बासित जरगर / श्रीनगर
दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही श्रीनगर में कुम्हार अब्दुल सलाम कुमार की व्यस्तता बढ़ गई है। उनकी कार्यशाला में मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली है। हाथों पर लगी मिट्टी और सामने रखे गीले दीयों के बीच वह लगातार काम कर रहे हैं। कोई दीये को आकार दे रहा है, कोई उसे किनारे से ठीक कर रहा है और कोई तैयार दीयों को सूखने के लिए करीने से रख रहा है। त्योहार के दिनों में इन छोटे छोटे मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में अब्दुल सलाम के लिए यह समय केवल अधिक काम करने का नहीं, बल्कि साल की कमाई का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है।
बाजार में बिजली की झालरों, एलईडी लाइटों और रंगीन सजावटी सामान की भरमार है, लेकिन मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। इन दीयों में केवल रोशनी नहीं होती, बल्कि सदियों पुरानी कारीगरी, मेहनत और परंपरा की झलक भी दिखाई देती है।
अब्दुल सलाम कुमार के लिए मिट्टी के दीये बनाना महज एक काम नहीं है। यह उस पारंपरिक हुनर का हिस्सा है, जो पीढ़ियों से कुम्हारों के जीवन से जुड़ा रहा है। मिट्टी को चुनना, उसे सही तरीके से तैयार करना, दीये का आकार देना और फिर उसे सुखाकर पकाना, हर चरण में धैर्य और अनुभव की जरूरत होती है।
एक छोटा सा दीया देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन उसे तैयार करने के पीछे कारीगर की मेहनत लगी होती है। दिवाली से पहले अब्दुल सलाम लंबे समय तक अपनी कार्यशाला में काम करते हैं। उनका प्रयास रहता है कि बाजार में ग्राहकों की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त संख्या में दीये तैयार हो जाएं। वह सैकड़ों मिट्टी के दीये बनाते हैं, जिन्हें सूखने के बाद पकाया जाता है। इसके बाद इन्हें दुकानों और बाजारों तक पहुंचाया जाता है, ताकि लोग त्योहार के लिए समय पर खरीदारी कर सकें।
अब्दुल सलाम बताते हैं कि दिवाली कुम्हारों के लिए साल के सबसे महत्वपूर्ण मौकों में से एक है। इस दौरान ग्राहक मिट्टी के पारंपरिक दीये खरीदने आते हैं। मांग बढ़ने पर काम के घंटे भी बढ़ाने पड़ते हैं। उनके लिए सबसे बड़ी खुशी तब होती है, जब उनके हाथों से तैयार किया गया दीया किसी घर में जलता है।
एक साधारण मिट्टी का दीया जब किसी आंगन, खिड़की या दरवाजे पर रोशनी बिखेरता है, तो कारीगर की मेहनत भी सार्थक महसूस होती है। इसी उम्मीद के सहारे वह हर साल दिवाली से पहले पूरी लगन के साथ दीये बनाने में जुट जाते हैं।
दिवाली को भारत में रोशनी का त्योहार कहा जाता है। इस अवसर पर घरों की सफाई की जाती है, रंगोली बनाई जाती है और दीप जलाए जाते हैं। मिट्टी का दीया इस उत्सव का एक पारंपरिक प्रतीक है। इसकी लौ अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है।
बहुत से परिवार आज भी पूजा और घर की सजावट के लिए मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देते हैं। उनके लिए दीया केवल सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि त्योहार की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। अब्दुल सलाम का मानना है कि हाथ से बने दीयों की खासियत उनकी सादगी और प्राकृतिक रोशनी में है। बिजली की सजावट घर को चमका सकती है, लेकिन तेल और बाती से जलने वाले मिट्टी के दीये का अनुभव अलग होता है। इसकी छोटी सी लौ त्योहार के पारंपरिक एहसास को जीवित रखती है।
हालांकि, बदलते समय के साथ कुम्हारों के सामने चुनौतियां भी बढ़ी हैं। बाजार में फैक्टरी में बने सजावटी उत्पादों की उपलब्धता बढ़ गई है। रंगीन एलईडी दीये और बिजली से चलने वाली लाइटें ग्राहकों को आकर्षित करती हैं।
इन उत्पादों की विविधता और सजावटी रूप के कारण पारंपरिक मिट्टी के दीयों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा कच्चे माल की बढ़ती लागत भी कुम्हारों की चिंता बढ़ाती है। मिट्टी के दीये तैयार करने में समय, मेहनत और कई चरणों की जरूरत होती है। इसके बावजूद कारीगरों को हमेशा यह भरोसा नहीं होता कि उनके सभी दीये बिक जाएंगे या उन्हें मेहनत के अनुरूप आमदनी मिल पाएगी।
