अब्दुल्लाह मंसूर
दुनिया अभी इस खबर के सदमे से उबर भी नहीं पाई थी कि ईरान से आई एक सूचना ने वैश्विक राजनीति की पूरी धुरी को ही बदल कर रख दिया। संयुक्त सैन्य अभियानों अमेरिका के 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और इजराइल के 'ऑपरेशन लायंस रोर' के तहत ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई की हत्या कर दी गई है। यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि एक पूरे युग का अंत है, जिसने पिछले चार दशकों से न केवल ईरान, बल्कि पूरे मध्य पूर्व (West Asia) की राजनीति, मजहबी विमर्श और प्रतिरोध की परिभाषा को तय किया था।

इस हमले की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केवल खामेनेई ही नहीं, बल्कि ईरानी रक्षा तंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ सैय्यद अब्दुलरहीम मौसवी, रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह, रक्षा परिषद के सचिव अली शामखानी और IRGC के जमीनी बलों के कमांडर मोहम्मद पाकपुर भी मारे गए हैं।
इजराइल ने करीब 200 अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों और 1200 से अधिक मिसाइलों के साथ ईरान के 31 में से 24 प्रांतों पर जो भीषण हमला बोला, उसने न केवल ईरान के परमाणु ठिकानों को मलबे में तब्दील कर दिया। यह लेख सिर्फ एक सैन्य हमले की रिपोर्ट नहीं, बल्कि खामेनेई के बाद पैदा हुए रणनीतिक शून्य का विश्लेषण है।
इसमें हम पड़ताल करेंगे कि क्या ईरान में पश्चिमी देशों का 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) का सपना सफल होगा, या देश अब पूरी तरह IRGC जैसी सैन्य शक्ति के कब्जे में जा चुका है? साथ ही, हम अरब देशों पर ईरान के जवाबी हमले, युद्ध में AI के बढ़ते असर और रूस-चीन की 'खामोशी' के असली मायनों को भी समझेंगे। यह लेख उस 'नए ईरान' की तस्वीर पेश करता है, जो आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है।

खामेनेई की दोहरी विरासत
अयातुल्लाह खामेनेई की शख्सियत को समझने के लिए उनके संघर्षपूर्ण शुरुआती जीवन पर दृष्टि डालना अनिवार्य है। 1939 में मशहद के एक बेहद साधारण और धार्मिक परिवार में जन्मे खामेनेई का जीवन सादगी और कट्टर मजहबी चेतना का एक जटिल मिश्रण था।
उनके पिता एक प्रतिष्ठित मजहबी आलिम थे, और खामेनेई ने बचपन में ही तय कर लिया था कि वे इसी विरासत को आगे ले जाएंगे। शाह के शासन के दौरान उन्होंने अयातुल्लाह खुमैनी के साथ मिलकर जिस इस्लामी क्रांति का सपना देखा, उसकी कीमत उन्होंने जेल की कालकोठरियों और शाह की कुख्यात खुफिया एजेंसी 'साबाक' के अमानवीय जुल्मों को सहकर चुकाई।
1981 में एक बम धमाके में उनका सीधा हाथ हमेशा के लिए बेकार हो गया, जिसे उन्होंने अपनी शहादत और खुदा की राह में दिए गए बलिदान के पदक के रूप में पेश किया। 1989 में खुमैनी के उत्तराधिकारी के रूप में जब उन्होंने 'सुप्रीम लीडर' का पद संभाला, तो उन्होंने खुद को एक ऐसे वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, जो न केवल शिया हितों का रक्षक था, बल्कि मुस्लिम जगत में 'इत्तेहाद' (एकता) का पैरोकार भी था।
उन्होंने सुन्नी मुकद्दसात की तौहीन को हराम करार देकर अपनी साख को सीमाओं के पार ले जाने का प्रयास किया, जिससे उन्हें 'प्रतिरोध के धुरी' (Axis of Resistance) का निर्विवाद नेता बनने में मदद मिली।
हालांकि, खामेनेई का यह चेहरा अंतरराष्ट्रीय जगत के लिए 'साम्राज्यवाद विरोधी' नायक का हो सकता था, लेकिन ईरान की घरेलू हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत और रक्तरंजित थी। पिछले 50 वर्षों से सत्ता पर काबिज इस 'मजहबी नेतृत्व' (Clerical Order) ने अपने ही नागरिकों पर जो सितम ढाए, वे रूह कंपा देने वाले हैं।
विशेषकर महसा अमीनी की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों के दौरान जिस तरह ईरानी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को कुचला गया, उसने शासन के उस क्रूर चेहरे को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया जो मजहब की आड़ में तानाशाही चला रहा था।
आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2025 के आसपास हुए व्यापक विद्रोहों में, जिसे शासन ने पूरी ताकत से कुचला, सरकारी आंकड़ों के अनुसार 3,000 नागरिक मारे गए, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं का अनुमान यह संख्या 20,000 से भी अधिक बताता है। इंटरनेट का बार-बार बंद होना, सार्वजनिक फांसी और बुनियादी नागरिक स्वतंत्रताओं का पूर्ण अभाव इस शासन की स्थायी पहचान बन गया था। जो शासन बाहर 'न्याय' और 'मजलूमों की हिमायत' की बात करता था, वह अपने ही घर में जनता को महंगाई, पानी की किल्लत और वैचारिक गुलामी के दलदल में धकेल चुका था।

