों के जीवन में कितना उजाला आया।
आइए, हम अपने भीतर के शिक्षक को पहचानें। अपने परिवार, अपने समाज और अपने देश में अच्छी सोच का प्रसार करें। बच्चों को सपने देखने का अवसर दें और उन्हें उन सपनों को साकार करने के लिए आवश्यक ज्ञान, साहस और आत्मविश्वास प्रदान करें।
क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसके संसाधनों से नहीं, बल्कि उन लोगों से बनता है, जो दूसरों के भीतर संभावनाओं की रोशनी जगाते हैं।अब सवाल आपसे है। आप चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां आपको किस रूप में याद रखें?
सृजन पाल सिंह ‘कलाम’ डा एपीजे अब्दुल कलाम के सलाहकार टीम के सदस्य और उनकी पुस्तकों के सह-लेखक रहे हैं. वह कलाम से इतने प्रभावित हैं कि अपने नाम में ‘कलाम’ लगा लिया.यह लेख सृजन पाल सिंह ‘कलाम’ के अनुभवों पर आधारित है.