~अब्दुल्लाह मंसूर
वेनेजुएला आज दुनिया के नक्शे पर सिर्फ एक मुल्क नहीं, बल्कि ताकतवर साम्राज्यवादी ताकतों और एक देश की संप्रभुता के बीच चल रही जंग का मैदान बन चुका है। 3 जनवरी 2026 की सुबह जब अमेरिकी फौजों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके घर से गिरफ्तार किया, तो इसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसी मिसाल कायम कर दी, जो 21वीं सदी में 'जंगल राज' की याद दिलाती है। वेनेजुएला, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, आज अपनी इसी कुदरती दौलत की वजह से अमेरिका के निशाने पर है।
हालांकि अमेरिका मादुरो पर ड्रग तस्करी, मानवाधिकार उल्लंघन और चुनावी धांधली जैसे गंभीर आरोप लगाता है, लेकिन इस पूरी कार्रवाई के पीछे का सच कुछ और ही नजर आता है। अमेरिकी अदालतों ने उन पर 'नार्को-टेररिज्म' के इल्जाम लगाए हैं, जिसे आधार बनाकर न्यूयॉर्क की अदालत में मुकदमा चलाने की तैयारी है। लेकिन हकीकत में, यह अंतरराष्ट्रीय कानून की उन धज्जियां उड़ाने जैसा है जिसकी कसम अक्सर पश्चिमी मुल्क खाते रहते हैं। यह संकट सिर्फ एक सियासी नाकामी नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी आर्थिक घेराबंदी का नतीजा है। इसी रणनीति के तहत वेनेजुएला की एक विपक्षी नेता को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया, ताकि दुनिया की नजर में अमेरिका के हस्तक्षेप को "लोकतंत्र की बहाली" के रूप में पेश कर उसे नैतिक वैधता दी जा सके। असल में, यह उस प्रोपगेंडा का हिस्सा है जिसका एकमात्र मकसद वेनेजुएला के तेल भंडारों को अमेरिकी कंपनियों के हाथों बेचना है।
तेल पर कब्जे के लिए गढ़ा गया नया साम्राज्यवादी दर्शन
वेनेजुएला पर इस अमेरिकी हमले की बुनियाद 200 साल पुराने 'मुनरो सिद्धांत' में छिपी है, जिसे वर्तमान अमेरिकी हुकूमत ने "डॉन-रो सिद्धांत" (Don-roe Doctrine) का नया नाम दिया है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि पुराने अमेरिकी रवैये की एक हिंसक कड़ी है, जिसके तहत अमेरिका खुद को पूरे इलाके का 'थानेदार' समझता आया है। तारीख गवाह है कि पिछले 100 सालों में अमेरिका ने लैटिन अमेरिका के देशों में दर्जनों बार सरकारें गिराई या बदली हैं। आज ट्रंप प्रशासन का दावा है कि वेनेजुएला रूस और चीन जैसे "विदेशी दुश्मनों" का अड्डा बन गया था, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका चीन के उस प्रभाव को खत्म करना चाहता है जो उसने कर्ज के बदले तेल के जरिए हासिल किया था।
यह एक किस्म की "सीधी चोरी" है। अमेरिका का खुला मकसद वहां के तेल के कुओं पर शेवरॉन जैसी अपनी बड़ी कंपनियों का कब्जा करवाना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा 1953 में ईरान और 2003 में इराक के साथ हुआ था जब भी किसी मुल्क ने अपनी दौलत पर खुद का हक जताया, उसे 'तानाशाह' कहकर उखाड़ फेंका गया।
यहाँ अमेरिका का दोहरा चेहरा साफ नजर आता है। वह एक ओर सऊदी अरब और कतर जैसे मुल्कों की राजशाही का समर्थन करता है, लेकिन वेनेजुएला में 'लोकतंत्र' को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। मादुरो पर करोड़ों डॉलर का ईनाम रखना और समंदर में जंगी जहाज तैनात करना एक सोची-समझी मनोवैज्ञानिक जंग है।
