पैलेट गन: भीड़ नियंत्रण या जानलेवा हथियार?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 17-08-2026
Pellet gun: Crowd control or lethal weapon?
Pellet gun: Crowd control or lethal weapon?

 

 डॉ. डी. के. पांडेय

हाल ही में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के धरना-प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ। इस घटना के बाद मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुँच गया। शीर्ष अदालत ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा-‘’पुलिस को असाधारण और बेहद जटिल हालात में पैलेट गन चलाने की इजाजत है। लिहाजा, इस आधार पर इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।‘’

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने देश भर में सुरक्षा बलों की रणनीति और नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक नई बहस को हवा दे दी है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद हर किसी के मन में कुछ बुनियादी सवाल घूम रहे हैं। आखिर पैलेट गन क्या होती है ? इसकी बनावट कैसी है? इसके इस्तेमाल को लेकर क्या नियम-कायदे तय हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह सचमुच इतनी खतरनाक है कि किसी मासूम की जान भी ले सकती है?

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पैलेट गन से भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश

क्या है पैलेट गन और कैसी होती है इसकी बनावट ?

पैलेट गन दरअसल एक प्रकार का 'नॉन-लीथल' या कम घातक हथियार है। सुरक्षा बल इसका इस्तेमाल तब करते हैं जब उग्र और हिंसक भीड़ को नियंत्रित करना बेकाबू हो जाए। जब वॉटर कैनन, लाठीचार्ज या आंसू गैस के गोले बेअसर साबित होते हैं, तब सुरक्षा बलों के पास घातक राइफलों और नॉन-लीथल हथियारों के बीच पैलेट गन ही एकमात्र रास्ता बचता है।

ddतकनीकी रूप से देखें तो पैलेट गन आमतौर पर 12-गेज पंप-एक्शन शॉटगन होती है। इस बंदूक से जब कारतूस दागा जाता है, तो उसमें से एक साथ सैकड़ों छोटे-छोटे छर्रे (पेलेट्स) निकलते हैं।

  • पेलेट्स का निर्माण:ये छर्रे सीसे (लेड), धातु, पॉलीमर या रबर से बने होते हैं।
  • पेलेट्स का फैलाव:बैरल से निकलते ही ये छर्रे हवा में बहुत तेजी से चौड़े दायरे में फैल जाते हैं।
  • कार्ट्रिज के प्रकार:
    • नंबर-1 कार्ट्रिज:इसमें बड़े आकार के पेलेट्स होते हैं, जिनकी संख्या कम होती है।
    • नंबर-12 कार्ट्रिज:इसमें बेहद छोटे आकार के पेलेट्स होते हैं, जिनकी संख्या बहुत अधिक होती है।
  • कश्मीर में इस्तेमाल होने वाले साइज: डेकन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार-‘‘जम्मू-कश्मीर में अशांति के दौरान मुख्य रूप से नंबर-6 (2.79 मिमी के 300 छर्रे) और नंबर-9 (2.30 मिमी के 600 छर्रे) वाले कार्ट्रिज का इस्तेमाल किया जाता रहा है।“

भारत में निर्माण और इस्तेमाल के कड़े नियम

भारत में इन बंदूकों और कारतूसों का निर्माण पूरी तरह सरकारी निगरानी में होता है।

उत्पादन केंद्र:पैलेट गन का निर्माण पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक 'गन राइफल फैक्ट्री ईशापुर' में होता है, जिसने वर्ष 2012 से इसे बनाना शुरू किया था। वहीं, इसके कारतूस (एम्युनिशन) महाराष्ट्र के कड़की में बनाए जाते हैं।

मानवाधिकारों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए इसके इस्तेमाल के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं:

1. न्यूनतम 50 मीटर की दूरी

पैलेट गन की मानक रेंज लगभग 45 मीटर होती है। नियम के मुताबिक सुरक्षा बलों को प्रदर्शनकारियों से कम से कम 50 मीटर दूर रहकर ही फायर करना चाहिए। इतनी दूरी मिलने पर छर्रों की गति धीमी पड़ जाती है और वे एक बड़े इलाके में फैल जाते हैं, जिससे जानलेवा असर कम होता है।

2. कमर के नीचे निशाना

पैलेट गन से किसी भी सूरत में चेहरे, छाती या आंख को निशाना नहीं बनाया जा सकता। दिशा-निर्देशों में साफ लिखा है कि फायर हमेशा शरीर के निचले हिस्से, खासकर पैरों की तरफ होना चाहिए ताकि कम से कम नुकसान पहुंचे।

3. अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग

संयुक्त राष्ट्र संघ के मानक और भारत के भीड़-नियंत्रण नियम यह कहते हैं कि इसका इस्तेमाल शांत या निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर नहीं हो सकता। यह सिर्फ उग्र भीड़, पथराव या आगजनी के वक्त अंतिम रास्ते के तौर पर ही इस्तेमाल में लाई जा सकती है।

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'नॉन-लीथल' का भ्रम: कितना खतरनाक है यह हथियार?

