फरहान इसराइली / जयपुर
राजस्थान की राजधानी जयपुर के शास्त्री नगर स्थित नाहरी का नाका इलाके में एक ऐसा शिक्षण संस्थान है, जिसकी कहानी शिक्षा के प्रति लगन, सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखने और समाज के कमजोर तबकों को आगे बढ़ाने की मिसाल पेश करती है। वर्ष 2012 में यहां महज तीन बच्चियों के साथ शुरू हुआ जामिया तैयबा मेमोरियल मदरसा आज करीब 750 विद्यार्थियों की तालीम का केंद्र बन चुका है।
चार मंजिला इमारत में चल रहे इस संस्थान की खासियत यह है कि यहां बच्चों को कुरआन और दीनी तालीम के साथ हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर की शिक्षा भी दी जाती है। इस पहल के पीछे कारी मोहम्मद इसहाक की मेहनत है, जिन्होंने करीब 14 साल पहले एक छोटे से मकतब की शुरुआत की थी। उनका मकसद केवल बच्चों को धार्मिक शिक्षा देना नहीं था, बल्कि उन्हें ऐसा शैक्षिक आधार उपलब्ध कराना भी था, जिसके सहारे वे आगे की पढ़ाई कर सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
कारी मोहम्मद इसहाक मूल रूप से राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के शेषा गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने शुरुआती शिक्षा अपने गांव में हासिल की। वर्ष 1995 और 1996 के दौरान वे जयपुर आए और चीनी की बुर्ज स्थित मदरसा जामिया महमूदिया नुसरतुल इस्लाम में पढ़ाई की।
यहां उन्होंने वर्ष 1999 तक कुरआन हिफ्ज किया। इसके बाद गुजरात में एक साल रहकर आगे की तालीम हासिल की। वर्ष 2000 और 2001 में उन्होंने दारुल उलूम देवबंद से कारी का कोर्स पूरा किया। करीब चार साल तक जयपुर के अलग अलग मदरसों में पढ़ाने के बाद बुजुर्गों के मशवरे पर उन्होंने अपना मकतब शुरू करने का फैसला किया।
वर्ष 2012 में नाहरी का नाका इलाके में तीन बच्चियों के दाखिले के साथ इस सफर की शुरुआत हुई। पहले महीने विद्यार्थियों की संख्या पांच से सात हुई। फिर हर साल दस से बीस बच्चे जुड़ते गए। धीरे धीरे यह छोटा सा मकतब एक ऐसे मदरसे में बदल गया, जहां आज सैकड़ों परिवार अपने बच्चों का भविष्य संवारने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं।
जामिया तैयबा मेमोरियल राजस्थान मदरसा बोर्ड से पंजीकृत है और यहां आठवीं कक्षा तक नियमित पढ़ाई होती है। संस्थान में अरबी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं।
मदरसा बोर्ड की ओर से पांच शिक्षकों की नियुक्ति है। ये सभी महिलाएं हैं। इसके अलावा 13 निजी शिक्षक भी विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं। नौवीं और दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को भी यहां कोचिंग के माध्यम से पढ़ाया जाता है। परीक्षा के लिए उन्हें दूसरे स्कूलों से जोड़ा जाता है, जहां वे ओपन या निजी माध्यम से परीक्षा दे सकते हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य उन विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का मौका देना है, जो किसी कारण से सामान्य स्कूलों की पढ़ाई जारी नहीं रख पाए या जिन्हें अतिरिक्त शैक्षिक सहायता की जरूरत है।
मदरसे की फीस भी इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है। शुरुआत में बच्चों से 40 से 50 रुपये महीने लिए जाते थे। अब आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की मासिक फीस 150 से 200 रुपये है। कारी इसहाक बताते हैं कि मुंबई में दीनी तालीम से जुड़े एक कोर्स के दौरान उन्हें सलाह मिली थी कि गरीब बच्चों से भी नाममात्र की फीस लेनी चाहिए।
