जेनुल आबेदीन
वर्तमान समय में मोबाइल फोन हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। अब यह केवल बातचीत या संचार का जरिया नहीं रहा, बल्कि इसके माध्यम से हम पढ़ाई कर सकते हैं, देश-विदेश की खबरें देख सकते हैं, ऑनलाइन पेमेंट कर सकते हैं, और ट्रेन, फ्लाइट या अन्य साधनों की टिकट बुक कर सकते हैं। यानी कई महत्वपूर्ण काम अब घर बैठे ही मोबाइल से संभव हैं। बदलते दौर में मोबाइल हर व्यक्ति की बुनियादी जरूरत बन गया है।
आज के दौर में मोबाइल फोन बच्चों के आकर्षण का भी केंद्र बन गया है। छोटी उम्र के बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन होना अब एक आम बात हो गई है। लगभग हर जगह यह दृश्य आसानी से देखने को मिल जाता है। बच्चों के लिए मोबाइल मनोरंजन का सबसे आसान साधन बन गया है-गेम्स, रंग-बिरंगे वीडियो, रील्स और चलती-फिरती तस्वीरें उन्हें अपनी ओर खींचती हैं। बच्चे घंटों स्क्रीन से चिपके रहते हैं और धीरे-धीरे यह मनोरंजन उनकी लत में बदल जाता है।
आजकल बच्चों के हाथ में मोबाइल थमाना माता-पिता की भी एक तरह से मजबूरी बनता जा रहा है। तकनीक के इस युग में व्यस्त अभिभावक बच्चों को शांत रखने या अपना काम निपटाने के लिए फोन देना आसान समझते हैं। बच्चा रो रहा हो या जिद्द कर रहा हो, तो उसे शांत करने के लिए हाथ में मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। इसी तरह, खाना खिलाने या अन्य कामों के लिए भी फोन का सहारा लिया जाता है।
शुरुआत में माता-पिता को लगता है कि फोन देने से बच्चा कुछ देर के लिए शांत हो जाएगा या खाना खा लेगा, लेकिन धीरे-धीरे यह उसकी पक्की आदत बन जाती है। अभिभावकों की नजर में मोबाइल देना एक तुरंत काम करने वाला सरल समाधान है, लेकिन इसके गंभीर और चिंताजनक दुष्परिणाम सामने आते हैं। मोबाइल की आदत के कारण बच्चे बाहर खेलने या घूमने में रुचि खोने लगते हैं। इससे उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और वे पढ़ाई तथा अन्य जरूरी कामों के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते।
अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल से बच्चों में चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ने लगता है। फोन पर देखे गए गेम्स, रील्स या अन्य कंटेंट उनके दिमाग में लगातार घूमते रहते हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। बच्चा इस आभासी दुनिया में उलझकर वास्तविक दुनिया से कटने लगता है, जिससे उसके पारिवारिक और सामाजिक व्यवहार पर भी बुरा असर पड़ता है।
क्या बच्चे को मोबाइल से दूर करने की जिम्मेदारी सिर्फ बच्चे की है? बिल्कुल नहीं। इसमें माता-पिता और पूरे परिवार की अहम भूमिका है। बच्चों की जिद्द या रोने का हल फोन देना नहीं हो सकता। अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण समय (Quality Time) निकालना होगा। बच्चों को किताबें पढ़ने की आदत डालें, कहानियां सुनाएं, उनके साथ खेलें, अपनी संस्कृति और अच्छे संस्कारों से उनका परिचय कराएं। एक आदर्श माता-पिता के रूप में इन जिम्मेदारियों का पालन करना बहुत जरूरी है।
आज के युग में मोबाइल एक बेहद उपयोगी साधन है, लेकिन इसके लाभ तभी मिलते हैं जब इसका संतुलित और सही उपयोग किया जाए। बच्चों से अचानक मोबाइल छीनना समस्या का हल नहीं है, बल्कि उन्हें मोबाइल की जगह बेहतर और आकर्षक विकल्प देना सही तरीका है।
बच्चों को मोबाइल के सही उपयोग की जानकारी दें और इसके इस्तेमाल की एक समय-सीमा (Screen Time Limit) तय करें। उन्हें अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बचाकर पढ़ाई, खेल-कूद, रचनात्मक गतिविधियों और मनोरंजन के बीच सही संतुलन बनाना सिखाएं, ताकि उनका भविष्य स्वस्थ, सुरक्षित और सफल बन सके।