अब्दुल्लाह मंसूर
हर साल जब 8मार्च आता है, तो दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों और उनकी आज़ादी पर लंबी बहसें होती हैं। इस महिला दिवस पर भी हम पितृसत्ता के उस चेहरे पर बात कर रहे हैं जो औरतों को दबाता है और उन्हें घर की चारदीवारी तक महदूद रखता है। लेकिन इस विमर्श के बीच एक बड़ा सच अक्सर ओझल रह जाता है। जब हम इसकी तह तक जाते हैं, तो समझ आता है कि पितृसत्ता का यह ढांचा जितना औरतों के लिए नुकसानदेह है, उतना ही मर्दों के लिए भी एक सज़ा जैसा है। पितृसत्ता का सीधा मतलब है एक ऐसा समाज जहाँ सारे अहम फैसले और ताकत सिर्फ मर्दों के हाथ में हो, लेकिन इस ताकत की एक बहुत बड़ी कीमत खुद मर्दों को चुकानी पड़ती है।
बचपन से ही लड़कों के दिमाग में यह बात भर दी जाती है कि उन्हें हर हाल में सख्त, मजबूत और निडर दिखना है। “मर्द को दर्द नहीं होता” जैसी बातें असल में उस मानसिक हिंसा की शुरुआत हैं, जो एक मासूम बच्चे को अपनी भावनाओं का गला घोंटने पर मजबूर कर देती हैं।
इस प्रक्रिया में एक पुरुष अपनी ही कुदरती इंसानियत से कट जाता है और एक ऐसे अकेलेपन का शिकार हो जाता है जिसे वह अक्सर अपने गुस्से या कठोरता के पीछे छुपाने की कोशिश करता है। आज के इस दौर में यह समझना जरूरी है कि पितृसत्ता की बेड़ियाँ सिर्फ औरतों के पैरों में नहीं, बल्कि मर्दों के ज़हन पर भी कसी हुई हैं।
इतिहास को देखें तो पता चलता है कि पितृसत्ता का जन्म तब हुआ जब इंसान ने ज़मीन और जायदाद पर अपना कब्ज़ा जमाना शुरू किया। पुराने ज़माने में जब इंसान जंगलों में रहता था, तब मर्द और औरत दोनों मिलकर काम करते थे और दोनों के बीच बराबरी थी। लेकिन जैसे ही खेती और दौलत का महत्व बढ़ा अर्थात् नीजि सम्पति का महत्व बड़ा तो मर्दों ने नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।
इस बदलाव ने न केवल औरतों को कमतर बनाया, बल्कि मर्दों के कंधों पर भी 'कमाऊ' और 'रक्षक' होने का एक भारी बोझ डाल दिया। आज भी यह बोझ कम नहीं हुआ है। एक मर्द की इज़्ज़त समाज में इस बात पर टिकी होती है कि वह कितना पैसा कमाता है या उसके पास कितनी पावर है। अगर वह आर्थिक रूप से कमजोर है या उसके पास नौकरी नहीं है, तो समाज उसे बेकार समझने लगता है।
उसे यह महसूस कराया जाता है कि उसका वजूद तभी तक कीमती है जब तक वह दूसरों का पेट भर रहा है या पहरेदारी कर रहा है। यह सोच मर्दों को खुद के प्रति लापरवाह बना देती है। युद्धों से लेकर खतरनाक कामों तक, मर्दों की जान को अक्सर सस्ता समझा जाता है क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें एक जीता-जागता इंसान मानने के बजाय सिर्फ एक 'साधन' समझती है।
याद करें फिल्म ‘टाइटैनिक’ के एक सीन में जब जहाज डूब रहा होता है। उस वक्त औरतों और बच्चों को सबसे पहले बचाया जाता है और मर्दों को मौत के हवाले छोड़ दिया जाता है। भले ही हर इंसान अपनी जान से बराबर प्यार करता है, लेकिन समाज यह तय कर देता है कि मर्दों की जान की क़ीमत सबसे कम है। इस सोच के चलते मर्दों से उम्मीद की जाती है कि वो हर हाल में खुद को कुर्बान कर दें।

भावनाओं का कत्ल और रिश्तों में बढ़ती दूरियां
लेखिका बेल हुक्स ने बहुत पते की बात कही है कि पितृसत्ता सबसे पहले मर्दों की भावनाओं का कत्ल करती है। समाज में एक 'असली मर्द' वही माना जाता है जो पत्थर दिल हो, जिसकी आँखों में आंसू न आएं और जो हर मुश्किल में चट्टान की तरह खड़ा रहे। इस बनावटी मजबूती को दिखाने के चक्कर में मर्द अपनी कोमलता और जज्बातों को 'कमजोरी' मानकर त्याग देते हैं।
जब एक लड़का अपने डर या दुख को बांटना चाहता है, तो उसे 'लड़कियों जैसा' कहकर चिढ़ाया जाता है। यह परवरिश उसे एक ऐसे अंधेरे में धकेल देती है जहाँ वह अपने सबसे करीबी रिश्तों में भी खुल नहीं पाता। बाप और बेटे के बीच का रिश्ता अक्सर इसी चुप्पी की भेंट चढ़ जाता है।
