अब्दुल्लाह मंसूर
हर साल 14 फरवरी का दिन आता है और पूरी दुनिया लाल गुलाबों, कीमती तोहफों और इज़हार-ए-मोहब्बत के शोर में डूब जाती है। मुमकिन है कि वैलेंटाइन डे पूँजीवाद के गर्भ से जन्मा एक बाजारी त्योहार हो, जहाँ भावनाएं समझी कम और बेची ज्यादा जाती हैं। लेकिन भारत जैसे देश के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में, मैं वैलेंटाइन डे का समर्थन करता हूँ। मेरा समर्थन बाज़ार के लिए नहीं, बल्कि उस वैचारिक हथियार के लिए है जो हमारी उन दकियानूसी परंपराओं और संस्कृति से लड़ने की ताकत देता है जो राधा-कृष्ण, राम-सीता और शिव-पार्वती जैसे प्रेमी जोड़ों की पूजा तो कराती हैं, पर असल ज़िंदगी में प्रेम करने पर कड़े प्रतिबंध लगाती हैं।
भारतीय समाज में प्रेम को सबसे बड़ा खतरा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह हज़ारों सालों से चली आ रही कठोर जातीय संरचना को पल भर में ध्वस्त करने की ताकत रखता है। यही कारण है कि प्रेमी जोड़ों को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की सजा अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ती है।
'ऑनर किलिंग' जैसी घटनाएं हमारे समाज के माथे पर वह कलंक हैं, जो चीख-चीख कर कहती हैं कि यहाँ परिवार की तथाकथित 'मर्यादा' और 'कुल की इज्जत' इंसान के चुनाव के मौलिक अधिकार से बड़ी है। यह उस संस्कृति को चुनौती है जहाँ आपका विवाह एक अजनबी से तय कर दिया जाता है और उसे 'संस्कार' का नाम दिया जाता है, लेकिन जहाँ दो रूहें अपनी मर्जी से जुड़ना चाहती हैं, उसे 'अपराध' करार दिया जाता है। इस घुटन भरी परंपरा से लड़ने के लिए हमें किसी न किसी प्रतीक की जरूरत है, फिर वह वैलेंटाइन डे ही क्यों न हो।
रूमी की नसीहत और सामाजिक बाधाएं
प्रेम एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ जाति और धर्म के खांचे बेमानी हो जाते हैं। भारत की सबसे बड़ी विडंबना 'जाति व्यवस्था' जितनी सहजता से प्रेम के कारण टूट सकती है, उतनी शिक्षा या केवल चेतना के जरिए नहीं टूट पाई। महान सूफी संत रूमी ने सदियों पहले एक ऐसी बात कही थी जो आज के दौर में बेहद जरूरी है।
रूमी ने कहा था "तुम्हारा काम प्यार को ढूंढना नहीं है, बल्कि अपने अंदर उन सभी रुकावटों को खोजना और पहचानना है जो तुमने प्यार के खिलाफ खड़ी कर रखी हैं।" भारत के संदर्भ में ये रुकावटें केवल व्यक्तिगत डर नहीं हैं, बल्कि 'जाति', 'गोत्र', 'नस्ल' और 'झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा' के वे पत्थर हैं जो प्यार के झरने को बहने से रोकते हैं।

हम एक ऐसे दोहरेपन में जी रहे हैं जहाँ हमें यूरोप और अमेरिका जैसी आधुनिक सुविधाएं तो चाहिए, लेकिन अपने समाज में उनके जैसी प्रेम की संस्कृति से हमें परहेज है। हमारे भीतर प्रेम के प्रति एक अजीब किस्म की असहजता है, जो अक्सर हिंसक विरोध में बदल जाती है। वैलेंटाइन डे की सार्थकता इसी में है कि उन आंतरिक और सामाजिक दीवारों को ढहाया जाए।
मोहब्बत के इस क्रांतिकारी पहलू को अगर हम आधुनिक विज्ञान की नजर से देखें, तो मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट स्टर्नबर्ग का "त्रिकोणीय प्यार सिद्धांत" इसमें एक तार्किक गहराई जोड़ता है। स्टर्नबर्ग के अनुसार, किसी भी मुकम्मल रिश्ते के लिए आत्मीयता, जुनून और प्रतिबद्धता का होना जरूरी है। आत्मीयता वह 'कुर्बत' है जहाँ दो इंसान बिना किसी नकाब और सामाजिक पहचान के एक-दूसरे से मिलते हैं।
जुनून वह 'जोश' है जो दो लोगों को करीब लाता है, और प्रतिबद्धता वह 'वादा' है जो हर सामाजिक दबाव के बावजूद साथ खड़े रहने का हौसला देता है। आज के दौर में दिक्कत यह है कि समाज अक्सर सिर्फ 'प्रतिबद्धता' का बोझ डालता है वह भी उस इंसान के साथ जिसे आपने चुना ही नहीं।
बिना आत्मीयता और बिना पसंद के थोपा गया रिश्ता प्यार नहीं, बल्कि एक समझौता है। सच्चा प्यार हमें "मैं" के तंग दायरे से निकालकर "हम" की विशालता में ले जाता है, जहाँ जाति, रंग और वर्ग की सीमाएं बेमानी हो जाती हैं। प्यार की यह प्रक्रिया हमें एक ऐसा रिश्ता बनाने की हिम्मत देती है जहाँ हम खुशी-गम साझा करते हैं और साथ मिलकर उन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ खड़े होते हैं जो हमें बांटती हैं।

