मुबश्शिर अली ज़ैदी
अगर आपके शहर में आसमान से विस्फोटकों से भरी एक बस गिर जाए तो कितना नुकसान होगा? इसका अंदाज़ा लगाने की कोशिश करें। इज़राइल और ईरान की जंग में आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है। दोनों देश एक-दूसरे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग रहे हैं। अमेरिका भी इस युद्ध में शामिल है। सोशल मीडिया पर बैठे और युद्ध के जुनून में डूबे लोगों को इस तबाही की गंभीरता का सही अंदाज़ा नहीं है, क्योंकि अफवाहों, फेक न्यूज़ और मीम्स की भरमार है।
बैलिस्टिक मिसाइलें आमतौर पर 10से 15मीटर लंबी होती हैं और उनका वजन कई टन होता है। फायर करने के बाद रास्ते में इसके कुछ हिस्से गिर जाते हैं और लक्ष्य तक केवल वारहेड पहुंचता है, जो लगभग 2मीटर लंबा और 1मीटर व्यास का हो सकता है। इसमें सैकड़ों से लेकर हजार किलो तक विस्फोटक सामग्री होती है। कुछ आधुनिक मिसाइलें एक से अधिक वारहेड ले जा सकती हैं, जो अलग-अलग स्थानों को निशाना बना सकती हैं।

इस लड़ाई को मिसाइलों की जंग कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मिसाइलें छोड़ी भी जा रही हैं और रोकी भी जा रही हैं। इज़राइल का आयरन डोम सिस्टम काफी प्रसिद्ध है, हालांकि यह मुख्यतः लेबनान और गाज़ा से आने वाले छोटे रॉकेट, मोर्टार और ड्रोन को रोकने के लिए है। “डेविड्स स्लिंग” मध्यम दूरी के खतरों के लिए उपयोग होता है, जबकि “एरो-2” और “एरो-3” सिस्टम लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने की कोशिश करते हैं।
अरब देश अमेरिकी सहायता पर अधिक निर्भर हैं, जिनके “पैट्रियट” और “थाड” सिस्टम ईरानी मिसाइलों और ड्रोन से सुरक्षा प्रदान करते हैं। ईरान का रक्षा तंत्र उतना उन्नत नहीं है, इसलिए वहां अधिक नुकसान हो रहा है। उसके पास स्थानीय “अरमान” और “खोरदाद” सिस्टम हैं, लेकिन वे इज़राइल जितने प्रभावी नहीं हैं। वैसे भी कोई भी रक्षा प्रणाली सौ प्रतिशत सुरक्षा नहीं दे सकती, खासकर तब जब एक साथ कई मिसाइलें या ड्रोन दागे जाएं।
क्लस्टर मिसाइलें भी बहुत खतरनाक होती हैं, जिनमें एक बड़े बम की जगह कई छोटे बम होते हैं जो अलग-अलग जगहों पर फटते हैं और बड़े क्षेत्र को प्रभावित करते हैं।युद्ध के दौरान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका भी जताई जाती है। इस संघर्ष में भी ऐसी आशंकाएं सामने आई हैं। अगर परमाणु वारहेड वाली मिसाइल को बीच में रोक लिया जाए, तो आमतौर पर परमाणु विस्फोट नहीं होता, क्योंकि इसके लिए विशेष परिस्थितियों की जरूरत होती है। हालांकि रेडियोधर्मी पदार्थ के फैलने का खतरा बना रहता है।

इस युद्ध में एक अफवाह यह भी फैली है कि हर व्यक्ति के शरीर का तापमान अलग होता है और उसे रिकॉर्ड करके मिसाइल या ड्रोन से निशाना बनाया जा सकता है। यह सही नहीं है। तकनीक अभी इतनी विकसित नहीं हुई है। हालांकि यह सच है कि इंसानों, जानवरों और पौधों से भी कुछ हद तक गर्मी निकलती है, जिसे थर्मल कैमरों से देखा जा सकता है। लेकिन इससे किसी व्यक्ति की पहचान अलग से नहीं की जा सकती।
इज़राइल लंबे समय से अपने विरोधियों को निशाना बनाता रहा है। इसके लिए वह जटिल निगरानी प्रणाली का उपयोग करता है, जिसमें मानव खुफिया, जासूसी उपग्रह, चेहरे की पहचान करने वाले कैमरे, मोबाइल सिग्नल और अब एआई भी शामिल हैं।
यह कोई रहस्य नहीं कि इज़राइली खुफिया एजेंसियां ईरान के भीतर तक पहुंच बना चुकी हैं। उन्हें यह जानकारी मिलती रहती है कि कौन कहां है और कहां जा रहा है। मोबाइल और इंटरनेट ट्रैकिंग से यह काम और आसान हो जाता है। ड्रोन और सैटेलाइट से रियल टाइम जानकारी मिलती है, जिससे सही समय पर हमला संभव होता है।
2020 में तेहरान में परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीज़ादे की हत्या रिमोट कंट्रोल मशीन गन से की गई थी। यह काम केवल सटीक जानकारी के आधार पर ही संभव था। कासिम सुलेमानी, इस्माइल हानिया और अन्य नेताओं को भी इसी तरह निशाना बनाया गया।

अमेरिका ने भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में वर्षों तक ड्रोन हमले किए, जिसमें MQ-9रीपर ड्रोन का इस्तेमाल हुआ। ये ड्रोन घंटों उड़ान भर सकते हैं और मौका मिलने पर मिसाइल दाग सकते हैं। लेकिन कई बार गलतियां भी हुईं, क्योंकि खुफिया जानकारी हमेशा सटीक नहीं होती।आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ा हथियार मिसाइल या ड्रोन नहीं, बल्कि सही जानकारी है। जिस पक्ष के पास बेहतर जानकारी होती है और जो सही समय पर निर्णय लेता है, वही आगे बढ़ता है।
( लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)