रूसी तेल, अमेरिकी टैरिफ और BRICS के बीच भारत की बड़ी चुनौती

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 19-09-2026
India's major challenge amidst Russian oil, US tariffs, and BRICS.
India's major challenge amidst Russian oil, US tariffs, and BRICS.

 

राजजीव नारायण

ब्रिक्स (BRICS) ने हाल ही में यह साबित कर दिया है कि तीव्र मतभेदों और परस्पर-विरोधी हितों के बावजूद भी देश एक साझा मंच ढूंढ सकते हैं। लेकिन वाशिंगटन का नया रूस-प्रतिबंध विधेयक एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: आने वाले समय में देशों के पास अपनी स्वतंत्र आर्थिक और विदेश नीति चुनने के लिए आखिर कितनी गुंजाइश बचेगी?

इस पूरे घटनाक्रम का समय थोड़ा संदिग्ध जरूर है, लेकिन इससे कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिर भी, यह एक ऐसा सवाल ज़रूर खड़ा करता है जिस पर गहराई से सोचने की ज़रूरत है: ब्रिक्स का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन अभी खत्म ही हुआ था कि एक नया भू-राजनीतिक झटका महसूस किया गया।

11 सदस्यीय इस समूह ने अपने सम्मेलन का समापन एक ऐसी घोषणापत्र के साथ किया जो किसी भी मायने में मामूली नहीं थी: सर्वसम्मति से अपनाया गया एक संयुक्त घोषणापत्र। भारत ने ऐसे देशों को एक साथ लाया जो आमतौर पर बहुत सी बातों पर सहमत नहीं होते,जैसे भारत और चीन, रूस और पश्चिमी देश और ऐसे राष्ट्र भी जिनका दुनिया को नया रूप दे रहे युद्धों और संकटों पर बिल्कुल अलग नजरिया है।

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यह घोषणापत्र केवल अपनी बातों के कारण ही खास नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रतीक था कि 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देश) आत्मविश्वास के साथ एक ऐसी दुनिया में अपने लिए अधिक जगह बनाने की कोशिश कर रहा है जहाँ आज भी पारंपरिक शक्तियों का दबदबा है। इसमें एकतरफा शुल्क (टैरिफ) और प्रतिबंधों विशेषकर द्वितीयक प्रतिबंधों (secondary sanctions) पर भी खुलकर आपत्ति जताई गई थी।

ठीक कुछ ही दिनों बाद, वाशिंगटन अपना खुद का फैसला लेकर आ गया। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (US House of Representatives) ने एक ऐसा कानून पारित किया है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक सीमा शुल्क लगाने का अधिकार देता है जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं। सीनेट से पास होने के बाद यह विधेयक अब राष्ट्रपति के पास पहुँच चुका है। भारत और चीन उन प्रमुख देशों में शामिल हैं जो इससे सीधे प्रभावित हो सकते हैं।

घटनाक्रम का यह समय ध्यान खींचने वाला ज़रूर है, लेकिन समय का मिल जाना ही कारण नहीं होता। यह दावा करने की आवश्यकता नहीं है कि एक घटना ने ही दूसरी को जन्म दिया। हालाँकि, ये दोनों घटनाक्रम बदलती दुनिया की तस्वीर ज़रूर दिखाते हैं: एक तरफ देश अपनी आर्थिक नीतियाँ चुनने की आजादी चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़ी शक्तियाँ उन फैसलों को प्रभावित करने के लिए आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही हैं।

ऊर्जा का धर्मसंकट (The Oil Dilemma)

भारत के लिए यह भू-राजनीति पर कोई केवल सैद्धांतिक बहस नहीं है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। रूसी कच्चा तेल भारत के लिए एक पसंदीदा विकल्प इसलिए बना क्योंकि वह आकर्षक कीमतों पर उपलब्ध था, जिससे भारत को अपनी लागत कम करने और भारतीय उपभोक्ताओं को वैश्विक ऊर्जा बाज़ार के उतार-चढ़ाव से बचाने में मदद मिली। यह मास्को के साथ कोई स्थायी दोस्ती का ऐलान नहीं है; यह शुद्ध रूप से 'ऊर्जा अर्थशास्त्र' (Energy Economics) है।

