फिल्मों से नफरत को काटने की कोशिशें

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 05-10-2026
Attempts to cut out hatred through films
Attempts to cut out hatred through films

 

gहरजिंदर

आज के दौर की सही तस्वीर सिर्फ अखबारों और कहानियों में ही नहीं मिलती वह फिल्मों में भी मिलती है। कहानियां अक्सर उस समाज का आईना भी होती हैं जहां उन्हें बनाया जाता है। कोई समाज है, कैसे चल रहा है और कैसे आगे बढ़ रहा है इसे आप फिल्मों से भी बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं। और फिल्मों के जरिये ये सच दुनिया को समझा भी सकते हैं।

दो साल पहले कुछ फिल्मकारों ने एक बीड़ा उठाया और दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि मुस्लिम समाज को लेकर दुनिया भर में किस तरह से फिल्में बन रही हैं। इसके लिए लंदन में एक मुस्लिम फिल्म फैस्टिवल किया गया। इसमें मुस्लिम देशों के फिल्मकारों ने ही नहीं उन फिल्मकारों ने भी हिस्सा लिया जो अन्य देशों के हैं और उनकी फिल्म की विषयवस्तु मुस्लिम समाज से जुड़ी हुई है।

इस साल जुलाई महीने फिर वहीं एक ज्यादा संगठित रूप से एक चार दिन का मुस्लिम फिल्म फेस्टिवल हुआ। इस  फैस्टिवल को ज्यादा रिव्यू भी मिले और मीडिया वगैरह में काफी तारीफ भी। आयोजक अपने इस मकसद में कामयाब भी रहे कि मुस्लिम फिल्कारों और मुस्लिम समाज के पास भी कहानियां हैं जो किसी से कम भी नहीं हैं।

अब इसी सिलसिले को दुनिया के कुछ और हिस्सों में फैलाने की कोशिश हो रही है।इसी महीने न्यूयाॅर्क में एक एक मुस्लिम फिल्म फैस्टिवल कर आयोजन हो रहा है। अमेरिका के इस पहले मुस्लिम फिल्म फेस्टिवल को नाम दिया गया है - न्यूयाॅर्क मुस्लिम फिल्म फैस्टिवल।

dd

इस फैस्टिवल की आयोजक नवल मुबीन का कहना है कि मुस्लिम समाज में विभिन्नता है, मानवता है और कहानियों की स्मृद्धि है, हम इसी स्मृद्धि का उत्सव मनाना चाहते हैं।मुबीन दिसंबर से ही इसकी तैयारी कर रही हैं।

अलेक्स मुर्डाक, द मोमेंट और अनकनविक्टेड जैसी हाॅलीवुड फिल्मों के निर्माण से जुड़ी रहीं मुबीन कहती हैं कि हम अमेरिका को यह बताना चाहते हैं कि मुस्लिम समाज सिर्फ एक कहानी नहीं है।

इस फेस्टिवल के कला निदेशक हसन बाबर का कहना है कि हम अमेरिका के लोगों के उनकी सोच के लिए कोई जवाबी कहानियां नहीं दिखाने जा रहे, हम उन्हें बस एक दूसरी दुनिया दिखा रहे हैं।

लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका में और खासकर पश्चिमी समाज में इन दिनों जिस तरह की नफरत और इस्लामफोबिया दिख रहा है उस माहौल में ऐसी फिल्में या ऐसे फेस्टिवल क्या भूमिका निभाने वाले हैं?

फिल्में निश्चित तौर पर एक भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन जिस तरह से नफरत का माहौल है और वह लगातार बढ़ रहा है, उसमें सिर्फ फिल्मों के भरोसे ही नहीं रहा जा सकता। खासकर तब जब उसे कम करने में समाज लगातार नाकाम हो रहा हो और राजनीति उसे लगातार बढ़ा रही हो।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


ALSO READ हिंसक समाज में अमन की बात