एक पति अपनी पत्नी के सामने अपनी परेशानियों को जाहिर करने से डरता है क्योंकि उसे लगता है कि ऐसा करने से उसकी मर्दानगी कम हो जाएगी। यही वजह है कि मर्दों की दोस्ती भी अक्सर ऊपर-ऊपर की रह जाती है। वे राजनीति या क्रिकेट पर तो घंटों बात कर सकते हैं, लेकिन अपने मन के भीतर चल रहे तूफानों पर बात करने से कतराते हैं। यह खालीपन मर्दों में मानसिक तनाव और चिड़चिड़ेपन का कारण बनता है।
आजकल की फिल्मों ने इस गलत मर्दानगी को और ज्यादा हवा दी है। 'कबीर सिंह' या 'एनिमल' जैसी फिल्मों में जिस तरह के गुस्सैल और हिंसक नायक को हीरो बनाकर दिखाया जाता है, वह असल में इसी बीमार सोच का हिस्सा है। इन फिल्मों के जरिए समाज को यह गलत संदेश दिया जाता है कि दुख या नाराजगी को जाहिर करने का इकलौता 'मर्दाना' तरीका सिर्फ मार-पीट और गुस्सा ही है।
लेकिन इस पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि यह गुस्सा अक्सर उस गहरे दुख का नतीजा होता है जिसे बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता। जब मर्द अपनी भावनाओं को लफ्जों में बयां नहीं कर पाते, तो वे हिंसक हो जाते हैं, जिससे न केवल उनके परिवार उजड़ते हैं बल्कि वे खुद भी समाज से कट जाते हैं।
यह अकेलापन उन्हें एक ऐसे चक्कर में फंसा देता है जहाँ वे अपनी असली पहचान खोते चले जाते हैं। समाज में औरतों के प्रति बढ़ते अपराधों की एक बड़ी वजह वह कुंठा भी है, जो इसी तरह की परवरिश और जज्बातों को दबाने से पैदा होती है। पुरुषों को बचपन से सिखाया जाता है कि यदि वे "सफल" होंगे (यानी पैसा कमाएंगे, ताकतवर बनेंगे, या समाज में ऊंचा स्थान पाएंगे), तो उन्हें 'इनाम' के रूप में एक सुंदर महिला मिलेगी। इसका परिणाम यह होता है कि पुरुष यौन संबंध या प्रेम को एक 'उपलब्धि' की तरह देखने लगते हैं, न कि एक आपसी मानवीय जुड़ाव की तरह।

बराबरी की सोच और बदलाव की ज़रूरत
पितृसत्ता की इस दीवार ने स्त्री और पुरुष के बीच एक ऐसी खाई खोद दी है जहाँ दोनों के बीच सच्चा तालमेल मुश्किल हो गया है। औरतों के खिलाफ बढ़ती हिंसा की वजह से वे मर्दों से दूरी बना लेती हैं, जिससे मर्दों में अकेलापन और नफरत और बढ़ती है। यह एक ऐसा संकट है जिसका समाधान सिर्फ औरतों की आज़ादी में नहीं, बल्कि मर्दों की इस 'मानसिक जेल' से रिहाई में भी छिपा है।
हमें यह मानना होगा कि एक मर्द की कीमत उसके बैंक बैलेंस या उसकी शारीरिक ताकत से कहीं ज्यादा है। वह भी एक इंसान है जिसे प्यार, सहानुभूति और कभी-कभी रोने की पूरी ज़रूरत है। पितृसत्ता ने मर्दों को 'दुनिया का मालिक' होने का जो झूठा सपना दिखाया है, उसकी कीमत उन्होंने अपनी शांति और सुकून खोकर चुकाई है।
जब तक मर्द खुद को इस सिस्टम का फायदा उठाने वाले के बजाय इसका शिकार नहीं समझेंगे, तब तक समाज में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि घर के कामों में हाथ बंटाना या अपनी साथी की तरक्की पर खुश होना उनकी मर्दानगी को घटाता नहीं, बल्कि बढ़ाता है।
एक बेहतर समाज बनाने के लिए हमें उन तमाम पुरानी सोचों को चुनौती देनी होगी जो मर्दों को दूसरों से ऊपर रहने का अहसास दिलाती हैं। मशहूर विचारक सिमोन द बोवोआर ने कहा था कि "औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है", यह बात मर्दों पर भी बिल्कुल फिट बैठती है। समाज मर्दों को एक लड़ाके और हुक्म चलाने वाले के तौर पर ढालता है, जबकि कुदरत ने उन्हें एक संवेदनशील इंसान बनाकर भेजा था।
इस थोपी गई पहचान को उतार फेंकना ही आज के मर्द की सबसे बड़ी जीत है। जब मर्द अपनी हिंसा और ताकत को छोड़कर अपनी इंसानियत को अपनाएंगे, तभी वे खुद को और अपने परिवार को खुश रख पाएंगे। हमें एक ऐसी दुनिया की ज़रूरत है जहाँ मर्द और औरत एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि हमसफर हों।
जहाँ कामयाबी का मतलब पैसा या रुतबा नहीं, बल्कि दिल का सुकून और रिश्तों की मिठास हो। पितृसत्ता को खत्म करने का मतलब मर्दों को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उन्हें उस बोझ से आज़ाद करना है जिसे वे सदियों से अपनी पीठ पर लादे घूम रहे हैं। तभी हम एक ऐसे समाज की उम्मीद कर सकते हैं जहाँ हर इंसान अपनी पूरी सच्चाई और इज़्ज़त के साथ जी सके।
(अब्दुल्लाह मंसूर, लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)