The question of the future of the Muslim community
मलिक असगर हाशमी
धर्म किसी भी समाज के लिए आस्था, नैतिकता और इंसानियत का रास्ता दिखाता है। धर्मगुरुओं से उम्मीद की जाती है कि वे लोगों को सही दिशा दें, समाज में भाईचारा बढ़ाएं और मुश्किल समय में लोगों का मार्गदर्शन करें। लेकिन जब कोई धर्मगुरु अपनी जिम्मेदारी भूलकर विवादित बयान देने लगे, धर्म के नाम पर लोगों को बांटे और अपनी पहचान का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए करे, तो सवाल उठना लाजिमी है।
भारत में मुस्लिम समाज के सामने शिक्षा, रोजगार, कारोबार, सामाजिक सुरक्षा और बेहतर भविष्य जैसी कई बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में समाज को उन लोगों से सावधान रहने की जरूरत है, जो इन बुनियादी सवालों पर बात करने के बजाय उसे गैरजरूरी विवादों में उलझाए रखते हैं। दुर्भाग्य से, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल करके सुर्खियां बटोरने वाले कुछ स्वयंभू धर्मगुरुओं के बयान अक्सर इसी समस्या को सामने लाते हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी मौलवी और मौलाना एक जैसे नहीं हैं। बड़ी संख्या में इस्लामी विद्वान और धार्मिक शिक्षक समाज की सेवा करते हैं, शिक्षा को बढ़ावा देते हैं और जरूरतमंदों की मदद करते हैं। सवाल उन लोगों से है, जो धर्म की जिम्मेदारी को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, राजनीतिक हित या सनसनी फैलाने का माध्यम बना लेते हैं।
हाल में अभिनेत्री सारा अली खान के मंदिर जाने को लेकर एक मौलाना की कथित टिप्पणी चर्चा में आई। खबरों के मुताबिक, उन्होंने अभिनेत्री के धार्मिक आचरण को लेकर सवाल उठाए और इस्लाम में उनकी स्थिति पर टिप्पणी की। इस प्रसंग ने धार्मिक पहचान, व्यक्तिगत आस्था और किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में फैसला सुनाने के अधिकार पर बहस छेड़ दी है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान का फैसला केवल उसके नाम, परिवार या किसी सार्वजनिक गतिविधि को देखकर नहीं किया जा सकता। किसी मंदिर, गुरुद्वारे या दूसरे धार्मिक स्थल पर जाना अपने आप में किसी व्यक्ति की पूरी आस्था का प्रमाण नहीं है। लोगों के धार्मिक अनुभव, पारिवारिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत विश्वास अलग-अलग हो सकते हैं।
सारा अली खान की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रही है। उनकी मां अमृता सिंह का संबंध सिख परिवार से है। लेकिन किसी अभिनेत्री की निजी आस्था पर फैसला सुनाने के बजाय यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या किसी धार्मिक मंच से इस तरह की टिप्पणी करना जरूरी था? क्या इससे समाज को कोई सकारात्मक संदेश मिला? क्या इससे शिक्षा, रोजगार या सामाजिक सुधार के किसी मुद्दे को आगे बढ़ाने में मदद मिली?
धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति को इस्लाम से बाहर घोषित करने जैसी टिप्पणी बेहद गंभीर है। ऐसी बातों में जल्दबाजी के बजाय जिम्मेदारी, विद्वता और संदर्भ की समझ जरूरी है। धार्मिक सवालों पर चर्चा हो सकती है, मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक बयानबाजी को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सामाजिक सद्भाव से ऊपर नहीं रखा जाना चाहिए।
इस्लामी परंपरा में धार्मिक मार्गदर्शन की अपनी जगह है। लेकिन फतवे के नाम पर दिए गए हर बयान को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं है। किसी धार्मिक प्रश्न का उत्तर देने के लिए ज्ञान, संदर्भ और जिम्मेदारी की जरूरत होती है। सनसनीखेज टिप्पणी और गंभीर धार्मिक मार्गदर्शन के बीच अंतर समझना जरूरी है।
जब कोई स्वयंभू धर्मगुरु किसी फिल्म अभिनेत्री, छात्र, पत्रकार या आम नागरिक के बारे में बिना पर्याप्त जानकारी के फैसला सुनाता है, तो इससे समाज में भ्रम फैल सकता है। धार्मिक मामलों को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देने से मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। समाज में अनावश्यक तनाव बढ़ता है और सार्वजनिक बहस का स्तर भी गिरता है।
मुस्लिम समाज को ऐसे बयानों की आलोचनात्मक समीक्षा करनी चाहिए। किसी व्यक्ति के पास धार्मिक उपाधि या बड़ा मंच होना इस बात की गारंटी नहीं कि उसकी हर बात सही है। उसकी दलील, ज्ञान और आचरण को भी कसौटी पर परखना चाहिए।
इसी तरह किसी धर्मगुरु पर राजनीतिक दलों से मिलीभगत या निजी लाभ लेने का आरोप लगाना भी गंभीर मामला है। ऐसे आरोपों को प्रमाण के बिना तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यदि किसी सार्वजनिक व्यक्ति के बयान लगातार किसी खास राजनीतिक हित को लाभ पहुंचाते दिखाई दें, तो उनकी निष्पक्षता और मंशा पर सवाल पूछना जनता का अधिकार है।
भारत के मुसलमानों की बुनियादी जरूरतें देश के दूसरे नागरिकों से अलग नहीं हैं। हर परिवार चाहता है कि उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, युवाओं को रोजगार मिले, कारोबार के अवसर बढ़ें और परिवार सम्मान के साथ जीवन बिता सके। महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा की लागत और सामाजिक असुरक्षा जैसी समस्याएं लाखों परिवारों को प्रभावित करती हैं।