अब्दुल सलाम के लिए दिवाली की बिक्री इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे मिलने वाली कमाई उनके पारंपरिक काम को आगे बढ़ाने में मदद करती है। त्योहार के दौरान दीयों की मांग बढ़ती है, लेकिन साल के बाकी महीनों में कारोबार की स्थिति अनिश्चित रहती है।
यही वजह है कि कुम्हारों को अपनी आजीविका चलाने के लिए मौसमी मांग पर काफी हद तक निर्भर रहना पड़ता है। यदि तैयार दीये समय पर नहीं बिकें या बाजार में मांग उम्मीद से कम रहे, तो उनकी मेहनत का पूरा आर्थिक लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।
मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने वाले कारीगरों की यह समस्या देश के कई हिस्सों में देखने को मिलती है। पारंपरिक हस्तकला को बचाए रखने के लिए केवल उसकी प्रशंसा पर्याप्त नहीं है। कारीगरों की मेहनत का उचित मूल्य मिलना भी जरूरी है।
श्रीनगर में अब्दुल सलाम की कार्यशाला में कतार से रखे मिट्टी के दीये इस मेहनत की कहानी खुद बयान करते हैं। हर दीया आकार में छोटा है, लेकिन उसे बनाने में कारीगर का समय और हुनर लगा है। एक दीये से दूसरे दीये तक आकार की समानता बनाए रखना भी अभ्यास मांगता है।
मिट्टी को ठीक से गूंथने से लेकर अंतिम रूप देने तक सावधानी बरतनी पड़ती है। फिर उन्हें पर्याप्त समय तक सुखाना और पकाना होता है। इस पूरी प्रक्रिया में मौसम और समय का भी महत्व है। त्योहार से पहले बड़ी संख्या में दीये तैयार करने के लिए कुम्हारों को अपने काम की योजना पहले से बनानी पड़ती है। यही वजह है कि दिवाली की खरीदारी शुरू होने से पहले ही उनकी कार्यशालाओं में हलचल बढ़ जाती है।
अब्दुल सलाम कुमार की कहानी उस पारंपरिक कारीगरी की भी कहानी है, जो आधुनिक बाजार के बीच अपनी जगह बनाए रखने की कोशिश कर रही है। मिट्टी के दीये भारतीय संस्कृति और त्योहारों से गहराई से जुड़े हैं, लेकिन इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कारीगरों की आजीविका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जब कोई परिवार अपने घर में मिट्टी का दीया खरीदकर जलाता है, तो वह केवल त्योहार की सजावट नहीं करता, बल्कि एक पारंपरिक हुनर को जीवित रखने में भी योगदान देता है। स्थानीय कुम्हारों से दीये खरीदना उनके काम को प्रोत्साहित करने का एक सीधा तरीका हो सकता है।
दिवाली की तैयारियों के बीच अब्दुल सलाम लगातार दीयों को आकार दे रहे हैं। उनकी उम्मीद है कि इस बार भी लोग पारंपरिक मिट्टी के दीयों को अपनाएंगे और उनकी मेहनत का सम्मान करेंगे। बाजार में रोशनी के नए विकल्प आते रहेंगे, लेकिन मिट्टी के दीये की सांस्कृतिक अहमियत अपनी जगह बनी रह सकती है।
हर दीये में कारीगर की मेहनत, परिवार की आजीविका और पुरानी परंपरा से जुड़ा एक छोटा सा सपना छिपा है। जब दिवाली की रात घरों में ये दीये जलेंगे, तो उनकी रोशनी के साथ श्रीनगर के इस कुम्हार की मेहनत भी लोगों तक पहुंचेगी। यही उस परंपरा की असली खूबसूरती है, जो पीढ़ियों से मिट्टी को रोशनी में बदलती आई है।
प्रमुख सवाल और जवाब
श्रीनगर में दिवाली के लिए मिट्टी के दीये कौन बना रहा है?
श्रीनगर के कुम्हार अब्दुल सलाम कुमार दिवाली से पहले अपनी कार्यशाला में मिट्टी के पारंपरिक दीये तैयार कर रहे हैं।
मिट्टी के दीये कैसे तैयार किए जाते हैं?
मिट्टी को तैयार करके दीयों को आकार दिया जाता है। इसके बाद उन्हें सुखाया जाता है और पकाकर बाजार में बिक्री के लिए भेजा जाता है।
दिवाली के दौरान कुम्हारों के लिए दीयों की बिक्री क्यों महत्वपूर्ण है?
दिवाली के आसपास मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ती है। इससे कुम्हारों को मौसमी कमाई का महत्वपूर्ण अवसर मिलता है और उनकी पारंपरिक कारीगरी जारी रखने में मदद मिलती है।
पारंपरिक कुम्हारों के सामने कौन सी चुनौतियां हैं?
कच्चे माल की बढ़ती लागत, फैक्टरी में बने सजावटी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा और सालभर कारोबार की अनिश्चितता कुम्हारों की प्रमुख चुनौतियां हैं।