फीस बहुत कम हो सकती है, लेकिन इससे बच्चों और उनके अभिभावकों में पढ़ाई के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा होता है। इसी विचार को उन्होंने अपने संस्थान में अपनाया। उनका कहना है कि उन्होंने मदरसा शुरू करने से लेकर आज तक इसके संचालन के लिए चंदा इकट्ठा नहीं किया। कम फीस में शिक्षा उपलब्ध कराना और संस्थान को चलाते रहना उनके लिए एक बड़ी जिम्मेदारी रही है।
जामिया तैयबा मेमोरियल की कामयाबी का आकलन केवल विद्यार्थियों की संख्या से नहीं किया जा सकता। यहां से पढ़कर निकले विद्यार्थियों की उपलब्धियां भी इसकी पहचान बन रही हैं। पूर्व छात्रा सना चौहान ने इसी मदरसे में आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की।
पिछले साल उनका राजस्थान न्यायिक सेवा यानी आरजेएस में चयन हुआ। कुछ अन्य विद्यार्थी मेडिकल और कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। कारी इसहाक बताते हैं कि कई पुराने विद्यार्थी अब अपने बच्चों को भी इसी संस्थान में पढ़ने भेज रहे हैं। उनके मुताबिक, यह किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए भरोसे की बड़ी बात है। जब एक पीढ़ी के विद्यार्थी अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उसी जगह को चुनते हैं, तो इससे संस्थान के प्रति उनके विश्वास का पता चलता है।
एक अन्य विद्यार्थी की कहानी भी इस प्रयास की अहमियत बताती है। वह आसपास के एक मकतब में पढ़ता था और हाफिज था, लेकिन आगे की पढ़ाई छोड़ चुका था। कारी इसहाक ने उसे राजस्थान स्टेट ओपन स्कूल से दसवीं की परीक्षा देने के लिए प्रेरित किया और तैयारी में मदद की।

दसवीं पास करने के बाद उसने ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। फिर स्नातक की डिग्री हासिल की और अब स्कूलों में पढ़ा रहा है। यह उदाहरण बताता है कि धार्मिक शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों के लिए आधुनिक शिक्षा के रास्ते भी खुले रह सकते हैं। जरूरत सही मार्गदर्शन और पढ़ाई जारी रखने के अवसर की है।
शिक्षा के साथ सामाजिक सेवा भी मदरसे की गतिविधियों का हिस्सा है। वर्ष 2015 और 2016 के आसपास से हर सर्दी में जरूरतमंद बच्चों को स्वेटर बांटने की परंपरा शुरू हुई। जरूरत पड़ने पर रजाई और कंबल भी दिए जाते हैं। शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई के तहत दाखिले के लिए हर साल करीब 400 से 500 बच्चों के आवेदन निशुल्क भरवाए जाते हैं।
कोरोना महामारी के दौरान जरूरतमंद परिवारों तक राशन और जरूरी सामान पहुंचाया गया। रमजान के महीने में भी राशन वितरण किया जाता है। संस्थान में करीब 25 से 30 ऐसे बच्चे हैं, जिनके माता पिता में से एक या दोनों नहीं हैं।
उनके कपड़े, यूनिफॉर्म, जूते और गर्म कपड़ों का इंतजाम प्रबंधन तथा स्टाफ के सहयोग से किया जाता है। शिक्षक अपनी इच्छा से हर महीने 50 या 100 रुपये का योगदान भी देते हैं। स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से आंखों की जांच और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं। पौधारोपण, गर्मियों में पक्षियों के लिए परिंडे लगाने और पेड़ों पर घोंसले लगाने जैसे काम भी इस पहल का हिस्सा हैं।