ऐसे समय में समाज के नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वह इन सवालों को प्राथमिकता दे। धार्मिक मंचों पर शिक्षा, कौशल विकास, छात्रवृत्ति, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक सुधार पर चर्चा होनी चाहिए। युवाओं को वैज्ञानिक सोच, संविधान की समझ और लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
इसके बजाय यदि समाज की ऊर्जा इस बहस में खर्च होती रहे कि कौन किस धार्मिक स्थल पर गया, किसने क्या पहन लिया या किसे किस नाम से पुकारा जाए, तो नुकसान समाज का ही होगा। विवाद कुछ लोगों को प्रसिद्धि दिला सकते हैं, लेकिन वे किसी बेरोजगार युवा को नौकरी नहीं देते और न किसी गरीब परिवार के बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं।
राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी नजर रखना जरूरी है। देश की राजनीति में धार्मिक पहचान और सामुदायिक भावनाओं का इस्तेमाल कई बार समर्थन जुटाने के लिए किया जाता है। ऐसे माहौल में मुस्लिम समाज को किसी भी नेता या धार्मिक वक्ता के दावों को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह देखना चाहिए कि उसके बयान और काम समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान करते हैं या केवल भावनाएं भड़काते हैं।
सार्वजनिक बहस में जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी जैसे नेताओं के नाम भी अक्सर राजनीतिक आरोपों और प्रत्यारोपों में इस्तेमाल किए जाते हैं। किसी नेता की नीतियों की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इतिहास को केवल धार्मिक पहचान या राजनीतिक नफरत के चश्मे से देखना समाज को कमजोर करता है।
मुस्लिम युवाओं को गांधी, नेहरू और दूसरे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का अध्ययन स्वतंत्र सोच के साथ करना चाहिए। उनके विचारों, उपलब्धियों और गलतियों पर सवाल पूछे जा सकते हैं। किसी व्यक्ति को आदर्श मानना या उसकी आलोचना करना निजी विवेक का विषय है। इसे धार्मिक परीक्षा में बदल देना उचित नहीं है।
इसी तरह किसी मुस्लिम नेता का यह कहना कि मुसलमानों को गांधी या नेहरू जैसा नहीं बनना चाहिए, अपने आप में बहस का विषय हो सकता है। ऐसे बयान का मूल्यांकन उसके तर्क और संदर्भ के आधार पर होना चाहिए। समाज को न तो किसी नेता की हर बात स्वीकार करनी चाहिए और न केवल उसकी पहचान के आधार पर उसे खारिज करना चाहिए।
युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे नारे और भावनात्मक भाषणों से आगे बढ़कर तथ्यों को समझें। उन्हें इतिहास पढ़ना चाहिए, संविधान को जानना चाहिए और अपने अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों को भी समझना चाहिए।
समाज में गलत सूचना, धार्मिक उन्माद और राजनीतिक ध्रुवीकरण का मुकाबला केवल नाराजगी से नहीं किया जा सकता। इसके लिए शिक्षा, संगठन, तथ्यपरक संवाद और जिम्मेदार सामाजिक भागीदारी की जरूरत है। मुस्लिम युवाओं को यह तय करना होगा कि वे अपना समय किस तरह की बहसों में खर्च करना चाहते हैं और अपने समुदाय के भविष्य के लिए कौन से काम जरूरी मानते हैं।
युवाओं को धार्मिक वक्ताओं के बयानों पर सवाल पूछने का अधिकार है। उन्हें यह जानना चाहिए कि किसी विवादित टिप्पणी का आधार क्या है, उससे किसे फायदा हो रहा है और क्या वह इस्लाम की नैतिक शिक्षाओं, इंसाफ और इंसानियत के मूल्यों के अनुरूप है। आलोचना का आधार भी तथ्य होना चाहिए, न कि केवल गुस्सा या व्यक्तिगत दुश्मनी।
मस्जिदों, मदरसों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों को भी इस दिशा में भूमिका निभानी चाहिए। धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा, रोजगार, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जिम्मेदारी पर ध्यान दिया जाना चाहिए। समाज को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो युवाओं को बांटने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाए।
किसी भी समाज की पहचान उसके सबसे ऊंचे दावे करने वाले लोगों से नहीं, बल्कि उसके आचरण से बनती है। धर्मगुरुओं का सम्मान तभी कायम रहता है, जब वे ज्ञान, संयम और निष्पक्षता का परिचय देते हैं। यदि कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर विवाद पैदा करता है, तो उसकी आलोचना करना धर्म का विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है।
मुस्लिम समाज को ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए जो धार्मिक भावनाओं को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस सावधानी का अर्थ सभी मौलवियों और मौलानाओं को संदेह की नजर से देखना नहीं है। जरूरत है कि समाज अच्छे धार्मिक मार्गदर्शकों और सनसनी फैलाने वालों के बीच अंतर करे।
आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि कौन किसे किस नाम से पुकार रहा है। असली सवाल यह है कि मुस्लिम युवाओं को बेहतर शिक्षा कैसे मिलेगी, रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे और समाज संविधान, लोकतंत्र तथा इंसानियत के मूल्यों के साथ अपनी स्थिति कैसे मजबूत करेगा।
यदि मुस्लिम समाज इन प्राथमिकताओं को केंद्र में रखे, तो गैरजरूरी विवाद उसकी दिशा तय नहीं कर पाएंगे। धर्म को राजनीति और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का औजार बनाने वालों से दूरी और शिक्षा, विवेक तथा सामाजिक सुधार से निकटता ही आगे बढ़ने का बेहतर रास्ता है।