अरब सहानुभूति का अंत
खामेनेई की हत्या के तत्काल बाद ईरान ने जो जवाबी कार्रवाई की, वह सामरिक इतिहास में एक अत्यंत विवादित मोड़ साबित हुई। ईरान ने दुबई और अबू धाबी जैसे शहरों और वहां स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर दर्जनों मिसाइलें दागकर एक बड़ा जुआ खेला।
पश्चिमी विश्लेषक इसे एक रणनीतिक भूल मान सकते हैं, लेकिन ईरान के दृष्टिकोण से यह एक सोची-समझी सैन्य विवशता थी। ईरान का मानना था कि चूंकि इन अरब देशों ने अपनी जमीन पर अमेरिकी सैन्य अड्डों को पनाह दी है और इन्हीं अड्डों से 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' को अंजाम दिया गया, इसलिए ये देश अब 'तटस्थ' नहीं बल्कि 'युद्ध के सक्रिय भागीदार' हैं।
हालांकि, इस हमले का परिणाम यह हुआ कि ईरान ने उन अरब देशों की भी सहानुभूति खो दी, जो अब तक पर्दे के पीछे से तनाव कम करने की कोशिश कर रहे थे। इन देशों ने ईरान द्वारा उनकी संप्रभुता के उल्लंघन की कड़ी निंदा की।
इस युद्ध ने एक और डरावनी हकीकत दुनिया के सामने रखी युद्ध का तकनीकीकरण। इजराइल ने 'लेवेंडर' और 'द गॉस्पल' जैसे AI-आधारित सॉफ्टवेयर का उपयोग करके साबित कर दिया कि अब युद्ध केवल जज्बात, शहादत की तमन्ना या पारंपरिक हथियारों से नहीं, बल्कि मशीनी सटीकता और एल्गोरिदम से जीते जाते हैं। ईरान की विशाल सेना और उसके प्रॉक्सी समूह इन डिजिटल हमलों के सामने बेबस नजर आए।
ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को नेस्तनाबूद करना और होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर नियंत्रण पाना अमेरिका का पुराना और मुख्य उद्देश्य रहा है। इस युद्ध के दौरान वैश्विक शक्तियों का असली चरित्र भी खुलकर सामने आ गया।

