‘रौनक-ए-रमजान’ में छलका सलमान अली का दर्द, मेवात की मिट्टी को बताया अपनी ताकत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-03-2026
Salman Ali narrated the spiritual story of Mewat on Sana Khan's show.
Salman Ali narrated the spiritual story of Mewat on Sana Khan's show.

 

आवाज द वाॅयस / नूंह ( हरियाणा) 

रमजान का महीना आते ही हर इलाके की अपनी एक खास रौनक होती है, लेकिन हरियाणा के मेवात की फिजा कुछ अलग ही सुकून बिखेरती है। यहां की सादगी, अपनापन और रूहानी माहौल ऐसा है, जो बड़े शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में शायद ही कहीं महसूस होता हो। यही वजह है कि मशहूर युवा गायक सलमान अली जब भी रमजान की बात करते हैं, तो उनकी यादों का रुख अपने पैतृक वतन मेवात की ओर ही मुड़ जाता है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

A post shared by Sufiyan (@mr_sufiyan0711)

 
हाल ही में सना खान के आध्यात्मिक शो ‘रौनक-ए-रमजान’ में शिरकत करते हुए सलमान अली ने मेवात में बिताए अपने रमजान के दिनों को याद किया। फिल्म जगत से दूरी बनाकर आध्यात्मिक राह अपनाने वाली सना खान इस कार्यक्रम की मेजबानी अपने पति मुफ्ती सैयद अनस के साथ कर रही हैं। यह इस कार्यक्रम का दूसरा साल है और इसे दर्शकों का खासा प्यार मिल रहा है। हाल के एपिसोड्स में कई जानी-मानी हस्तियां शामिल हो चुकी हैं।
 
 
कार्यक्रम के दौरान सलमान अली ने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि उनकी असली पहचान मेवात की मिट्टी से जुड़ी है। उनके अनुसार, मेवात में रमजान सिर्फ एक धार्मिक महीना नहीं होता, बल्कि पूरा इलाका इबादत और आध्यात्मिकता में डूब जाता है। सहरी से पहले ही गांव की गलियों में हलचल शुरू हो जाती है। घरों में रोशनी जगमगाने लगती है। मस्जिदों से अजान की आवाजें एक के बाद एक गूंजती हैं। एक मस्जिद की अजान दूसरी मस्जिद की अजान से मिलती है और ऐसा लगता है जैसे पूरा इलाका अल्लाह के जिक्र में खो गया हो।
 
 
 
उन्होंने बताया कि मेवात में इफ्तार का समय भी बेहद खास होता है। मस्जिदों में बड़े-बड़े दस्तरख्वान बिछाए जाते हैं। हर घर से कुछ न कुछ इफ्तार के लिए भेजा जाता है। कोई शरबत लाता है, कोई फल, तो कोई पकवान। अमीर और गरीब सब एक साथ बैठते हैं। किसी तरह का भेदभाव नहीं होता। यही भाईचारा मेवात की असली पहचान है। सलमान अली ने कहा कि शहरों में अक्सर लोग अपने-अपने दायरों में सीमित रहते हैं, लेकिन मेवात में रमजान लोगों को और करीब ले आता है।
 
 
 
मेवात की सादगी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यहां के लोग दीन से गहराई से जुड़े हुए हैं। रमजान में कुरान की तिलावत हर तरफ सुनाई देती है। युवा और बुजुर्ग मस्जिदों में जमात के साथ नमाज अदा करते हैं। तरावीह में कुरान सुनने का अलग ही उत्साह होता है। उन्होंने अपने बचपन की याद साझा करते हुए बताया कि वे सहरी के वक्त लोगों को जगाने में बड़ा शौक महसूस करते थे। वे लम्हे आज भी उनके दिल के बेहद करीब हैं।
 
सलमान अली का मानना है कि मेवात सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि एक प्रशिक्षण केंद्र है। यहीं उन्होंने नैतिकता, पारिवारिक मूल्य और धर्म की बुनियादी सीख हासिल की। उन्होंने कहा कि उनकी कामयाबी के पीछे उनके माता-पिता की दुआएं और मेवात का माहौल है। वहां लोग धार्मिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। नमाज के बाद धार्मिक बातें सुनने के लिए रुकना आम बात है। बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है और युवाओं को दीन की राह पर चलने की प्रेरणा दी जाती है।
 
 
 
जब कार्यक्रम के दौरान सना खान ने उनसे अल्लाह से उनके रिश्ते के बारे में सवाल किया, तो सलमान अली बेहद भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि उन्होंने अल्लाह से जो मांगा, उन्हें वही मिला। उन्होंने अपने पिता की नसीहत का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पापा ने हमेशा सच्ची नीयत और ईमानदारी से काम करने की सीख दी। उन्होंने बताया कि उनके दिल में हमेशा यह ख्वाहिश रही कि अल्लाह उन्हें अपने घर बुलाए।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

A post shared by Sufiyan (@mr_sufiyan0711)

 
उन्होंने अपने उस पल को याद करते हुए कहा कि जब वे पहली बार खाना-ए-काबा के सामने पहुंचे, तो वे सब कुछ भूल गए। जैसे ही उन्होंने नजर उठाई, उन्हें महसूस हुआ कि यही उनकी असल दुनिया है। उस क्षण उन्हें एहसास हुआ कि दुनियावी शोहरत और सफलता सब अस्थायी हैं, असली सुकून अल्लाह से रिश्ते में है।
 
 
 
कार्यक्रम के अंत में सलमान अली ने युवाओं को खास नसीहत दी। उन्होंने कहा कि दौलत और शोहरत जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। असली कामयाबी दिल के सुकून में है। दीन, नैतिकता और माता-पिता की इज्जत ही इंसान को सही मुकाम तक पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि अगर इंसान अपनी नीयत साफ रखे और मेहनत के साथ अल्लाह पर भरोसा करे, तो रास्ते खुद-ब-खुद आसान हो जाते हैं।
 

मेवात के रमजान की चर्चा करते हुए सलमान अली की आवाज में जो अपनापन और भावनाएं थीं, उन्होंने यह साबित कर दिया कि अपनी जड़ों से जुड़ाव ही इंसान को मजबूत बनाता है। मेवात की सादगी और भाईचारा आज भी उनके दिल में बसता है। शायद यही वजह है कि वे हर साल कोशिश करते हैं कि रमजान का कुछ हिस्सा अपने वतन में जरूर गुजारें, ताकि उसी रूहानी माहौल को फिर से जी सकें। यह कहानी सिर्फ एक गायक की यादों की नहीं है, बल्कि उस संस्कृति की झलक है जहां सादगी, आध्यात्मिकता और इंसानियत साथ-साथ चलती हैं।