प्रेम: एक सामाजिक इंकलाब
उर्दू अदब और हमारी लोक कथाओं में 'आशिक' का मकाम हमेशा ऊँचा रहा है, क्योंकि आशिक वह है जिसने अपने भीतर के डर को मारकर मोहब्बत की शमा रोशन की है। मीरा ने कृष्ण के लिए,रांझा ने हीर के लिए अपनी पहचान छोड़ दी क्योंकि उसने समाज की कृत्रिम मर्यादाओं के ऊपर दिल की पुकार को रखा।
आज के दौर में भी जो प्रेमी जोड़ा जाति और धर्म की परवाह किए बिना एक-दूसरे का हाथ थामता है, वह किसी रांझा या मजनू से कम नहीं है। विशेष रूप से, प्रेम करती स्त्री तो इस पितृसत्तात्मक समाज से कत्तई सहन नहीं होती। जब एक औरत प्रेम करती है, तो वह सबसे पहले उस गुलामी को तोड़ती है जो उसे 'संपत्ति' की तरह देखती है।
मेरा मानना है कि प्यार करना एक राजनीतिक कार्य भी है। जब दो लोग जाति के बंधनों को तोड़कर साथ आते हैं, तो वे भारत के लोकतंत्र को उसकी जड़ों से मजबूत करते हैं। भारत में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह महज व्यक्तिगत फैसले नहीं हैं, बल्कि ये एक सामाजिक इंकलाब की शुरुआत हैं।
हर ऐसा विवाह भेदभाव की दीवार से एक ईंट उखाड़ देता है। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने भी 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' में 'अंतरजातीय विवाह' को जातिवाद खत्म करने का सबसे बड़ा और वास्तविक उपाय बताया था। ताजा आंकड़े बताते हैं कि ऐसे विवाहों का ग्राफ बढ़ रहा है, लेकिन आज भी असली ज़रूरत मज़बूत क़ानूनी सुरक्षा और सामाजिक स्वीकार्यता की है।
वैलेंटाइन डे केवल चॉकलेटी बातों या लाल गुलाबों का दिन नहीं है, बल्कि यह 'राइट टू चॉइस' (चुनाव की स्वतंत्रता) का उत्सव है। यह उस सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है जो हमें सिखाती है कि हमारी भावनाएं हमारे परिवार की 'नाक' के अधीन होनी चाहिए। प्रेम हमेशा समाज के लिए एक बहुत बड़ा प्रतिरोध होता है। यह वह स्रोत है जो मनुष्य में स्वतंत्रता और सहकारिता की चेतना विकसित करता है। प्रेम जब आता है मनुष्य के जीवन में तो जाति से लेकर लैंगिक भेदभाव और वर्गीय ढाँचे को भी धता बता देता है।

समाज में प्रेम ही वो प्रक्रिया है जो मनुष्य के स्वतंत्रता और सहकारिता के जीवन जीने की चेतना को विकसित करता है। साथ ही जाति, नस्ल और जेंडर जैसे जटिल भेदभाव को खत्म करता है। प्रेम हमें प्रकृति से प्रेम करना भी सिखाता है जिससे जुड़कर हम प्रकृति की बनायी हर शय से प्रेम करते हैं उसमें खूबसूरती देखते हैं और तमाम तरह की सामाजिक धारणाओं, कुंठाओं और पूर्वाग्रहों से मुक्ति मिलती है। रूमी कहते हैं "इश्क वो पुल है, जो तेरे और कायनात की हर शय के दरमियान है।"
( अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)