रूस और चीन, जिन्हें ईरान अपना सबसे बड़ा सहयोगी मानता था, संकट की घड़ी में पीछे हट गए। रूस खुद यूक्रेन के दलदल में इस कदर फंसा है कि वह तेहरान की मदद के लिए अपनी सैन्य शक्ति खर्च करने की स्थिति में नहीं था। वहीं चीन, जो केवल अपने ऊर्जा हितों और तेल की निर्बाध आपूर्ति को लेकर चिंतित था, उसने अमेरिका के साथ किसी बड़े टकराव के बजाय अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना बेहतर समझा।
यह इस कड़वे सत्य का प्रमाण है कि आज की भू-राजनीति में 'शक्ति ही एकमात्र सत्य' है और अंतरराष्ट्रीय कानून या गठबंधन केवल तब तक प्रभावी हैं जब तक वे बड़े देशों के व्यापारिक हितों को चोट नहीं पहुँचाते।
क्या ईरान में सुधारवादियों की वापसी संभव है?
अयातुल्लाह की मौत के बाद अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि ईरान का भविष्य क्या होगा? क्या पश्चिमी देशों द्वारा प्रायोजित 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) सफल हो पाएगा? यह सोचना एक बड़ी भूल होगी कि खामेनेई के जाते ही ईरानी शासन ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
ईरान की सत्ता संरचना वेनेजुएला या इराक से कहीं अधिक जटिल और गहरी है। ईरान का भविष्य अब केवल वृद्ध मौलवियों (Clerics) के हाथ में नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के नियंत्रण में जा चुका है।
IRGC अब केवल एक सैन्य इकाई नहीं रह गई है, बल्कि वह एक ऐसी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति बन चुकी है जिसका ईरान के हर सरकारी अनुबंध, तेल निर्यात और व्यापारिक निवेश पर पूर्ण कब्जा है। पिछले दो दशकों में जिस तरह I
RGC के पूर्व कमांडरों ने संसद और राष्ट्रपति पद जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर कब्जा किया है, उसने धार्मिक नेतृत्व (Clerical Oversight) को कमजोर कर दिया है। अब सेना के पास बंदूक भी है और तिजोरी की चाबी भी, जिससे वे किसी भी आंतरिक विद्रोह या बाहरी हस्तक्षेप को कुचलने के लिए स्वतंत्र हैं।
अमेरिका के पास युद्ध के बाद के ईरान के लिए कोई 'ब्लूप्रिंट' नहीं है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की यह रणनीति कि खामेनेई की मौत के बाद शासन गिर जाएगा, ईरान की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती। IRGC और 'बासिज' (Basij) जैसे अर्धसैनिक बलों के पास लाखों की रिजर्व फोर्स है जो फिलहाल सत्ता की बागडोर थामे रखने के लिए पर्याप्त है।
ट्रंप प्रशासन का वह पुराना 'वेनेजुएला मॉडल' जिसमें एक अलोकप्रिय नेता को हटाकर किसी सुधारवादी को बैठाया जाता है-ईरान के थियोक्रेटिक और सैन्यीकृत ढांचे में फिट नहीं बैठता। यहाँ सत्ता किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था में निहित है जो मजहबी पहचान और सैन्य शक्ति के मेल से बनी है। किसी अंतरिम सैन्य परिषद के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश को एक भयावह गृहयुद्ध से बचाना होगा, क्योंकि शासन के भीतर भी अब विचारधारा बनाम व्यावहारिकता (Ideology vs Pragmatism) का संघर्ष तेज होगा।
ईरान के लिए असली समाधान और पुनर्निर्माण का रास्ता किसी बाहरी हमले या जबरन थोपे गए लोकतंत्र में नहीं, बल्कि एक 'मध्यम मार्ग' अपनाने में निहित है। ईरान को अब उस 'जंगी हैंगओवर' से बाहर निकलना होगा जिसने उसे दशकों से दुनिया से अलग-थलग कर रखा है।
परमाणु बम बनाने की जिद और हमास या हिजबुल्ला जैसे प्रॉक्सी समूहों पर अरबों डॉलर लुटाने के बजाय, उसे अपने संसाधनों का निवेश अपनी जर्जर अर्थव्यवस्था और हताश जनता के कल्याण में करना चाहिए।
सत्ता का परिवर्तन तभी सार्थक और स्थायी होगा जब वह ईरान की मिट्टी से उगे, जहाँ धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय हो और सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह। यदि ईरान ने अपनी सुरक्षा नीति में आमूल-चूल बदलाव नहीं किया और एक व्यावहारिक (Pragmatic) दृष्टिकोण नहीं अपनाया, तो वह गौरवशाली फारसी सभ्यता का उत्तराधिकारी देश केवल महाशक्तियों के खेल का एक रक्तरंजित मैदान बनकर रह जाएगा।

अब यह ईरान के नए नेतृत्व और वहां की जनता पर निर्भर है कि वे प्रतिशोध की आग में जलना चाहते हैं या एक आधुनिक, उदार और स्थिर ईरान का निर्माण करना चाहते हैं। पश्चिम एशिया का भविष्य इस बात पर टिका है कि तेहरान की गलियों में गूंजने वाले नारे अब युद्ध के होंगे या विकास के।
( अब्दुल्लाह मंसूर, क लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)