कारी इसहाक चाहते हैं कि विद्यार्थी केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें अपने करियर की दिशा भी समझ में आए। इसी उद्देश्य से संस्थान में शैक्षिक कॉन्फ्रेंस और प्रेरक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इनमें आईएएस, आरएएस और दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को बुलाया जाता है। बच्चों को बताया जाता है कि आगे की पढ़ाई के लिए कौन से विकल्प उपलब्ध हैं और रोजगार पाने के लिए किन कौशलों की जरूरत पड़ सकती है। संस्थान के सामने अब दसवीं और बारहवीं तक नियमित शिक्षा शुरू करने की चुनौती है।
कारी इसहाक बताते हैं कि पहले भी इस संबंध में आवेदन दिए गए और संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया गया, लेकिन योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब वे शिक्षा विभाग से मान्यता लेकर उच्च कक्षाएं शुरू करना चाहते हैं। इसके लिए जरूरी शर्तें पूरी करना और घनी आबादी वाले इलाके में पर्याप्त जगह जुटाना अहम चुनौती है।
मदरसे की शुरुआत आसान नहीं थी। कारी इसहाक के मुताबिक, शुरुआती दिनों में संस्थान के सामने स्थित शराब की दुकान पर आने वाले कुछ लोग बच्चों को देखकर परेशान करते थे। एक बार अभद्र टिप्पणी की घटना के बाद उन्होंने स्थानीय पार्षद हाजी नवाब अली चिरानिया से संपर्क किया।
अगले दिन बच्चों और अभिभावकों के साथ पुलिस थाने जाकर विरोध जताया गया। इसके बाद समस्या काफी हद तक खत्म हो गई। मदरसे के सामने नाले की दीवार नीची होने के कारण कुछ बच्चे उसमें गिर भी गए थे। अधिकारियों से संपर्क करने के बाद दीवार ऊंची करवाई गई। इन घटनाओं से पता चलता है कि एक छोटे शिक्षण संस्थान को चलाने के लिए पढ़ाई के साथ स्थानीय समस्याओं से भी लगातार जूझना पड़ता है।
आज जामिया तैयबा मेमोरियल के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य अपनी शैक्षिक व्यवस्था का विस्तार करना है। कारी मोहम्मद इसहाक चाहते हैं कि यहां के बच्चे दीनी तालीम हासिल करने के साथ आधुनिक शिक्षा में भी आगे बढ़ें। उनकी कोशिश है कि आर्थिक कमजोरी किसी बच्चे की पढ़ाई के रास्ते में बाधा न बने।
तीन बच्चियों से शुरू हुआ यह सफर करीब 750 विद्यार्थियों तक पहुंचा है। इस दौरान संस्थान ने कम फीस, नियमित पढ़ाई, जरूरतमंदों की सहायता और करियर मार्गदर्शन को अपनी पहचान बनाया है। अब इसकी अगली परीक्षा उच्च कक्षाओं तक शिक्षा पहुंचाने की है। यदि यह सपना पूरा होता है, तो जयपुर का यह मदरसा उन परिवारों के लिए और अधिक उपयोगी साबित हो सकता है, जो कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश कर रहे हैं।
महत्वपूर्ण सवाल और जवाब
जामिया तैयबा मेमोरियल मदरसा कहां स्थित है? यह राजस्थान की राजधानी जयपुर के शास्त्री नगर स्थित नाहरी का नाका इलाके में है।
जामिया तैयबा मेमोरियल की शुरुआत कब और कितने बच्चों से हुई? इसकी शुरुआत वर्ष 2012 में तीन बच्चियों के साथ हुई थी। आज यहां करीब 750 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं।
मदरसे में कौन कौन से विषय पढ़ाए जाते हैं? यहां दीनी तालीम के साथ अरबी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है।
मदरसे की मासिक फीस कितनी है? आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों से लगभग 150 से 200 रुपये प्रति माह फीस ली जाती है।
जामिया तैयबा मेमोरियल का अगला लक्ष्य क्या है? संस्थापक कारी मोहम्मद इसहाक शिक्षा विभाग से मान्यता लेकर दसवीं और बारहवीं तक पढ़ाई शुरू करना चाहते हैं।