कागजों पर भले ही पैलेट गन को 'गैर-घातक' लिखा जाता हो, लेकिन धरातल पर इसकी तस्वीर बेहद दर्दनाक है। फोरेंसिक केस रिपोर्ट्स और मेडिकल विशेषज्ञों के आंकड़े बताते हैं कि पैलेट गन कभी-कभी साधारण पिस्तौल की तरह जानलेवा साबित हो सकती है।

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इसके खतरनाक होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

(कम दूरी से फायरिंग) ➔(पेलेट्स का न फैलना) ➔(उच्च गति ऊर्जा(Kinetic Energy)) ➔ (त्वचा व हड्डियों को भेदना) ➔(अंदरूनी अंगों में गंभीर चोट/ मौत)

  • दृष्टिहीनता का सबसे बड़ा डर:जब हवा में फैले धातु के छोटे छर्रे चेहरे या आंखों से टकराते हैं, तो वे आंख की पुतली को पूरी तरह तबाह कर देते हैं। इससे व्यक्ति हमेशा के लिए अंधा हो जाता है।
  • अंधाधुंध असर:शॉटगन से निकले छर्रों का फैलाव अनियंत्रित होता है। कोई भी शूटर हवा में तैरते 600 छर्रों में से एक-एक छर्रे की दिशा तय नहीं कर सकता। ऐसे में निर्दोष राहगीर भी इसके शिकार बन जाते हैं।
  • अंदरूनी अंगों को नुकसान:यदि 50 मीटर से कम दूरी पर फायरिंग की जाए, तो पेलेट्स को फैलने का समय नहीं मिलता। ये छर्रे एक साथ गुच्छे के रूप में शरीर में घुसते हैं। ये धमनियों को काट देते हैं, जिससे फेफड़े, दिल, दिमाग और पेट के अंदरूनी अंगों को भारी नुकसान पहुंचता है और पीड़ित की मौत हो जाती है।

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आम उपयोग से लेकर वैश्विक मोर्चे तक: एक नजर

पैलेट गन का इस्तेमाल सिर्फ पुलिस या सुरक्षा बल ही नहीं करते। इसके कम कैलिबर वाले वर्शन का इस्तेमाल आम लोग मनोरंजन के लिए टारगेट शूटिंग (प्लिंकिंग) में करते हैं। इसके अलावा शक्तिशाली स्प्रिंग-पिस्टन और प्री-चार्ज्ड न्यूमेटिक मॉडल का इस्तेमाल खेतों में चूहों, पक्षियों, गिलहरियों और खरगोशों जैसे छोटे जीवों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।

दूसरी ओर, दुनिया भर के देशों में भीड़ को हटाने के लिए इसका सहारा लिया जाता रहा है:

क्षेत्र / देश

समय काल

इस्तेमाल और प्रभाव

जम्मू-कश्मीर (भारत)

2010 और 2016

अशांति से निपटने के लिए "कम जानलेवा" विकल्प के रूप में अपनाया गया, जिसकी काफी आलोचना हुई।

लैटिन अमेरिका (चिली, कोलंबिया)

2019-2020

प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने 12-गेज रबर-मेटल शॉटगन का प्रयोग किया, जिससे सैकड़ों लोग आंखों की चोटों के शिकार हुए।

मिडिल ईस्ट (बहरीन, मिस्र)

2011-2013

'अरब स्प्रिंग' विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा बर्डशॉट और पेलेट शॉटगन चलाई गई।

संयुक्त राष्ट्र की सख्त हिदायत और आगे का रास्ता

पैलेट गन के घातक परिणामों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने 2020 में'लॉ एनफोर्समेंट में कम जानलेवा हथियारों पर यूएन ह्यूमन राइट्स गाइडेंस' जारी की थी।

यूएन गाइडलाइंस (पॉइंट 7.5): संयुक्त राष्ट्र ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मेटल पेलेट या एक साथ कई छर्रे छोड़ने वाली शॉटगन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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पैलेट गन क्या है और इससे जुड़े हर पहलू के बारे में इस इन्फोग्राफिक्स से जान पाएंगे

यूएन का मानना है कि मल्टी-प्रोजेक्टाइल शॉटगन का असर अंधाधुंध होता है। तनावपूर्ण हालात में पुलिसकर्मियों के लिए 50 मीटर की दूरी बनाए रखना या सिर्फ पैरों पर सटीक निशाना लगाना बेहद मुश्किल होता है। इस वजह से 'सहानुभूति और आनुपातिकता' (Proportionality) के नियम का उल्लंघन होता है।

आज दुनिया भर की कानून प्रवर्तन एजेंसियां पेलेट गन के बजाय दूसरे सुरक्षित विकल्पों को अपना रही हैं:

  • रबर की गोलियां (Rubber Bullets)
  • पेपर बॉल्स (Pepper Balls)
  • ध्वनि हथियार (Acoustic Devices)
  • उन्नत आंसू गैस प्रणाली (Advanced Tear Gas)

जंतर-मंतर पर हुई घटना और सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत को भी भीड़ नियंत्रण की अपनी नीतियों की समीक्षा करने की जरूरत है। देश में कानून व्यवस्था बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी आम नागरिकों के जीवन और उनके शरीर की सुरक्षा करना भी है। वक्त आ गया है कि हम पैलेट गन जैसे विवादित हथियारों की जगह पूरी तरह आधुनिक और सुरक्षित तकनीकों को तरजीह दें।

fसंपादन: हाशमी