रुश्दा शाहीन
भारतीय इतिहास में ऐसे कई अध्याय हैं जिन पर से धूल हटना अभी बाकी है। दक्षिण भारत की एक ऐसी ही महान योद्धा रानी थीं चांद बीबी, जिन्होंने अपनी वीरता और कूटनीति के दम पर मुगल सम्राट अकबर की विशाल सेना को भी पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। अब दक्षिण कैरोलिना विश्वविद्यालय की इतिहास प्रोफेसर सारा वाहिद ने अपनी नई किताब के जरिए इस साहसी रानी के इतिहास को दुनिया के सामने एक नए रूप में पेश किया है। उनकी यह किताब चांद बीबी के जीवन और उनके संघर्षों के अनछुए पहलुओं पर रोशनी डालती है।
एक पुरानी दुकान से शुरू हुई किताब की तलाश
प्रोफेसर सारा वाहिद के लिए चांद बीबी तक पहुंचने का यह सफर केवल अकादमिक नहीं था, बल्कि यह उनके लिए बहुत निजी भी था। हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाली प्रोफेसर वाहिद का कहना है कि चांद बीबी के जीवन और दक्कन की बहुसांस्कृतिक विरासत ने उन्हें हमेशा से प्रेरित किया है।
दिलचस्प बात यह है कि इस किताब की शुरुआत उनके पैतृक शहर की एक पुरानी किताब की दुकान से हुई थी। उस दुकान में मिली एक किताब ने उन्हें न केवल रानी चांद बीबी के करीब पहुंचाया, बल्कि उनके बाद के इतिहास और लोगों के बीच उनकी यादों से भी रूबरू कराया।
चांद बीबी के जीवन पर पहले से भी कुछ उर्दू और फारसी ग्रंथ मौजूद रहे हैं। लेकिन प्रोफेसर वाहिद का शोध इन पुरानी रचनाओं से काफी अलग है। उनकी यह किताब कोई साधारण जीवनी नहीं है।
उन्होंने चांद बीबी को केवल एक अलग व्यक्ति के रूप में देखने के बजाय उन्हें दक्कन के व्यापक राजनीतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक माहौल के भीतर रखकर देखा है। उनका मानना है कि इतिहास में महिलाओं को अक्सर उनके समय की व्यवस्था से काटकर देखा जाता है, जबकि वे अपने दौर की राजनीति और संस्कृति का एक अहम हिस्सा थीं।
मुगल सेना के खिलाफ ऐतिहासिक रक्षा
सोलहवीं शताब्दी के आखिर में जब मुगल सम्राट अकबर की सेनाएं दक्कन क्षेत्र को जीतने के लिए आगे बढ़ रही थीं, तब चांद बीबी ने अपने राज्य की रक्षा की कमान अपने हाथों में संभाली थी। इतिहास में वे साल 1595 और 1596 के दौरान अहमदनगर की घेराबंदी के दौरान किए गए प्रतिरोध के लिए सबसे ज्यादा जानी जाती हैं।
उन्होंने अपनी सैन्य रणनीति और राजनीतिक सूझबूझ से दुश्मन सेना को हैरान कर दिया था। उनकी बहादुरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके विरोधी भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से सुल्तान कहकर पुकारते थे।
उनकी राजनीतिक पहुंच केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं थी। उन्होंने समुद्री ताकतों के साथ भी कूटनीतिक संबंध बनाए। साल 1598 में उन्होंने पुर्तगाल के वायसराय डोम फ्रांसिस्को दा गामा को पत्र लिखा था।
इन पत्रों में उन्होंने खुद को सुल्तान संबोधित किया था और बराबरी के स्तर पर बात की थी। उनकी यह कूटनीति इस बात का सबूत है कि वे केवल एक क्षेत्रीय शासक नहीं थीं, बल्कि उनकी गिनती अपने दौर के प्रभावशाली संप्रभु शासकों में होती थी।
पितृसत्तात्मक इतिहास और महिला शासकों की अनदेखी
इतिहास के पन्नों में चांद बीबी जैसी महिला शासकों को वह जगह क्यों नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी? इस सवाल पर प्रोफेसर वाहिद का कहना है कि पुराने समय के अधिकांश फारसी इतिहास अभिजात वर्ग के पुरुषों द्वारा लिखे गए थे।
उन लेखकों के मन में महिलाओं और राजनीतिक सत्ता को लेकर अपनी एक खास सोच थी। औपनिवेशिक काल के इतिहासकारों ने इस स्थिति को और बिगाड़ दिया और यह धारणा फैला दी कि मुस्लिम महिलाएं केवल महलों की चारदीवारी तक सीमित थीं।
इसके अलावा, मुख्यधारा का इतिहास हमेशा से उत्तर भारत और मुगल साम्राज्य के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। दक्कन के इतिहास को तभी याद किया जाता है जब उसका सामना मुगलों से होता है। जबकि हकीकत यह है कि दक्कन के इस इलाके ने दक्षिण एशिया के किसी भी अन्य क्षेत्र की तुलना में कहीं अधिक महिला शासक दिए हैं।
चांद बीबी कोई अकेली अपवाद नहीं थीं, बल्कि वे दक्कन की उन तमाम महिलाओं की लंबी परंपरा का हिस्सा थीं जिन्होंने समय-समय पर शासन संभाला और इतिहास की धारा को बदला।
इतिहास की भूल-भुलैया और अनसुलझे रहस्य
चांद बीबी की मौत का रहस्य आज भी पूरी तरह से साफ नहीं हो पाया है। उनके अंत को लेकर अलग-अलग इतिहासकार हत्या, आत्महत्या और भूमिगत सुरंगों से भागने जैसी अलग-अलग कहानियां बताते हैं। प्रोफेसर वाहिद किसी एक बात को अंतिम सत्य नहीं मानती हैं।
उनका कहना है कि ये अलग-अलग कहानियां यह बताती हैं कि उस दौर के लोगों की चिंताएं और राजनीतिक हालात क्या रहे होंगे। कुछ ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार उनका अंतिम विश्राम स्थल ईरान के मशहद में स्थित इमाम रजा की दरगाह के पास माना जाता है।
नई पीढ़ी के लिए क्यों जरूरी है यह इतिहास
आज के दौर में चांद बीबी की कहानी प्रासंगिक बनी हुई है। जब युवा और महिलाएं आर्थिक अनिश्चितता, तनाव और सामाजिक दबावों का सामना कर रहे हैं, तब इतिहास के ऐसे पात्र हमें यह सिखाते हैं कि कठिन समय में कैसे एकजूट होकर खड़ा हुआ जाए। उनका जीवन हमें यह बताता है कि नेतृत्व केवल व्यक्तिगत वीरता का नाम नहीं है, बल्कि यह आपसी तालमेल, गठबंधन और समाज को साथ लेकर चलने की कला है।
प्रोफेसर सारा वाहिद की यह शोधपूर्ण किताब पाठकों को इतिहास को एक नए नजरिए से देखने का मौका देती है। यह हमें सिखाती है कि महिलाओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भावनाओं या कमजोरियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
चांद बीबी की यह गाथा हमें अपनी रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलकर इतिहास की उन मजबूत महिलाओं को याद करने की प्रेरणा देती है जिन्होंने अपने समय की सीमाओं को तोड़कर एक नई पहचान बनाई थी।