भारत मध्य पूर्व, अमेरिका और अन्य स्रोतों से भी तेल खरीदता है। उसकी ऊर्जा रणनीति कभी भी किसी एक देश पर निर्भर नहीं रही। लेकिन अगर रूसी कच्चा तेल खरीदना अमेरिका को भारतीय निर्यात पर दंडात्मक शुल्क लगाने का आधार बनता है, तो मामला बिल्कुल बदल जाता है।

क्योंकि फिर सवाल सिर्फ यह नहीं रहता कि भारत तेल कहाँ से खरीदता है, बल्कि असर इस बात पर भी पड़ने लगता है कि भारत बाकी दुनिया को क्या बेच सकता है। यही द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanction) का मुख्य सार है: इसका दबाव केवल उस देश तक सीमित नहीं रहता जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है, बल्कि यह उन देशों तक भी पहुँचता है जो उसके साथ व्यापार कर रहे हैं।

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के इस विधेयक का मतलब यह नहीं है कि भारत पर सीधे ही 100प्रतिशत सीमा शुल्क लागू हो गया है। यह राष्ट्रपति ट्रंप को इस हद तक शुल्क लगाने का 'अधिकार' देता है।

कानून होना और उसका लागू होना इन दोनों का फर्क मायने रखता है। उतना ही मायने यह अनिश्चितता भी रखती है कि इस अधिकार का इस्तेमाल कब, कैसे और किसके खिलाफ किया जाएगा। लेकिन अमेरिका का संदेश बिल्कुल साफ है।

व्यापक प्रभाव (The Ripple Effect)

यहाँ आकर यह मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों से भी कहीं बड़ा रूप ले लेता है। आर्थिक प्रतिबंध पारंपरिक रूप से एक ऐसा हथियार रहे हैं जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से उसी देश को दंडित करने के लिए किया जाता था जिस पर वे लगाए गए हैं।

लेकिन हाल के दिनों में, इसके प्रभाव पूरी वैश्विक व्यापार प्रणाली में फैलते दिख रहे हैं। अब कोई बैंक किसी सौदे के लिए पैसा देने में हिचकिचा सकता है। कोई बीमा कंपनी किसी माल को भेजने में जोखिम महसूस कर सकती है।

कोई कंपनी अपने सप्लायर को बदलने पर विचार कर सकती है। और कोई देश किसी वस्तु की खरीदारी करते समय सिर्फ व्यावसायिक लाभ ही नहीं, बल्कि इस बात का भी हिसाब लगाने लग सकता है कि कहीं अमेरिका को इस पर कोई आपत्ति तो नहीं होगी।

इसका नतीजा? एक ऐसी दुनिया जहाँ रोज़मर्रा के लेन-देन और व्यापार में भी भू-राजनीतिक जोखिमों को जोड़कर देखा जाने लगा है। इसके परिणाम रूस से कहीं आगे तक जाते हैं। यदि देशों को यह लगने लगे कि एक बड़ी शक्ति के साथ व्यापार करने से दूसरी बड़ी शक्ति के साथ उनके व्यापार पर असर पड़ेगा, तो वे स्वाभाविक रूप से विकल्पों की तलाश शुरू कर देंगे—वैकल्पिक सप्लायर, वैकल्पिक बाज़ार, भुगतान के वैकल्पिक तरीके और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाएँ।

इसी तरह आर्थिक विखंडन (Economic Fragmentation) की शुरुआत होती है। इसके लिए किसी ढोल-नगाड़े या औपचारिक घोषणा की ज़रूरत नहीं होती कि पुरानी व्यवस्था खत्म हो चुकी है। यह प्रक्रिया बहुत खामोशी से, एक-एक सौदे के साथ आगे बढ़ती है।