यह ऑपरेशन घरेलू मोर्चे पर ट्रंप की गिरती लोकप्रियता और 'एपस्टीन फाइल्स' जैसे बड़े घोटालों से जनता का ध्यान भटकाने का एक जरिया भी माना जा रहा है। 1997 की फिल्म 'वैग द डॉग' की तरह, यह सब अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए रचा गया एक राजनीतिक तमाशा मालूम पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून के चश्मे से देखें तो किसी भी देश की घरेलू अदालत को दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष पर मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है। अमेरिका का 'ड्रग कार्टेल' वाला तर्क भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि इराक युद्ध के समय 'विनाशकारी हथियारों' (WMD) के झूठे दावों की तरह इसका भी कोई ठोस वजूद साबित नहीं हो सका है। किसी दूसरे देश की फौज का आकर एक चुने हुए राष्ट्रपति को उठा ले जाना 'किडनैपिंग' और अंतरराष्ट्रीय चार्टर का खुला उल्लंघन है। पश्चिमी देश अक्सर 'नियम-आधारित व्यवस्था' की दुहाई देते हैं, लेकिन वेनेजुएला में उन्होंने इन तमाम नियमों को अपने पैरों तले रौंद दिया है।
आर्थिक घेराबंदी, जन प्रतिरोध और पड़ोसी देशों पर बढ़ता दबाव
अमेरिका ने वेनेजुएला पर 900 से ज्यादा पाबंदियां लगाकर उसे दुनिया के बैंकिंग सिस्टम से लगभग काट दिया है। यह कार्रवाई कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश को आर्थिक रूप से पंगु बनाने की साजिश है। ये पाबंदियां एक 'धीमे जहर' की तरह काम कर रही हैं, जिसने तेल उत्पादन को 35 लाख बैरल रोजाना से घटाकर सिर्फ 8 लाख पर ला दिया है। खाने-पीने की चीजों और दवाओं पर रोक लगाना वहां की जनता को 'सामूहिक सजा' देने जैसा है। यही वजह है कि आज वेनेजुएला की एक बड़ी आबादी पलायन करने पर मजबूर है। विडंबना देखिए, अमेरिका एक तरफ बमबारी और पाबंदियों से संकट पैदा करता है और दूसरी तरफ उन्हीं मजबूर शरणार्थियों को रोकने के लिए दीवार बनाता है।
लेकिन इस जुल्म के खिलाफ वेनेजुएला ने एक अनोखा रास्ता चुना है। मादुरो सरकार ने सिर्फ अपनी फौज के बजाय 80 लाख आम नागरिकों को हथियारबंद कर दिया है। यह 'कम्यून' मॉडल साम्राज्यवादी ताकतों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि अब जंग किसी वर्दीधारी सेना से नहीं, बल्कि हर गली और हर घर के जन-विरोध से है। अमेरिका का यह रवैया सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित नहीं है। उसने कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो को भी धमकी दी है और मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लोडिया शाइनबॉम पर 'कार्टेल' राज का आरोप लगाकर वहां हस्तक्षेप का बहाना ढूंढना शुरू कर दिया है। क्यूबा की बदहाली का मजाक उड़ाना भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जबकि उस बदहाली की असली वजह दशकों से लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध ही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत जैसे मुल्कों के लिए भी एक बड़ी परीक्षा खड़ी कर दी है। भारत 'ब्रिक्स' (BRICS) का हिस्सा है और उसकी अपनी एक स्वतंत्र विदेश नीति रही है। जहाँ रूस और चीन ने इस हमले की कड़ी निंदा की है, वहीं भारत की खामोशी या सिर्फ "चिंता" जताना उसकी साख पर सवाल खड़े कर सकता है। भारत के लिए यह मामला सिर्फ सस्ते तेल का नहीं, बल्कि अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को बचाने का है। अगर दुनिया इस गैर-कानूनी कब्जे पर चुप रहती है, तो 'ग्लोबल साउथ' की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। वेनेजुएला का यह संघर्ष आज दुनिया के हर उस छोटे मुल्क के लिए एक सबक है जो अपनी शर्तों पर जीना चाहता है। यह लड़ाई सिर्फ एक राष्ट्रपति की कुर्सी की नहीं है, बल्कि इस बात का फैसला है कि आने वाली दुनिया अंतरराष्ट्रीय कानूनों से चलेगी या फिर ताकत के नशे में चूर साम्राज्यवाद के नए सिद्धांतों से। वक्त आ गया है कि दुनिया के तमाम हाशिए के समाज और राष्ट्र इस लूट के खिलाफ एकजुट हों।
अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।
यह तस्वीर प्रतीकात्मक है (AI Generated)