स्वायत्तता का महत्व (Autonomy Matters)

यही वजह है कि भारत का 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) का पुराना सिद्धांत अब केवल कूटनीतिक भाषा नहीं, बल्कि एक तरह का 'आर्थिक बीमा' नज़र आता है। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब अमेरिका के बजाय रूस को चुनना नहीं है। और न ही इसका मतलब पश्चिमी देशों के बजाय ब्रिक्स का पक्ष लेना है। इसका सीधा सा मतलब है—दोनों के साथ अपने संबंध और तालमेल बनाए रखने की क्षमता कायम रखना।

अमेरिका के साथ भारत के कई बेहद महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं व्यापार, तकनीक, निवेश, रक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र। रूस के साथ उसके पुराने और गहरे संबंध हैं। खाड़ी देशों के साथ उसका एक बेहद महत्वपूर्ण रिश्ता है। यूरोप, अफ्रीका और व्यापक ग्लोबल साउथ में भी उसके अपने हित हैं। और इसके साथ ही वह ब्रिक्स को और अधिक प्रासंगिक बनाने का प्रयास भी कर रहा है। यह जटिलता कोई विदेश नीति की विफलता या शर्मिंदगी नहीं है। यह भारत की व्यावहारिक वास्तविकता है।

प्रतिस्पर्धी शक्ति-केंद्रों वाली इस दुनिया में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने का मतलब यही है कि आप किसी एक रिश्ते के दबाव में आए बिना कई अन्य रिश्ते कायम रख सकें। इसका दूसरा विकल्प एक ऐसी दुनिया होगी जहाँ रणनीतिक फैसले नई दिल्ली में नहीं, बल्कि कहीं और लिए गए फैसलों के आर्थिक परिणामों से डरकर लिए जाएँगे। भारत ऐसा जोखिम कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।

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ब्रिक्स से भी आगे की बात (More Than BRICS)

इसका एक और बड़ा नतीजा भी सामने आ रहा है। अगर प्रतिबंध और सीमा शुल्क (टैरिफ) विदेशी नीतियों का हिस्सा बनते रहेंगे, तो देशों को किसी भी एक वित्तीय या व्यापारिक प्रणाली पर अपनी निर्भरता कम करने के रास्ते खोजने ही होंगे।

इसका मतलब हो सकता है: स्थानीय राष्ट्रीय मुद्राओं में अधिक व्यापार, क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) का विविधीकरण, नए भुगतान तंत्र और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच गहरा सहयोग।

इनमें से किसी भी बात का यह मतलब नहीं है कि अमेरिकी डॉलर रातों-रात गायब हो जाएगा, या ब्रिक्स पश्चिमी वित्तीय प्रणाली की जगह ले लेगा। ऐसे दावे करना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन जब भी आर्थिक निर्भरता को ही दबाव बनाने का जरिया बनाया जाएगा, तब-तब विकल्प तलाशने की यह चाहत और मजबूत होती जाएगी। और अंततः, यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा 'रिपल इफेक्ट' (तरंग प्रभाव) साबित हो सकता है।

दुनिया को अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका-विरोधी होने की आवश्यकता नहीं है। भारत के लिए इसका जवाब न तो टकराव में है और न ही घुटने टेकने में। इसका सही जवाब है,'विकल्प चुनने की आजादी'।

आज नई दिल्ली के सामने सवाल यह नहीं है कि वह वाशिंगटन या मास्को, ब्रिक्स या पश्चिम में से किसे चुने। सवाल यह है कि आज की इस व्यावहारिक और सौदेबाज़ी वाली दुनिया में, क्या भारत 'न चुनने की अपनी आजादी' को बरकरार रख सकता है?

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